A. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 1 से संबंधित

भूगोल

  1. कश्मीर में बर्फबारी नहीं

B. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित

राजव्यवस्था

  1. विपक्षी सांसद, संसदीय व्यवधान

सामाजिक न्याय

  1. उच्च शिक्षा में नामांकन

C. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित

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D. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 4 से संबंधित

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E. संपादकीय

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F. प्रीलिम्स तथ्य

  1. AMU का अल्पसंख्यक दर्जा
  2. म्यांमार के जातीय अल्पसंख्यक लड़ाकों ने बंदरगाह शहर पर कब्जा किया
  3. लाल सागर संकट से कंपनियों को नुकसान हो सकता है
  4. वैभव फ़ेलोशिप कार्यक्रम

G. महत्वपूर्ण तथ्य

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H. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

I. UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 1 से संबंधित

कश्मीर में बर्फबारी नहीं

भूगोल

विषय: चक्रवात, तूफान, भूकंप, भारत में उद्योगों का स्थान, जल निकाय, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधन

मुख्य परीक्षा: भारत में बर्फबारी पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

सन्दर्भ: असामान्य मौसम पैटर्न के कारण कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्र जनवरी के दौरान सामान्य बर्फबारी से वंचित रह गए हैं। मानक से यह विचलन योगदान देने वाले कारकों पर सवाल उठाता है, जिसमें पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका, अल-नीनो की स्थिति और बदलती जेट धाराओं का प्रभाव शामिल है। इन क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं होने को समझने के लिए इन तत्वों को समझना महत्वपूर्ण है।

कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बर्फबारी की कमी

  • ऐतिहासिक संदर्भ: जनवरी में आमतौर पर कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बड़ी मात्रा में बर्फबारी होती है, जिससे शीतकालीन खेलों और पर्यटन के लिए आदर्श स्थितियाँ बनती हैं।
  • वर्तमान परिदृश्य: वर्तमान वर्ष की सर्दी बिल्कुल विपरीत है, कश्मीर के गुलमर्ग और पहलगाम जैसे लोकप्रिय स्थलों एवं हिमाचल प्रदेश के शुष्क ढलानों में शुष्क स्थिति देखी गई है।
  • मौसम संबंधी रिकॉर्ड: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने हिमाचल प्रदेश में 99.7% वर्षा की कमी दर्ज की है, जिससे 1901 के बाद से सबसे शुष्क जनवरी देखी गई है।

बर्फबारी की कमी में योगदान देने वाले कारक

  • तापमान की गतिशीलता: हालांकि दिसंबर के बाद से तापमान कम रहा है, लेकिन बर्फबारी तभी होगी जब पर्याप्त नमी और वायुमंडलीय तापमान दोनों शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे हो।
  • पश्चिमी विक्षोभ (WDs): उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी लाने के लिए महत्वपूर्ण WD इस सर्दी में उल्लेखनीय रूप से नहीं देखे गए हैं। इसके नहीं होने का असर पश्चिमी हिमालय क्षेत्र पर पड़ा है, जहां सामान्य से 80% कम बारिश हुई है।
  • अल-नीनो स्थितियाँ: भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में मौजूद अल-नीनो स्थितियों ने WD में कमी में योगदान देने में भूमिका निभाई हो सकती है।
  • जेट स्ट्रीम: जेट स्ट्रीम के रूप में जानी जाने वाली शक्तिशाली हवाएँ, जो WD के परिवहन के लिए आवश्यक हैं, आर्कटिक के गर्म होने के कारण उत्तर की ओर स्थानांतरित हो गई हैं। यह बदलाव उत्तर भारत में ठंडी हवा की कमी को बढ़ाता है, जिससे बर्फबारी के लिए नमी की कमी हो जाती है।

मौसम के बदलते मिजाज के निहितार्थ

  • ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव: पारंपरिक मौसम प्रतिरूप में व्यवधान, जो विस्तारित शुष्क अवधि और तीव्र गीले का दौर है, ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में मौसम विज्ञानियों और जलवायु वैज्ञानिकों द्वारा उठाई गई चिंताओं के अनुरूप है।
  • उत्तराखंड में आकस्मिक बाढ़: हाल के वर्षों में फरवरी और मार्च में पश्चिमी विक्षोभ में वृद्धि देखी गई है, जिससे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आकस्मिक बाढ़ आई है।

मुद्दे

  • पर्यटन और शीतकालीन खेल: बर्फबारी की अनुपस्थिति उन क्षेत्रों में पर्यटन उद्योग और शीतकालीन खेलों को प्रभावित करती है जो इन गतिविधियों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
  • पर्यावरण संबंधी चिंताएँ: ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदलते मौसम प्रतिरूप ने पर्यावरणीय चुनौतियाँ पैदा की हैं, जिनमें परिवर्तित वर्षा के रुझान और चरम मौसम की घटनाओं का खतरा शामिल है।

महत्त्व

  • जलवायु परिवर्तनशीलता को समझना: इन मौसम संबंधी विसंगतियों का अध्ययन क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करने वाले परस्पर जुड़े कारकों और जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।.

