13 अगस्त 2022 : PIB विश्लेषण
विषयसूची:
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- स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष में 75 रामसर स्थल
सामान्य अध्ययन: 3
पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी:
विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
प्रारंभिक परीक्षा: रामसर स्थल, आर्द्रभूमि
प्रसंग:
- भारत में स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष में रामसर स्थलों की सूची में 11 और आर्द्रभूमि शामिल हो गए हैं जिससे देश में 13,26,677 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए कुल 75 रामसर स्थल हो गए हैं।
विवरण:
- 11 नए स्थलों में तमिलनाडु में चार (4), ओडिशा में तीन (3), जम्मू और कश्मीर में दो (2) और मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में एक (1) शामिल हैं। इन स्थलों को नामित करने से इन आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन तथा इनके संसाधनों के कौशलपूर्ण रूप से उपयोग करने में सहायता मिलेगी।
- भारत 1971 में ईरान के रामसर में रामसर संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पक्षों में से एक है। भारत ने 1 फरवरी, 1982 को इस पर हस्ताक्षर किए। 1982 से 2013 के दौरान, रामसर स्थलों की सूची में कुल 26 स्थलों को जोड़ा गया, हालांकि, इस दौरान 2014 से 2022 तक रामसर स्थलों की सूची में 49 नई आर्द्रभूमि जोड़ी गई हैं।
- इस वर्ष (2022) के दौरान ही कुल 28 स्थलों को रामसर स्थल घोषित किया गया है। रामसर प्रमाण पत्र में अंकित स्थल की तिथि के आधार पर इस वर्ष (2022) के लिए 19 स्थल और पिछले वर्ष (2021) के लिए 14 स्थल हैं।
- तमिलनाडु में रामसर स्थलों की संख्या (14) अधिकतम है। इसके पश्चात उत्तर प्रदेश में 10 रामसर स्थल हैं।
11 नए रामसर स्थलों का सारांश
- तंपारा झील:
- तंपारा झील गंजम जिले में स्थित ओडिशा राज्य की सबसे प्रमुख मीठे पानी की झीलों में से एक है। यहां की भूमि का क्षेत्र धीरे-धीरे वर्षा जल के प्रवाह से भर गया और इसे अंग्रेजों द्वारा “टैम्प” कहा गया और बाद में स्थानीय लोगों द्वारा इसे “तंपारा” कहा गया। इस आर्द्रभूमि में पक्षियों की कम से कम 60 प्रजातियां, मछलियों की 46 प्रजातियां, फाइटोप्लांकटन की कम से कम 48 प्रजातियां और स्थलीय पौधों एवं मैक्रोफाइट्स की सात से अधिक प्रजातियां रहती है। आर्द्रभूमि दुर्लभ प्रजातियों जैसे कि सायप्रिनस कार्पियो, कॉमन पोचार्ड (अथ्या फेरिना), और रिवर टर्न (स्टर्ना औरंतिया) के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है। प्रति वर्ष 12 टन की अनुमानित औसत मत्स्यन के साथ यह आर्द्रभूमि स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह आर्द्रभूमि मछलियों के साथ-साथ कृषि और घरेलू उपयोग के लिए जल भी उपलब्ध कराती है तथा यह एक प्रसिद्ध पर्यटन और मनोरंजन स्थल भी है।
- हीराकुंड जलाशय
- हीराकुंड जलाशय (ओडिशा में सबसे बड़ा मिट्टी का बांध) 1957 से पुष्प और जीव प्रजातियों की एक श्रृंखला का समर्थन जिनमें कई उच्च संरक्षण महत्व की हैं को संरक्षण प्रदान कर रहा है। जलाशय से ज्ञात 54 प्रजातियों की मछलियों में से एक को लुप्तप्राय, छह को निकट संकटग्रस्त और 21 मछली प्रजातियों को आर्थिक महत्व के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मत्स्य पालन के अंतर्गत यहां वर्तमान में सालाना लगभग 480 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन होता है और यह 7000 मछुआरे परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है। इसी तरह, इस स्थल पर 130 से अधिक पक्षी प्रजातियों को देखा गया है, जिनमें से 20 प्रजातियां उच्च संरक्षण महत्व की हैं। जलाशय लगभग 300 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन और 4,36,000 हेक्टेयर सांस्कृतिक क्षेत्र की सिंचाई के लिए जल का एक स्रोत है। यह आर्द्रभूमि भारत के पूर्वी तट के पारिस्थितिकी और सामाजिक-आर्थिक केंद्र महानदी डेल्टा में बाढ़ को नियंत्रित करके महत्वपूर्ण जल विज्ञान सेवाएं भी प्रदान करती है। हीराकुंड जलाशय प्रचुर मात्रा में पर्यटन को भी बढ़ावा देता है और इसे संबलपुर के आसपास स्थित उच्च पर्यटन मूल्य स्थलों का एक अभिन्न अंग बनाता है, जिसमें प्रतिवर्ष 30,000 से अधिक पर्यटक आते हैं।
