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Question

Read the following passage(s) and answer the items that follow each passage. Your answers to these items should be based on the passages only.

PASSAGE 1

Bertrand Russell, who was a firm atheist, was once asked what he would do if, following his death, he were to encounter God after all. Russell is supposed to have answered, “I will ask him: God Almighty, why did you give so little evidence of your existence?” Certainly appalling world in which we live does not—at least on the surface—look like one in which an all-powerful benevolence is having its way. It is hard to understand how a compassionate world order can include so many people afflicted by acute misery, persistent hunger and deprived and desperate lives, and why millions of innocent children have to die each year from lack of food or medical attention or social care.

This issue, of course, is not new, and it has been a subject of some discussion among theologians. The argument that God has reasons to want us to deal with these matters ourselves has had considerable intellectual support. As a nonreligious person, I am not in a position to assess the theological merits of this argument. But I can appreciate the force of the claim that people themselves must have the responsibility for the development and change of the world in which they live. One does not have to be either devout or non-devout to accept this basic connection. As people who live—in a broad sense—together, we cannot escape the thought that the terrible occurrences that we see around us are quintessentially our problems. They are our responsibility—whether or not they are also anyone else’s.

Q63. What is the essential message of the passage?

 

निम्नलिखित परिच्छेदों को पढ़िए और प्रत्येक परिच्छेद के आगे आने वाले प्रश्नों के उत्तर दीजिए। इन प्रश्नों के आपके उत्तर इन परिच्छेदों पर ही आधारित होने चाहिए।

परिच्छेद - 1

पूर्णरूपेण नास्तिक बर्ट्रेंड रसेल से एक बार पूछा गया कि मृत्यु के पश्चात ईश्वर से साक्षात्कार हो जाने पर वह क्या करेगा। जहां तक पता है, रसेल ने उत्तर दिया, ‘‘मैं उससे पूछूँगाः सर्वशक्तिमान प्रभु, आपके अस्तित्व का इतना कम प्रमाण क्यों उपलब्ध है?’’ निश्चय की हमारा निवास स्थान, यह भयकारी संसार कम से कम ऊपर से उस परम उदार प्रभु की इच्छाओं का पालन करता प्रतीत नहीं होता। यह समझना दुष्कर है कि एक करूणामयी विश्व व्यवस्था में इतने अधिक लोग दुःख ग्रस्त, सतत रूप से क्षुधा ग्रस्त तथा सुविधा वंचित और निराशामय जीवन किस प्रकार व्यतीत कर रहे हो सकते हैं, तथा क्यों लाखों बच्चों को प्रति वर्ष भोजन, या स्वास्थ्य संबंधी तथा सामाजिक देख-भाल के अभाव में मृत्यु को प्राप्त होना होता है।

निश्चय ही यह मुद्दा नया नहीं है, तथा धर्मशास्त्रियों के बीच इस बात को ले कर चर्चा भी होती रही है। इस तर्क को कि ईश्वर की इस इच्छा के पुख्ता कारण हैं कि वह चाहता है कि हम स्वयं इन मुद्दों का समाधान तलाशें, तथा इस तर्क को बहुत कुछ बौद्धिक समर्थन भी प्राप्त है। एक अधार्मिक व्यक्ति के रूप में मैं इस तर्क की धर्मशास्त्र संबंधी विशेषता का मूल्यांकन करने की स्थिति में नहीं हूँ कि लोगों को स्वयं की अपने निवास स्थान इस संसार के विकास तथा परिवर्तन का उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए। इस आधारभूत जुड़ाव को स्वीकार करने के लिए हमें आस्थावान या आस्थारहित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। व्यापक अर्थां में, एक साथ रहने वाले लोगों के रूप में हम इस विचार से बच कर नहीं निकल सकते कि हमारे आस-पास घट रही भयंकर घटनाएं विशिष्ट रूप से हमारी ही समस्याएँ हैं। चाहे वे अन्य किसी और के हों या नहीं, लेकिन हमारे उत्तरदायित्व अवश्य हैं।

Q63. इस परिच्छेद का मूल सन्देश क्या है?



A

(a) It is hard to justify the existence of an all powerful benevolence given the level of misery in this world.

(a) संसार में वर्तमान कष्टों के स्तर को देखते हुए सर्वशक्तिमान करूणामय के अस्तित्व को प्रमाणित करना कठिन है।

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B

(b) People should take responsibility for various terrible occurrences around them and not just blame God for these.

(b) लोगों को स्वयं के इर्द-गिर्द विविध भयानक घटनाओं के लिए केवल ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए बल्कि स्वयं उनका उत्तदायित्व स्वीकार करना चाहिए।

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C

(c) Existence of misery in this world does not prove anything about whether God exists or not.

(c) इस संसार में कष्टों का होना ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में कुछ प्रमाणित नहीं करना।

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D

(d) There is very little evidence of existence of God.

(d) ईश्वर के अस्तित्व के बहुत कम प्रमाण है।

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Solution

The correct option is B

(b) People should take responsibility for various terrible occurrences around them and not just blame God for these.

(b) लोगों को स्वयं के इर्द-गिर्द विविध भयानक घटनाओं के लिए केवल ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए बल्कि स्वयं उनका उत्तदायित्व स्वीकार करना चाहिए।


Paragraph 1 argues existence of an all powerful benevolence does not seem likely given the level of misery in this world. But paragraph 2 refute this and argue that existence of misery does not prove anything about the existence of God. It suggests that God may have reasons to want us to deal with these matters ourselves. It further says that as people who live—in a broad sense—together, we cannot escape the thought that the terrible occurrences that we see around us are quintessentially our problems. They are our responsibility—whether or not they are also anyone else‘s. Thus the essential message of the passage is that we should take responsibility for these problems.

अनुच्छेद 1 में यह तर्क प्रस्तुत है कि इस जगत में कष्टों के स्तर को देखते हुए सर्वशक्तिमान करुणामय के अस्तित्व की संभावना नहीं दिखती। किन्तु अनुच्छेद 2 में इस तर्क की काट की गयी है तथा यह तर्क दिया गया है कि कष्ट के अस्तित्व से ईश्वर के अस्तित्व के विषय में कुछ प्रमाणित नहीं होता। इसके अनुसार ईश्वर की इस इच्छा के पुख्ता कारण हैं कि वह चाहता है कि हम स्वयं इन मुद्दों का समाधान तलाशें। आगे उसका कहना है कि व्यापक अर्थ में, एक साथ रहने वाले लोगों के रूप में हम इस विचार से बच कर नहीं निकल सकते कि हमारे आस-पास घट रही भयंकर घटनाएं विशिष्ट रूप से हमारी ही समस्याएँ हैं। चाहे वे अन्य किसी और के हों या नहीं, किन्तु हमारे उत्तरदायित्व अवश्य हैं। इस प्रकार, इस परिच्छेद का आवश्यक सन्देश यह है कि हमें इन समस्याओं का उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए।


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