समाधान

  • जलवायु लचीलापन रणनीतियाँ: बदलते मौसम प्रतिरूप से निपटने के लिए अनुकूली उपायों को लागू करना, जिसमें सतत पर्यटन प्रथाओं और संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देना शामिल है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक पहलों के साथ सहयोग करना, जिसका लक्ष्य क्षेत्रीय जलवायु पर इसके प्रभाव को कम करना है।

सारांश: कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बर्फबारी नहीं होने की परिघटना मौसम संबंधी कारकों की जटिल परस्पर क्रिया और जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव को उजागर करती है। चूँकि दुनिया बदलते मौसम के मिजाज से जूझ रही है, इसलिए बदलते मौसम से उत्पन्न चुनौतियों का समाधान करने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय उपाय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित

विपक्षी सांसद, संसदीय व्यवधान

राजव्यवस्था

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार

मुख्य परीक्षा: संसदीय व्यवधान का मुद्दा

सन्दर्भ: 2023 में संसद के शीतकालीन सत्र में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखा गया क्योंकि बड़ी संख्या में विपक्षी संसद सदस्यों (सांसदों) को निलंबित कर दिया गया था। 141 सांसदों के निलंबन ने विपक्ष की भूमिका और संसदीय कार्यवाही पर प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ा दीं। यह घटना विरोध प्रदर्शन, लोकतांत्रिक शासन तथा राजनीतिक परिदृश्य में स्वस्थ बहस की आवश्यकता के बीच नाजुक संतुलन पर प्रकाश डालती है।

लोकतांत्रिक शासन में विरोध का महत्व

  • लोकतांत्रिक मूल्य: विरोध और असहमति लोकतांत्रिक शासन के अभिन्न अंग हैं, जो राजनीतिक चर्चा की जीवंतता तथा व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों के प्रयोग को दर्शाते हैं।
  • विपक्ष की सहयोगात्मक भूमिका: पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का विपक्ष की सहयोगात्मक भूमिका पर जोर यथोचित निर्णय लेने और समावेशी कानून को आकार देने में स्वस्थ चर्चा और असहमति के महत्व को रेखांकित करता है।

निलंबित सांसदों का ट्रैक रिकॉर्ड

  • शशि थरूर: तीन बार के लोकसभा सांसद, थरूर के उल्लेखनीय योगदान में उच्च उपस्थिति रिकॉर्ड, बहस में सक्रिय भागीदारी और महत्वपूर्ण गैर-सरकारी सदस्य विधेयकों को लाना शामिल है।
  • एस. जोतिमणि: तमिलनाडु से लोकसभा सदस्य के रूप में, जोतिमणि ने नए सदस्य होने के बावजूद सक्रिय रूप से विभिन्न विषयों पर ध्यान दिया है, कई सवाल उठाए हैं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर विधेयक पेश किए हैं।
  • मनोज कुमार झा: बिहार से राज्यसभा सांसद हैं तथा इनकी उच्च भागीदारी दर है, प्रश्नों और निजी सदस्य विधेयकों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान एवं सर्वश्रेष्ठ नवोदित सांसद के रूप में हैं।
  • सुप्रिया सुले: उच्च उपस्थिति रिकॉर्ड के साथ, महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सांसद सुले सक्रिय रूप से बहस में शामिल रही हैं तथा जनगणना संशोधन और विधवाओं के अधिकारों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विधेयक पेश किया है।
  • गौरव गोगोई: असम के लोकसभा सांसद, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, ने सक्रिय रूप से बहस में भाग लिया है और पर्यावरण संबंधी चिंताओं और कंपनी नियमों पर निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किए हैं।
  • वंदना हेमंत चव्हाण: महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद, चव्हाण की बहसों में सक्रिय भागीदारी, बड़े स्तर पर प्रश्न और सामाजिक मुद्दों पर निजी सदस्य विधेयकों को पेश करना उनकी प्रतिबद्धता को सामने लाता है।
  • डेरेक ओ’ब्रायन: पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद हैं, तथा शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए, बहस और निजी सदस्य विधेयकों के माध्यम से इनकी सक्रिय संसदीय भागीदारी देखी जाती है।
  • कुँवर दानिश अली: हाल ही में निलंबन के बावजूद, उत्तर प्रदेश से लोकसभा सांसद ने विधायी कर्तव्यों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए उच्च उपस्थिति, बहस में सक्रिय भागीदारी दिखाई है और विधेयकों को प्रस्तुत किया है।

मुद्दे

  • असहमति का दमन: व्यवधान उत्पन्न करने को लेकर सांसदों के निलंबन से असहमति के दमन को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं, जिससे विधायी चर्चा को आकार देने में विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
  • शासन पर प्रभाव: असहमति को दबाना लोकतांत्रिक मानदंडों को चुनौती देता है, जिससे प्रभावी शासन के लिए सरकार और विपक्ष के सहयोग के बीच नाजुक संतुलन के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता को बल मिलता है।

विपक्ष की भूमिका का महत्व

  • विधायी विमर्श को आकार देना: प्रतिबद्ध सांसद सक्रिय भागीदारी, प्रश्नों और विधेयकों के माध्यम से भारत के विधायी विमर्श को आकार देने में विपक्ष की अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित करते हैं।
  • विविध आवाज़ों की आवश्यकता: असहमति को दबाना राजनीतिक परिदृश्य में विविध आवाज़ों के महत्व पर प्रकाश डालता है, जो सार्थक संसदीय भागीदारी के माध्यम से देश के भविष्य में योगदान देती हैं।

समाधान

  • लोकतांत्रिक मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन: निलंबन की घटना लोकतांत्रिक मानदंडों के पुनर्मूल्यांकन को प्रेरित करती है, जो एक समावेशी और खुले राजनीतिक माहौल जहां असहमति को जगह मिलती है, की आवश्यकता पर बल देती है।
  • सरकार-विपक्ष सहयोग: प्रभावी शासन हेतु राष्ट्र की व्यापक भलाई के लिए राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर सरकार और विपक्ष के बीच सहयोगात्मक प्रयासों की आवश्यकता होती है।

