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Question

States like Maharashtra and now Haryana, have taken the lead in making it necessary of have a functioning toilet for members of local bodies. Again, this is an instance of an important social reform unthinking to the idea of representation. No doubt, public defecation is a problem. Yet, more than high profile campaigns involving film stars, it requires a huge provisioning for not just constructing toilets (for which states do often make funds available) but also for ensuring water supply. Every local body should therefore be empowered not in terms of taking action against defaulters, but in having adequate monetary and water resources to meet this objective. Unfortunately by imposing an eligibility condition, state governments have displayed not just cavalier tokenism but also an utter disregard to the different purposes of the two issues involved.

Open defecation is a practice that undermines both the privacy and dignity of a person and thus needs to be addressed through entirely different measures. In a rural set-up who is least likely to have a functioning toilet at home? Unfortunately, the disturbing conclusion is that the socially and economically underprivileged sections such as the landless dalits, adivasis, are most likely to be the offenders. So, even as the constitution both seeks and provides for their entry into local power circles, state governments, in the guise of social reform, ensure that they cannot effectively and freely enter the arena – a second instance of democracy being trumped by unrelated criteria applied unfairly.

Q68. With reference to the above passage, the following assumption have been made:
1. The eligibility of Maharashtra and Haryana would hinder the entrance of some socially underprivileged section into local power circles.
2. Open defecation is a complex issue that has factors like social structures, economic issues and availability of physical resources that need to be taken into consideration.
Which of the above is/are valid assumptions?

महाराष्ट्र और अब हरियाणा जैसे राज्यों ने स्थानीय निकायों के सदस्यों के लिए कार्यशील शौचालय के निर्माण आवश्यक कर बढ़त हासिल कर ली है। इसके साथी ही, बिना शंका यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार के दृष्टांत विचार से जुड़ा है। निस्संदेह, सार्वजनिक शौच एक समस्या है। अभी तक, उच्च आकर्षक (प्रोफाइल) से, अधिक फिल्मी सितारों को शामिल कर रहे हैं, इन अभियानों की आवश्यकता न केवल शौचालयों के निर्माण (जिसके लिए राज्यों को अक्सर निधियाँ दी जाती हैं) के लिए विशाल प्रावधान की आवश्यकता है, बल्कि जलापूर्ति भी सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसलिए प्रत्येक स्थानीय निकाय को चूककर्ता के विरुद्ध कार्रवाई करने के संदर्भ में सशक्त ही नहीं, बल्कि इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पर्याप्त मुद्रा और जल संसाधन का होना भी आवश्यक है। दुर्भाग्यवश, अहर्ता शर्त अधिरोपण से राज्य सरकारों ने न केवल एकीकृत टोकनवाद प्रदर्शित किए, बल्कि इस दो मुद्दों में अंतविष्ट दो मुद्दों के विभिन्न उद्देश्यों की बिल्कुल उपेक्षा भी, प्रदर्शित किए।

खुले में शौच ऐसा अभ्यास है, जो व्यक्ति की निजता और गरिमा दोनों को कमजोर करता है और इस प्रकार संपूर्ण रूप से विभिन्न उपायों को संबोधित करने की आवश्यकता है। ग्रामीण परिवेश में किसके पास घर में कार्यशील शौचालय की बहुत ही कम संभावना है? दुर्भाग्यवश परेशान करने वाला निस्कर्ष है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्ग जैसे कि भूमिहीन, दलितों, आदिवासियों, के ‘चूककर्ता' होने की सर्वाधिक संभावना है। इसलिए, यहाँ तक कि संविधान चाहता एवं प्रावधान करता है कि उनकी पहुँच स्थानीय शक्ति सत्ता तक हो सके, राज्य सरकारें सामाजिक सुधार की आड़ में, यह सुनिश्चित करें कि वे मैदान में प्रभावी ढंग से और स्वतंत्र रूप से प्रवेश नहीं कर सकते हैं - यह असंबंधित मानदंडों द्वारा लोकतंत्र को दबाने के दूसरे उदाहरण, से गलत तरीके से लागू किया गया है।

Q. उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनायी जा सकती है:
1. महाराष्ट्र एवं हरियाणा के मानदंडों के कारण, कुछ सामाजिक दृष्टि से वंचित वर्गों के स्थानीय पॉवर सर्कल में, प्रवेश में बाधा पहुँच सकती है।
2. खुले में शौच का मुद्दा एक जटिल मुद्दा है जिसमें सामाजिक संरचना, आर्थिक मुद्दे एवं भौतिक संसाधनों की उपलब्धता, जैसे कारकों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से वैध धारणा/धारणाएँ है/हैं?
  1. Only 1

    केवल 1
  2. Only 2

    केवल 2
  3. Both 1 and 2

    1 और 2 दोनों
  4. None of the above

    इनमे से कोई नहीं


Solution

The correct option is C Both 1 and 2

1 और 2 दोनों
Both assumptions can be made based on the information given in the passage. Assumption 1 is correct as the author criticizes the move of the state movements on this very basis. Assumption 2 is correct as the passage mentions economic factors (lack of funds) social factors (caste system) and lack of physical resources (water).

परिच्छेद में दी गई सूचना के आधार पर दोनों ही धारणाएँ वनायी जा सकती हैं। धारणा 1 सही है क्योकि लेखक इसी आधार पर राज्य सरकारों के कदम की आलोचना करता है। धारणा 2 सही है क्योंकि परिच्छेद द्वारा, आर्थिक कारक (धन की कमी), सामाजिक कारक (जाति व्यवस्स्था) एवं भौतिक संसाधनों की कमी (जल) का उल्लेख किया गया है।

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