- अंशुपा झील
- अंशुपा झील कटक जिले के बांकी उप-मंडल में स्थित ओडिशा की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर यह प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है। यह आर्द्रभूमि महानदी द्वारा निर्मित एक ऑक्सबो झील है और 231 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। इस आर्द्रभूमि में पक्षियों की कम से कम 194 प्रजातियां, मछलियों की 61 प्रजातियां और स्तनधारियों की 26 प्रजातियां के अलावा मैक्रोफाइट्स की 244 प्रजातियां निवास करती है। यह आर्द्रभूमि कम से कम तीन संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों- रिनचोप्स एल्बिकोलिस (EN), स्टर्ना एक्यूटिकौडा (EN) और स्टर्ना ऑरेंटिया (VU) और तीन संकटग्रस्त मछलियों की प्रजातियों- क्लारियस मगर (क्लेरिडे) (EN), सायप्रिनस कार्पियो (साइप्रिनिडे) (VU) और वालगो एटू (VU) को एक सुरक्षित आवास प्रदान करती है। अंशुपा झील आसपास के क्षेत्रों की मीठे पानी की मांग को पूरा करती है और मत्स्य पालन और कृषि के माध्यम से स्थानीय समुदायों की आजीविका में भी सहायक है। आर्द्रभूमि में मनोरंजन और पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं क्योंकि यह प्रवासी पक्षियों के लिए एक प्रमुख शीतकालीन क्षेत्र है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है।
- यशवंत सागर
- यशवंत सागर इंदौर क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्रों (IBA) में से एक है और मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण पक्षी स्थलों में से एक है। वर्तमान में इसका उपयोग मुख्य रूप से इंदौर शहर में पानी की आपूर्ति के लिए किया जाता है और व्यावसायिक स्तर पर इसका उपयोग मछली पालन के लिए भी किया जा रहा है। यशवंत सागर जलाशय इंदौर नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है। भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में से एक का खिताब हासिल करने वाले इंदौर को अक्सर मध्य प्रदेश के आर्थिक विकास के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। इस आर्द्रभूमि का जलग्रहण क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि है। यशवंत सागर को मध्य भारत में दुर्लभ सारस क्रेन का गढ़ माना जाता है। झील के बैकवाटर में बहुत सारे उथले क्षेत्र हैं, जो कि वैडर्स और अन्य जलपक्षी के लिए अनुकूल हैं। जैसे ही जल स्तर घटता है, कई द्वीप जलपक्षी के लिए आश्रय स्थल के रूप में काम करते हैं। अपने विशाल उथले ईख क्षेत्रों के कारण, आर्द्रभूमि को बड़ी संख्या में शीतकालीन प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग माना जाता है।
- चित्रांगुडी पक्षी अभयारण्य