सारांश: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों का निलंबन लोकतांत्रिक मूल्यों, असहमति की भूमिका और प्रभावी शासन के लिए आवश्यक नाजुक संतुलन के बारे में प्रासंगिक सवाल उठाता है। प्रतिबद्ध सांसदों का ट्रैक रिकॉर्ड विधायी चर्चा में उनके महत्वपूर्ण योगदान को उजागर करता है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित

उच्च शिक्षा में नामांकन

सामाजिक न्याय

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय

मुख्य परीक्षा: उच्च शिक्षा में नामांकन

सन्दर्भ: शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (AISHE) 2021-22, विशेष रूप से महिला छात्रों के बीच उच्च शिक्षा नामांकन में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। 2021-22 में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन लगभग 4.33 करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले शैक्षणिक सत्र के 4.14 करोड़ से अधिक है। नामांकन में यह वृद्धि एक सकारात्मक रुझान है, जिसमें विज्ञान स्ट्रीम की महिला छात्राएं पुरुष समकक्षों से आगे हैं।

नामांकन रुझान

  • समग्र वृद्धि: कुल नामांकन में पर्याप्त वृद्धि देखी गई, 2014-15 से 2021-22 तक 91 लाख की वृद्धि हुई।
  • महिला नामांकन: उच्च शिक्षा में महिला नामांकन 2021-22 में 2.07 करोड़ तक पहुंच गया, जो 2014-15 से 50 लाख की वृद्धि दर्शाता है, जहां 32% की सराहनीय वृद्धि है।
  • पीएच.डी. नामांकन: महिला पीएच.डी. नामांकन 2014-15 के 0.48 लाख से दोगुना होकर 2021-22 में 0.99 लाख हो गया, जो महिलाओं के लिए अनुसंधान-उन्मुख शिक्षा में बड़ी प्रगति को दर्शाता है।

विज्ञान स्ट्रीम की प्रधानता

  • अंतरस्नातक से पीएच.डी. स्तर: 2021-22 में, 57.2 लाख छात्रों ने विज्ञान स्ट्रीम में दाखिला लिया, जिसमें महिला छात्रों (29.8 लाख) ने पुरुष छात्रों (27.4 लाख) को पीछे छोड़ दिया।
  • पीएच.डी. और एम.फिल स्तर: इस रिपोर्ट में विभिन्न शैक्षणिक स्तरों पर विज्ञान स्ट्रीम नामांकन में महिला छात्रों की प्रधानता पर प्रकाश डाला गया है।

सामाजिक आर्थिक कारक

  • ST छात्र नामांकन: ST छात्रों के नामांकन में 2014-15 से 2021-22 तक 65.2% की वृद्धि के साथ पर्याप्त वृद्धि देखी गई।
  • पूर्वोत्तर राज्य: पूर्वोत्तर राज्यों में, 2021-22 में कुल छात्र नामांकन 12.02 लाख तक पहुंच गया, जिसमें महिला नामांकन पुरुष नामांकन से आगे निकल गया।

ओबीसी छात्र नामांकन

  • वृद्धि – रुझान: 2014-15 (1.13 करोड़) की तुलना में 2021-22 (1.63 करोड़) में ओबीसी छात्र नामांकन में 45% की वृद्धि हुई।

विषय वितरण

  • अंतरस्नातक स्तर: अधिकांश छात्र (78.9%) अंतरस्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं, जिसमें कला सबसे लोकप्रिय विषय (34.2%) है, इसके बाद विज्ञान (14.8%), वाणिज्य (13.3%), और इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी (11.8%) हैं।
  • स्नातकोत्तर स्तर: स्नातकोत्तर स्तर पर, सामाजिक विज्ञान में सबसे अधिक नामांकन (21.1%) है, इसके बाद विज्ञान (14.7%) है।

पीएच.डी. नामांकन

  • वृद्धि दर: पीएच.डी. नामांकन में 81.2% की उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जो 2014-15 के 1.17 लाख से बढ़कर 2021-22 में 2.12 लाख हो गई।

निहित मुद्दे

  • लैंगिक असमानताएँ: जहां नामांकन में समग्र वृद्धि हुई है, वहीं कुछ विषयों और क्षेत्रों में लैंगिक असमानताओं पर ध्यान देना महत्वपूर्ण बना हुआ है।
  • विविधता और समावेशन: एसटी और ओबीसी नामांकन में वृद्धि के बावजूद, विविध समुदायों में समान पहुंच और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।

समाधान

  • जागरूकता और पहुँच: कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों और क्षेत्रों में नामांकन को प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित जागरूकता और पहुँच कार्यक्रम लागू करना।
  • छात्रवृत्ति और सहायता: हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छात्रों की उच्च शिक्षा यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और शैक्षणिक सहायता प्रदान करना।

सारांश: AISHE 2021-22 रिपोर्ट उच्च शिक्षा नामांकन में एक सकारात्मक स्थिति का संकेत देती है, जिसमें लैंगिक समावेशिता और विविध समुदायों से बढ़े हुए प्रतिनिधित्व पर जोर दिया गया है। देश में अधिक समावेशी और न्यायसंगत उच्च शिक्षा परिदृश्य को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा असमानताओं को दूर करना और लक्षित समाधान लागू करना महत्वपूर्ण है।

