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Question

From the standpoint of the theory of justice, the most important natural duty is that to support and to further just institutions. This duty has two parts: first, we are to comply with and to do our share in just institutions when they exist and apply to us; and second, we are to assist in the establishment of just arrangements when they do not exist, at least when this can be done with little cost to ourselves. It follows that if the basic structure of society is just as it is reasonable to expect in the circumstances, everyone has a natural duty to do what is required of him. Each is bound irrespective of his voluntary acts, performative or otherwise. Now our question is why this principle rather than some other would be adopted. As in the case of institutions, there is now way, let us assume, for the parties to examine all the possible principles that might be proposed. The many possibilities are not clearly defined and among them there may be no best choice. To avoid these difficulties I suppose, as before, that the choice is to be made from a short list of traditional and familiar principles.

Q. What is the central message of the passage?

न्यायिक सिद्धांत के दृष्टिकोण के अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण स्वभाविक कर्तव्य, न्यायोचित संस्थानों को प्रोत्साहित करना और उन्हें आगे बढ़ाना है। इस कर्तव्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, जहाँ न्यायोचित संस्थानों का अस्तित्व है और वे हम पर लागू होते हैं, उनके लिए अपना योगदान देना और उनका पालन करना और दूसरा, जहाँ इस प्रकार के संस्थान अस्तित्व में नहीं हैं, वहां उनकी स्थापना में सहायता प्रदान करना, विशेषकर उस स्थिति में जब इसमें हमारी अपनी नाम-मात्र की लागत आ रही हो। इसका यह परिणाम निकलता है कि यदि समाज का आधारभूत ढांचा न्यायोचित है, या उतनी ही न्यायोचित है, जिसकी सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षा की जा सकती है तो प्रत्येक का यह स्वभाविक कर्तव्य है कि जिससे जो अपेक्षा की जाती है, वह वो कार्य करे। अपने स्वैच्छिक कार्यो (निष्पादक या अन्य कृत्य) से पृथक (अनपेक्ष) प्रत्येक व्यक्ति बाध्य है। अब हमारा प्रश्न यह है कि इस सिद्धांत को किसी अन्य के स्थान पर क्यों अपनाया जाए? जैसा संस्थानों के प्रकरणों में होता है, मान लीजिये ऐसा कोई मार्ग नहीं है जिससे सभी पक्ष प्रस्तावित किए जा सकने वाले सभी सिद्धांतों का परीक्षण कर सके। अनेक सम्भावनायें तो स्पष्ट रूप से परिभाषित नही हैं और उनमें से हो सकता है कोई भी सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं हो। इन कठिनाइयों से बचने के लिए, पूर्व की भांति मैं यही मानता हूं कि विकल्प का चुनाव, परम्परागत और प्रचलित सिद्धांतों की एक संक्षिप्त सूची में से किया जाना है।

Q. इस परिच्छेद का केन्द्रीय भाव क्या है?
  1. Our duty to support and to further just institutions.

    न्यायोचित संस्थानों को प्रोत्साहित करने और उन्हें आगे बढ़ाना हमारा कर्तव्य है।

     
  2. Discussing the Theory of Justice.

    न्याय के सिद्धांत की चर्चा करना।
  3. Traditional and familiar principles as guide to our natural duty.

    हमारे स्वभाविक कर्तव्यों के मार्गदर्शक के रूप में परम्परागत और प्रचलित सिद्धांत।
  4. Natural duties of every individual.

    प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाविक कर्तव्य।


Solution

The correct option is A Our duty to support and to further just institutions.

न्यायोचित संस्थानों को प्रोत्साहित करने और उन्हें आगे बढ़ाना हमारा कर्तव्य है।

 
Statement a) is correct as it flows throughout the passage and serves as its central message.

Statement b) is incorrect as the passage does not cover a discussion on theory of justice per se. passage mostly deals with just institutions. Thus, just institutions may be a part of theory of justice.

Statement c) is incorrect because its ambit is broader than what the passage covers. Natural duties is a broader term.

Statement d) is also incorrect as it partially addresses the message of the passage.

कथन (a) सही है क्योंकि यह पूरे परिच्छेद में प्रवाहित होता है और इसकी केन्द्रीय विषय वस्तु का कार्य भी करता है।

कथन (b) गलत है क्योंकि परिच्छेद में स्वयं न्याय के सिद्धांतों पर चर्चा नहीं की गयी है। परिच्छेद में अधिकांश समय न्यायोचित संस्थाओं की ही बात करता है। इस प्रकार न्यायोचित संस्थान, न्याय के सिद्धांत का एक अंग हो सकते हैं।

कथन (c) गलत है क्योंकि इसका क्षेत्र, परिच्छेद के क्षेत्र से बहुत व्यापक है। स्वभाविक कर्तव्य एक व्यापक शब्द है।

कथन (d) गलत है, क्योंकि यह परिच्छेद के संदेश की आंशिक रूप से ही बात करता है।

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