- चित्रांगुडी पक्षी अभयारण्य, जिसे स्थानीय रूप से “चित्रांगुडी कनमोली” के नाम से जाना जाता है, तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यह आर्द्रभूमि 1989 से एक संरक्षित क्षेत्र है और इसे पक्षी अभ्यारण्य के रूप में घोषित किया गया है, जो तमिलनाडु वन विभाग, रामनाथपुरम डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में आता है। चित्रांगुडी पक्षी अभयारण्य शीतकालीन प्रवासी पक्षियों के लिए एक आदर्श आवास है। इस स्थल से 30 परिवारों के लगभग 50 पक्षियों के उपस्थित होने की जानकारी मिली है। इनमें से 47 जल पक्षी और 3 स्थलीय पक्षी हैं। इस स्थल क्षेत्र से स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, लिटिल एग्रेट, ग्रे हेरॉन, लार्ज एग्रेट, ओपन बिल स्टॉर्क, पर्पल और पोंड हेरॉन जैसे उल्लेखनीय जलपक्षी देखे गए। चित्रांगुडी कृषि क्षेत्रों से घिरा हुआ है, जहां साल भर विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं। आर्द्रभूमि कई मछलियों, उभयचरों, मोलस्क, जलीय कीड़े और उनके लार्वा का भी पालन करती है जो प्रवासी जल पक्षियों के लिए भोजन के स्रोत हैं।
- सुचिन्द्रम थेरूर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स
- सुचिन्द्रम थेरूर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स, सुचिन्द्रम-थेरूर मनाकुडी कंजर्वेशन रिजर्व का हिस्सा है। इसे एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र घोषित किया गया है और यह प्रवासी पक्षियों के मध्य एशियाई फ्लाई-वे के दक्षिणी सिरे पर स्थित है। इसे पक्षियों के घोंसले के लिए बनाया गया था और यह हर साल हजारों पक्षियों को आकर्षित करता है। थेरूर पर निर्भर कुल जनसंख्या लगभग 10,500 है और इस जनसंख्या की 75 प्रतिशत आजीविका कृषि पर टिकी है जो थेरूर जलाशय से निकलने वाले पानी पर निर्भर है। यह एक मानव निर्मित, अंतर्देशीय जलाशय है और बारहमासी है। 9वीं शताब्दी के तांबे की प्लेट के शिलालेखों में पसुमकुलम, वेंचिकुलम, नेदुमर्थुकुलम, पेरुमकुलम, एलेमचिकुलम और कोनाडुनकुलम का उल्लेख है। इस क्षेत्र में पक्षियों की लगभग 250 प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें से 53 प्रवासी, 12 स्थानिक और 4 विलुप्त होने की कगार पर हैं।
- वडुवूर पक्षी अभयारण्य
- वडुवूर पक्षी अभयारण्य 112.638 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ है, यह मानव निर्मित एक बड़ा सिंचाई जलाशय और प्रवासी पक्षियों के लिए आश्रय है क्योंकि यह भोजन, आश्रय और प्रजनन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करता है। यद्यपि इन सिंचाई जलाशयों का सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व है लेकिन उनके पारिस्थितिक महत्व के बारे में बहुत कम जानकारी है।
- कांजीरकुलम पक्षी अभयारण्य
- भारत के तमिलनाडु के मुदुकुलथुर रामनाथपुरम जिले के पास कांजीरकुलम पक्षी अभयारण्य 1989 में घोषित एक संरक्षित क्षेत्र है। यह कई प्रवासी बगुले प्रजातियों के लिए घोंसले बनाने के स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां बगुले बबूल के पेड़ों पर प्रवास करते हैं। प्रवासी जलपक्षियों की प्रजनन आबादी अक्टूबर और फरवरी के बीच यहां आती है और इसमें पेंटेड स्टॉर्क, सफेद आइबिस, ब्लैक आइबिस, लिटिल एग्रेट, ग्रेट एग्रेट शामिल हैं। यह स्थल IBA के रूप में जाना जाता है। इस आर्द्रभूमि में स्पॉट-बिल पेलिकन, ओरिएंटल डार्टर, ओरिएंटल व्हाइट आईबिस और पेंटेड स्टॉर्क जैसी कई विश्व स्तर पर निकट-खतरे वाली प्रजातियां शामिल हैं। ये स्थल पक्षियों के प्रजनन, आश्रय, चारागाह और ठहरने के स्थलों के रूप में कार्य करते हैं।
- ठाणे क्रीक
- ठाणे क्रीक भारत के महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। इस क्रीक में ताजे पानी के कई स्रोत हैं, जिनमें उल्हास नदी सबसे बड़ी है, इसके बाद मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे के विभिन्न उपनगरीय क्षेत्रों से कई जल निकासी साधन हैं। इसे ठाणे क्रीक फ्लेमिंगो अभयारण्य घोषित किया गया है। ठाणे क्रीक दोनों किनारों पर मैंग्रोव से घिरा हुआ है और इसमें कुल भारतीय मैंग्रोव प्रजातियों का लगभग 20 प्रतिशत भाग शामिल है। मैंग्रोव वन एक प्राकृतिक आश्रय क्षेत्र के रूप में कार्य करता है और भूमि को चक्रवातों, ज्वार-भाटा, समुद्री जल के रिसाव और बाढ़ से बचाता है। मैंग्रोव कई मछलियों के लिए नर्सरी का काम करता है और स्थानीय मत्स्य पालन को बनाए रखता है। यह क्षेत्र पक्षियों के मध्य एशियाई फ्लाई-वे के आर्द्रभूमि परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 202 पक्षी प्रजातियों के अलावा, क्रीक में मछलियों की 18 प्रजातियां, क्रस्टेशियंस और मोलस्क, तितलियों की 59 प्रजातियां, कीटों की 67 प्रजातियां, और फाइटोप्लांकटन की 35 प्रजातियां, और ज़ोप्लांकटन की 24 प्रजातियां और बेंथोस की 23 प्रजातियां भी हैं।