संपादकीय-द हिन्दू

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प्रीलिम्स तथ्य:

1. AMU का अल्पसंख्यक दर्जा

सन्दर्भ: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) की अल्पसंख्यक स्थिति पर चल रहा कानूनी विवाद चर्चा का केंद्र बिंदु बन गया है, जो संवैधानिक प्रावधानों और ऐतिहासिक संशोधनों की व्याख्या की ओर ध्यान आकर्षित कर रहा है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विचाराधीन इस मामले में ‘अल्पसंख्यक प्रकृति’ की परिभाषा और विश्वविद्यालय की स्थिति पर ऐतिहासिक विधायी संशोधनों के निहितार्थ से संबंधित जटिल तर्क शामिल हैं।

‘अल्पसंख्यक प्रकृति’ को समझना

  • संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 30(1) धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार देता है।
  • उपचार में समानता: अनुच्छेद 30(2) एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण से छूट के साथ, अल्पसंख्यक स्थिति से परे सभी शैक्षणिक संस्थानों को सहायता देने में समानता सुनिश्चित करता है।
  • ‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा: टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन (2002) मामले में स्पष्ट किया गया कि अल्पसंख्यक का दर्जा राष्ट्रीय जनसंख्या से नहीं, अपितु संबंधित राज्य की जनसांख्यिकी से निर्धारित होता है।

कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि

  • ऐतिहासिक आधार: सर सैयद अहमद खान ने मुस्लिम शैक्षिक आवश्यकताओं पर ध्यान देने और इस्लामी मूल्यों को संरक्षित करने के लिए 1877 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की।
  • AMU अधिनियम, 1920: कॉलेज को AMU में शामिल करने के लिए AMU अधिनियम लाया गया था, फिर 1951 और 1965 में बाद के संशोधन हुए।
  • कानूनी विवाद की शुरुआत (1967): कानूनी विवाद एस. अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ (UOI) मामले से शुरू हुआ, जिसमें AMU अधिनियम में संशोधन को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1967 में संशोधनों को बरकरार रखा।
  • 1981 संशोधन: राष्ट्रव्यापी विरोध के कारण 1981 में संशोधन किया गया, जिसमें AMU की अल्पसंख्यक स्थिति की पुष्टि की गई।
  • 2005 आरक्षण विवाद: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2005 में आरक्षण नीति को रद्द कर दिया, जिसके कारण 2006 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की गई।
  • 2016 UOI वापसी: 2016 में, भारत संघ AMU की अल्पसंख्यक स्थिति को स्वीकार करने से इनकार करते हुए अपील से पीछे हट गया। विश्वविद्यालय अब मामले को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में समसामयिक मुद्दे

  • अल्पसंख्यक स्थिति के लिए मानदंड: सुप्रीम कोर्ट किसी शैक्षणिक संस्थान की अल्पसंख्यक स्थिति निर्धारित करने के मानदंडों पर विचार-विमर्श कर रहा है।
  • एक क़ानून के तहत स्थापित संस्थान: अदालत यह आकलन कर रही है कि क्या एक क़ानून के तहत स्थापित कोई संस्थान अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त कर सकता है।
  • कानूनी तर्क: याचिकाकर्ता AMU के अल्पसंख्यक दर्जे के अधिकार के लिए तर्क देते हैं, जबकि भारत संघ एस. अज़ीज़ बाशा निर्णय का समर्थन करता है।
  • टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन निर्णय: वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन निर्णय पर भरोसा करते हुए तर्क देते हैं कि वैधानिक नियम या राज्य सहायता किसी संस्था की अल्पसंख्यक प्रकृति को नकारती नहीं है।
  • AMU की ऐतिहासिक प्रकृति: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का तर्क है कि AMU ने ब्रिटिश सरकार को अपने अधिकार सौंप दिए और 1920 के अधिनियम के साथ एक धर्मनिरपेक्ष चरित्र ग्रहण कर लिया।
  • मिसाल कायम करने वाला निर्णय: इस मामले का निर्णय सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों और कानूनी मान्यता को प्रभावित करने वाली एक मिसाल कायम करेगा।

मामले का महत्व

  • अल्पसंख्यक संस्थानों पर प्रभाव: इस मामले के परिणाम का देश भर में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की कानूनी स्थिति और अधिकारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
  • अल्पसंख्यक प्रकृति का संरक्षण: यह मामला ऐतिहासिक संशोधनों और विधायी परिवर्तनों की जटिलताओं से निपटते हुए संस्थानों की अल्पसंख्यक प्रकृति को संरक्षित करने के महत्व पर जोर देता है।

समाधान

  • ऐतिहासिक संशोधनों को संतुलित करना: ऐतिहासिक संशोधनों और अल्पसंख्यक अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के लिए सूक्ष्म कानूनी विचारों की आवश्यकता होती है।
  • कानूनी ढांचे में स्पष्टता: लंबे समय तक चलने वाले विवादों और समस्याओं से बचने के लिए शैक्षणिक संस्थानों की अल्पसंख्यक स्थिति से संबंधित कानूनी ढांचे को स्पष्टता प्रदान की जानी चाहिए।

2. म्यांमार के जातीय अल्पसंख्यक लड़ाकों ने बंदरगाह शहर पर कब्जा किया

सन्दर्भ: म्यांमार में हालिया घटनाक्रम में जातीय अल्पसंख्यक सशस्त्र समूह अराकान आर्मी (AA) ने जुंटा सैनिकों के साथ तीव्र झड़पों के बाद बंदरगाह शहर पॉक्टाव पर नियंत्रण का दावा किया है। यह झड़प की घटना नवंबर में AA द्वारा पॉक्टाव पर एक संक्षिप्त कब्ज़े के बाद आई है, जिसके कारण जुंटा द्वारा लगातार बमबारी की गई। यह स्थिति चल रहे संघर्ष, नागरिकों पर प्रभाव और म्यांमार के राजनीतिक परिदृश्य पर व्यापक प्रभाव को लेकर चिंता पैदा करती है।

पॉक्टाव का रणनीतिक महत्व

  • रणनीतिक अवस्थिति: पश्चिमी रखाईन राज्य की राजधानी में महत्वपूर्ण गहरे पानी के बंदरगाह से पॉक्टाव की निकटता इसके रणनीतिक महत्व को बढ़ाती है।
  • आर्थिक निहितार्थ: बंदरगाह शहर पर नियंत्रण विशेषकर व्यापार और कनेक्टिविटी के मामले में आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।

घटनाओं का कालानुक्रम

  • नवंबर में शुरुआती कब्जा: AA लड़ाकों ने नवंबर में कुछ समय के लिए पॉक्टाव पर कब्जा कर लिया, जिससे 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद स्थापित एक नाजुक युद्धविराम टूट गया।
  • जुंटा की प्रतिक्रिया: नियंत्रण हासिल करने के लिए जुंटा ने तोपखाने, नौसैनिक बमबारी और हेलीकॉप्टरों से गोलीबारी का जवाब दिया।
  • लगातार झड़पें: झड़पें दो महीने से अधिक समय तक जारी रहीं, जिससे पॉक्टाव में बड़े स्तर पर विनाश हुआ।

मानवीय और बुनियादी ढांचे के मुद्दे

  • नागरिक प्रभाव: संघर्ष के परिणामस्वरूप नागरिक हताहत और विस्थापन होने की संभावना है, जिससे मानवीय चुनौतियाँ पैदा होंगी।
  • बुनियादी ढांचे की क्षति: नई गूगल अर्थ चित्रों से शहर में हुई बड़ी क्षति का पता चलता है, शहर का क्षेत्र मलबे में तब्दील हो गया है और कई इमारतें नष्ट हो गई हैं।

सैन्य गतिशीलता

  • AA का नियंत्रण: AA का दावा है कि उसने पॉक्टाव को “पूरी तरह से नियंत्रित” कर लिया है, जिससे जुंटा सैनिकों को नाव से जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
  • जारी प्रतिरोध: AA लड़ाकों ने चौकियां स्थापित कीं और सैन्य नौसैनिक जहाजों के साथ झड़पें जारी रखीं, जो प्रतिरोध के बने रहने का संकेत देता है।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव

  • राजनीतिक परिदृश्य: पॉक्टाव पर AA के नियंत्रण का व्यापक राजनीतिक परिदृश्य पर प्रभाव पड़ता है, जो जुंटा शासन के खिलाफ प्रतिरोध का संकेत देता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय चिंताएँ: मानवाधिकारों के उल्लंघन और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता को लेकर चिंताओं के साथ, म्यांमार की स्थिति अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित कर रही है।

मुद्दे

  • मानवीय संकट: यह संघर्ष मानवीय संकट को लेकर चिंता पैदा करता है, जिसमें नागरिक हताहत की घटना, विस्थापन और आवश्यक सेवाओं की संभावित कमी शामिल है।
  • राजनीतिक स्थिरता: चल रही झड़पें म्यांमार में अस्थिरता में योगदान करती हैं, जिससे राजनीतिक समाधान के प्रयास जटिल हो जाते हैं।
  • आर्थिक व्यवधान: पॉक्टाव जैसे रणनीतिक स्थानों पर नियंत्रण आर्थिक गतिविधियों और व्यापार मार्गों को बाधित कर सकता है, जिससे देश की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

महत्त्व

  • जुंटा के खिलाफ प्रतिरोध: AA का नियंत्रण जुंटा के शासन के खिलाफ जातीय अल्पसंख्यक समूहों के लचीलेपन और प्रतिरोध का प्रतीक है।
  • रणनीतिक निहितार्थ: पॉक्टाव के नियंत्रण का म्यांमार के भीतर रणनीतिक गतिशीलता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करता है।

3. लाल सागर संकट से कंपनियों को नुकसान हो सकता है

सन्दर्भ: भारतीय कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग लाल सागर में चल रही सुरक्षा चिंताओं ने भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। CRISIL रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि लाल सागर में लंबे समय तक चलने वाला संकट भारतीय व्यवसायों की लाभप्रदता, विशेष रूप से निर्यात-उन्मुख उद्योगों में लगे लोगों को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति से केंद्र के उर्वरक सब्सिडी बिल में भी वृद्धि हो सकती है और मुद्रास्फीति का दबाव फिर से बढ़ सकता है। चावल और समुद्री उत्पादों के निर्यातकों के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों के साथ, इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ है।

इंडिया इंक पर प्रभाव

  • प्रमुख व्यापारिक मार्ग: स्वेज नहर द्वारा सुगम लाल सागर मार्ग, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों के साथ व्यापार में संलग्न भारतीय कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में कार्य करता है।
  • महत्वपूर्ण व्यापार मात्रा: वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान लाल सागर से जुड़े क्षेत्रों का भारत के निर्यात में लगभग 50% और आयात में 30% योगदान था।
  • समुद्री व्यापार पर निर्भरता: भारत के माल व्यापार का लगभग 95% समुद्र के माध्यम से भेजा जाता है, जिससे देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए लाल सागर मार्ग महत्वपूर्ण हो जाता है।