- हाइगम आर्द्रभूमि संरक्षण रिजर्व
- हाइगम आर्द्रभूमि झेलम नदी बेसिन के अंतर्गत आता है और स्थानीय समुदायों के लिए बाढ़ अवशोषण बेसिन, जैव विविधता संरक्षण स्थल, पर्यावरण-पर्यटन स्थल और आजीविका सुरक्षा के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आर्द्रभूमि बारामुला जिले में स्थित है। यह कई निवासियों और प्रवासी पक्षी प्रजातियों के निवास के रूप में कार्य करता है। इसे एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।
- शालबुग वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व
- शालबुग वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के श्रीनगर जिले में स्थित है। इस आर्द्रभूमि के बड़े क्षेत्र सितंबर और मार्च के बीच सूख जाते हैं। यह कम से कम 21 प्रजातियों के चार लाख से अधिक स्थानिक और प्रवासी पक्षियों के आश्रय के रूप में कार्य करता है। शालबुग वेटलैंड प्राकृतिक नियंत्रण, सुधार या बाढ़ की रोकथाम में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, यह आर्द्रभूमि या डाउनस्ट्रीम संरक्षण महत्व के अन्य क्षेत्रों के लिए मौसमी जल प्रतिधारण के लिए भी महत्वपूर्ण है। आर्द्रभूमि जलाशयों के फिर से भरने के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक प्रमुख प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र प्रणाली के रूप में भी कार्य करती है।
प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
- भारत की पहली सेलाइन वाटर लालटेन का शुभारम्भ
- केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री ने भारत की पहली सेलाइन वाटर लालटेन का शुभारम्भ किया, जिसमें एलईडी लैंप को रोशन करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए इलेक्ट्रोड्स के बीच इलेक्ट्रोलाइट के रूप में समुद्र के पानी का उपयोग होता है।
- तटीय अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT), चेन्नई द्वारा संचालित और उपयोग किए जाने वाले एक तटीय अनुसंधान पोत सागर अन्वेषिका के भ्रमण के दौरान अपनी तरह की पहली“रोशनी” नाम के लालटेन का अनावरण किया गया। सेलाइन वाटर लालटेन से गरीब और वंचित लोगों विशेषकर भारत की 7,500 किमी तटीय रेखा से सटे इलाकों में रहने वाले मछुआरा समुदाय के लिए “जीवन सुगमता”आएगी।
- इस प्रौद्योगिकी का दूरदराज के क्षेत्रों में भी उपयोग किया जा सकता है, जहां समुद्र का पानी उपलब्ध नहीं है क्योंकि किसी भी खारे पानी या सामान्य नमक के साथ मिश्रित पानी को लालटेन को रोशन करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह न सिर्फ किफायती है, बल्कि इसे संचालित करना भी खासा आसान है।
- केंद्रीय मंत्री ने NIOT द्वारा समुद्री पानी को पीने योग्य जल में तब्दील करने के लिए विकसित लो टेंपरेचर थर्मल डिसैलिनेशन (LTTD) तकनीक की प्रगति की भी समीक्षा की, जिसका लक्षद्वीप आइलैंड में सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि केंद्र शासित क्षेत्र लक्षद्वीप के कावारत्ती, अगाती और मिनीकॉय द्वीपों में LTTD प्रौद्योगिकी पर आधारित तीन डिसैलिनेशन संयंत्रों को विकसित और उनका प्रदर्शन किया जा चुका है। इन LTTD संयंत्रों में से प्रत्येक की क्षमता प्रतिदिन एक लाख लीटर पेयजल की है।