निर्यातोन्मुख उद्योग के लिए चुनौतियाँs

  • प्रभावित क्षेत्र: चावल और समुद्री उत्पादों के निर्यातकों को लाल सागर क्षेत्र में हुई अशांति से सबसे अधिक प्रतिकूल रूप से प्रभावित माना जाता है।
  • लाभप्रदता और कार्यशील पूंजी: लंबे समय तक व्यवधान निर्यात-उन्मुख उद्योगों की लाभप्रदता और कार्यशील पूंजी चक्र को प्रभावित कर सकता है।
  • आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दे: प्रमुख शिपिंग मार्ग में संकट से आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है, जिससे निर्यात गतिविधियों में लगे व्यवसायों के लिए चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।

वैकल्पिक मार्गों पर स्थानांतरण

  • विकल्पों पर विचार: लाल सागर में बढ़ते हमलों ने जहाजों के लिए वैकल्पिक मार्गों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है, जैसे कि केप ऑफ गुड होप से आगे का लंबा रास्ता।
  • उच्च पारगमन लागत: वैकल्पिक मार्गों को चुनने से व्यवसायों के लिए पारगमन लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे उनकी समग्र लागत संरचना प्रभावित हो सकती है।

आयात और उर्वरक सब्सिडी पर प्रभाव

  • आयात पर सीमित प्रभाव: गैर-यूरिया उर्वरक जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों पर वर्तमान में सीमित प्रभाव पड़ सकता है।
  • उच्च सब्सिडी की संभावना: सोर्सिंग लागत में निरंतर वृद्धि से आयात-निर्भर क्षेत्रों को सहयोग प्रदान करने के लिए सरकार से उच्च सब्सिडी भुगतान की आवश्यकता हो सकती है।

मुद्दे

  • सुरक्षा चिंताएँ: लाल सागर क्षेत्र में लंबे समय तक सुरक्षा चिंताएँ माल की सुरक्षित और कुशल आवाजाही के लिए खतरा पैदा करती हैं, जिससे व्यापार प्रभावित होता है।
  • निर्यात चुनौतियाँ: प्रमुख शिपिंग मार्ग में व्यवधानों के बीच निर्यात-उन्मुख उद्योगों को लाभप्रदता बनाए रखने और अपनी कार्यशील पूंजी के प्रबंधन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

महत्त्व

  • आर्थिक भेद्यता: लाल सागर में चल रहा संकट भू-राजनीतिक घटनाओं और प्रमुख व्यापारिक मार्गों में सुरक्षा चुनौतियों के प्रति भारत की आर्थिक भेद्यता को सामने लाता है।
  • मुद्रास्फीति का दबाव: आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और पारगमन लागत में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति का दबाव फिर से बढ़ सकता है।

समाधान

  • व्यापार मार्गों का विविधीकरण: एकल मार्ग पर निर्भरता को कम करने और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के प्रति लचीलापन बढ़ाने हेतु व्यवसायों को अपने व्यापार मार्गों में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • उन्नत सुरक्षा उपाय: माल और जहाजों के सुरक्षित मार्ग को सुनिश्चित करने के लिए लाल सागर क्षेत्र में सुरक्षा उपायों को बढ़ाने के लिए सहयोगात्मक प्रयास।
  • सरकारी सहायता: वैकल्पिक मार्गों के कारण बढ़ी हुई लागत का सामना करने वाले क्षेत्रों के लिए सब्सिडी सहित अन्य सहायता प्रदान करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप।

4. वैभव फ़ेलोशिप कार्यक्रम

सन्दर्भ: इस आलेख में वैभव नामक हाल ही में घोषित फ़ेलोशिप कार्यक्रम पर चर्चा की गई है, जिसका उद्देश्य भारत में भारतीय मूल या वंश के वैज्ञानिकों और अनुसंधान प्रयोगशालाओं के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है। यह पहल इन शोधकर्ताओं को तीन साल तक सालाना तीन महीने तक कनेक्शन बनाने, परियोजनाएं शुरू करने और भारतीय अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान करने की सुविधा प्रदान करती है। जहां इस कार्यक्रम में VAJRA फैकल्टी योजना की तरह समानताएं हैं, वहीं इस आलेख में विशेष रूप से भारतीय प्रवासियों पर ध्यान केंद्रित करने में भारत के उद्देश्यों पर स्पष्टता की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

वैभव और VAJRA: एक तुलनात्मक विश्लेषण

  • उद्देश्य संरेखण: वैभव और VAJRA दोनों का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संकाय और भारतीय अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को सुविधाजनक बनाना है।
  • लक्षित दर्शक: वैभव विशेष रूप से भारतीय प्रवासियों को लक्षित करता है, जबकि VAJRA विभिन्न राष्ट्रीयताओं के शोधकर्ताओं के लिए खुला है।
  • सहयोग की अवधि: वैभव तीन साल की सहयोग अवधि प्रदान करता है, जबकि VAJRA एक साल की सहयोग-अवधि तक सीमित थी।
  • प्रशासन: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) दोनों योजनाओं की निगरानी करता है।

‘प्रतिभा पलायन’ और भारतीय अनुसंधान में चुनौतियाँ

  • ऐतिहासिक संदर्भ: ‘प्रतिभा पलायन’ का मुद्दा लंबे समय से चिंता का विषय रहा है, प्रतिभाशाली शोधकर्ता विदेशों में अवसर तलाश रहे हैं।
  • अल्पकालिक फ़ेलोशिप की भूमिका: अल्पकालिक फ़ेलोशिप विदेशी संकाय (फैकल्टी) को आकर्षित करने, उन्हें भारत की वैज्ञानिक क्षमता से अवगत कराने और अनुसंधान परिदृश्य में चुनौतियों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • नीति परिवर्तन की आवश्यकता: अदला-बदली कार्यक्रम बुनियादी अनुसंधान के लिए अपर्याप्त धन, निजी कंपनियों द्वारा सीमित भागीदारी और अकादमिक स्वतंत्रता पर सीमा, संभावित रूप से नीति समायोजन को प्रेरित करने जैसी चुनौतियों को सामने ला सकते हैं।

भारतीय प्रवासियों की भूमिका

  • संभावित लाभ: विदेशों में, विशेष रूप से अमेरिकी और यूरोपीय विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित कुशल वैज्ञानिक जनशक्ति के विशाल पूल का लाभ उठाकर, भारत के वैज्ञानिक विकास में योगदान दिया जा सकता है।
  • यथार्थवादी अपेक्षाएँ: हालाँकि इस भागीदारी का उद्देश्य भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को भारत में रहने या वापस लौटने के लिए प्रोत्साहित करना है, लेकिन यथार्थवादी अपेक्षाओं के तहत इन पहलों का मार्गदर्शन होना चाहिए।

उद्देश्यों पर स्पष्टता

  • स्पष्टता की आवश्यकता: इस आलेख में विशेष रूप से भारतीय प्रवासियों को लक्षित करने में भारत के उद्देश्यों के संबंध में स्पष्टता के महत्व पर प्रकाश डाला गया है।
  • लाभ की पहचान: VAJRA योजना के निरंतर अस्तित्व को देखते हुए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत को इस तरह की गतिविधियों से क्या हासिल होने की उम्मीद है।

मुद्दे

  • VAJRA की प्रभावशीलता: VAJRA योजना की प्रभावशीलता पर चिंताएं जताई गई हैं, जिससे व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता महसूस होती है।
  • जातीय-राष्ट्रवादी सीमा: इस आलेख में सवाल उठाया गया है कि क्या वैभव में जातीय-राष्ट्रवादी सीमा, जो विशेष रूप से भारतीय मूल के शोधकर्ताओं पर केंद्रित है, वांछित परिणाम देगा?

महत्त्व

  • सहयोग को बढ़ावा देना: वैभव और VAJRA जैसे आदान-प्रदान कार्यक्रम भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने और वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में योगदान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • चुनौतियों का समाधान: विदेशी संकाय को भारतीय अनुसंधान परिदृश्य में चुनौतियों से अवगत कराकर, इन पहलों में सकारात्मक नीतिगत बदलाव लाने की क्षमता है।

समाधान

  • स्पष्ट उद्देश्य: भारतीय प्रवासियों के साथ जुड़ने के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना वैभव जैसी पहल के सफल कार्यान्वयन का मार्गदर्शन कर सकता है।
  • मूल्यांकन और अनुकूलन: सुधार के क्षेत्रों की पहचान करने और बदलती गतिशीलता के अनुकूल अनुकूलन के लिए VAJRA जैसे कार्यक्रमों का नियमित मूल्यांकन आवश्यक है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

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UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

1. भारत-फ्रांस संबंध के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत करने के लिए 2023 में दूतावास में एक DRDO कार्यालय खोला गया।

2. फ्रांस से मुख्य आयात विमानन उत्पाद, मशीन उपकरण, विद्युत उपकरण और रासायनिक उत्पाद हैं।

3. जुलाई 2022 में, एफिल टॉवर से यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) लॉन्च किया गया, जो भारतीय आगंतुकों और NRI के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक लेनदेन प्रस्तुत करता है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. कोई एक
  2. कोई दो
  3. सभी तीन
  4. इनमे से कोई भी नहीं

उत्तर: B

व्याख्या: प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत करने के लिए 2023 में दूतावास में एक DRDO कार्यालय खोला गया था। फ़्रांस से मुख्य आयात विमानन उत्पाद, मशीन उपकरण, विद्युत उपकरण और रासायनिक उत्पाद हैं। जुलाई 2023 में, एफिल टॉवर से यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) लॉन्च किया गया, जो भारतीय आगंतुकों और NRI के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक लेनदेन प्रस्तुत करता है।

2. भारत में निम्नलिखित में से कितनी साड़ियों को GI (भौगोलिक संकेतक) टैग प्रदान किया गया है?

  1. उप्पदा जामदनी साड़ी
  2. वेंकटगिरी साड़ी
  3. मंगलागिरी साड़ी
  4. धर्मावरम हैंडलूम पट्टू साड़ी

निम्नलिखित में से सही कूट का चयन कीजिए:

  1. कोई एक
  2. कोई दो
  3. कोई तीन
  4. सभी चार

उत्तर: D

व्याख्या: भारत में GI (भौगोलिक संकेतक) टैग उप्पदा जामदानी साड़ी, वेंकटगिरी साड़ी, मंगलागिरी साड़ी और धर्मावरम हैंडलूम पट्टू साड़ी को दिया गया है।

3. वैभव फ़ेलोशिप के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. जून 2023 में शुरू की गई वैभव फ़ेलोशिप, भारतीय संस्थानों के साथ अल्पकालिक सहयोग हेतु विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए तैयार की गई है।
  2. प्रत्येक चयनित वैभव फेलो को भारत में रहने के दौरान आवास के साथ-साथ प्रति माह ₹5 लाख का वजीफा मिलता है।
  3. फेलो मेज़बान भारतीय संस्थानों के साथ सहयोग करते हुए, अधिकतम पाँच वर्षों तक भारत में सालाना एक या दो महीने बिताने के प्रति प्रतिबद्धता प्रकट करते हैं।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. कोई 1
  2. कोई 2
  3. सभी 3
  4. इनमे से कोई भी नहीं

उत्तर: A

व्याख्या: जून 2023 में शुरू की गई वैभव फ़ेलोशिप, भारतीय संस्थानों के साथ अल्पकालिक सहयोग हेतु विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए तैयार की गई है। फ़ेलोशिप में फ़ेलोशिप अनुदान (INR 4,00,000 प्रति माह), अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू यात्रा, आवास और आकस्मिकताएँ शामिल होंगी। वैभव फेलो सहयोग के लिए एक भारतीय संस्थान की पहचान करेगा और अधिकतम 3 वर्षों के लिए एक वर्ष में दो महीने तक का समय दे सकता है।

4. भारत में वीरता पुरस्कारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. स्वतंत्रता के बाद, पहले तीन वीरता पुरस्कार अर्थात् परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र 26 जनवरी 1950 को भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए थे और 15 अगस्त 1947 से प्रभावी माने गए थे।
  2. इसके बाद, तीन अन्य वीरता पुरस्कार – अशोक चक्र श्रेणी-I, अशोक चक्र श्रेणी-II, और अशोक चक्र श्रेणी-III – 1952 में शुरू किए गए और 15 अगस्त 1947 से प्रभावी माने गए। इन पुरस्कारों का नाम बदलकर जनवरी 1967 में क्रमशः अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र कर दिया गया।
  3. इन पुरस्कारों का वरीयता क्रम परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र और शौर्य चक्र है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. कोई 1
  2. कोई 2
  3. सभी 3
  4. इनमे से कोई भी नहीं

उत्तर: C

व्याख्या: स्वतंत्रता के बाद, पहले तीन वीरता पुरस्कार अर्थात् परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र 26 जनवरी 1950 को भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए थे और 15 अगस्त 1947 से प्रभावी माने गए थे।

इसके बाद, तीन अन्य वीरता पुरस्कार – अशोक चक्र श्रेणी-I, अशोक चक्र श्रेणी-II, और अशोक चक्र श्रेणी-III – 1952 में शुरू किए गए और 15 अगस्त 1947 से प्रभावी माने गए। इन पुरस्कारों का नाम बदलकर जनवरी 1967 में क्रमशः अशोक चक्र, कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र कर दिया गया।

इन पुरस्कारों का वरीयता क्रम परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र और शौर्य चक्र है।

5. कीमतों के सामान्य स्तर में वृद्धि निम्नलिखित में से किसके कारण हो सकती है?

1. मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि

2. उत्पादन के समग्र स्तर में कमी

3. प्रभावी मांग में वृद्धि

निम्नलिखित कूट का उपयोग कर सही उत्तर का चयन कीजिए।

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: D

व्याख्या: कीमतों के सामान्य स्तर में वृद्धि कई कारकों के कारण हो सकती है जैसे मुद्रा आपूर्ति में वृद्धि, उत्पादन के कुल स्तर में कमी, प्रभावी मांग में वृद्धि, आय में वृद्धि, जनसंख्या में तेजी से वृद्धि आदि। .

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

Q1) विशेष रूप से सर्दियों के महीनों के दौरान अनुभव होने वाली असामान्य शुष्कता पर ध्यान केंद्रित करते हुए हिमालयी क्षेत्र में हाल के जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव का परिक्षण कीजिए। इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, जल संसाधनों और स्थानीय समुदायों पर इन परिवर्तनों के संभावित दीर्घकालिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। [15 अंक, 250 शब्द] (सामान्य अध्ययन – I, भूगोल)

Examine the impact of recent climatic changes in the Himalayan region, particularly focusing on the unusual dryness experienced during the winter months. Analyze the potential long-term implications of these changes on the region’s ecology, water resources, and local communities. [15 Marks, 250 words] (General Studies – I, Geography)

Q2) उन कारकों का विश्लेषण कीजिए जिन्होंने भारत में उच्च शिक्षा नामांकन में उल्लेखनीय वृद्धि में योगदान दिया है, जैसा कि उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (AISHE) 2021-22 में उजागर किया गया है। भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य पर इन बढ़ी हुई नामांकन संख्या के प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए। [15 अंक, 2150 शब्द] (सामान्य अध्ययन – II, सामाजिक मुद्दे)​

Analyze the factors that have contributed to the significant increase in higher education enrolment in India, as highlighted in the All India Survey on Higher Education (AISHE) 2021-22. Evaluate the impact of these increased enrolment numbers on India’s socio-economic landscape. [15 Marks, 2150 words] (General Studies – II, Social issues)

(नोट: मुख्य परीक्षा के अंग्रेजी भाषा के प्रश्नों पर क्लिक कर के आप अपने उत्तर BYJU’S की वेव साइट पर अपलोड कर सकते हैं।)