हाल ही में, उत्तर प्रदेश के बनारस में स्थित ‘काशी विश्वनाथ ज्ञानवापी मस्जिद’ का विवाद देश के प्रमुख मुद्दों में से एक है और इस मुद्दे पर अब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है।
कुछ समय पूर्व ही, राम मंदिर मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया था। इसके अलावा, मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के मंदिर निर्माण को लेकर भी एक वर्ग द्वारा आवाज उठाई द्वारा जा रही है। ऐसे में, इन सभी मुद्दों के आलोक में ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991’ चर्चा में आ गया है।
यह अधिनियम वर्ष 1991 में पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक स्थलों के धार्मिक चरित्र को संरक्षित करना तथा उनसे संबंधित विवादों का समाधान करता था। उल्लेखनीय है कि इस अधिनियम के पारित होने के ठीक अगले साल ही वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया गया था।
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विवाद का कारण
- इस विवाद का मूल कारण ऐतिहासिक है। वास्तव में, देश का हिंदू पक्ष ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर सिद्ध हुई इस बात को अपनी अस्मिता पर चोट मानता है कि पूर्व के ऐतिहासिक काल खंड में मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत के मंदिरों को तोड़कर उन्हें मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया था। हिन्दू पक्ष का मत है कि पूर्व में कई गई उन ऐतिहासिक गलतियों को अब सुधारा जाना चाहिए।
- इसके विपरीत, देश का मुस्लिम पक्ष उन विवादित धार्मिक स्थलों की यथास्थिति को बनाए रखना चाहता है और उनमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन को अपनी धार्मिक अस्मिता पर चोट मानता है। इसी विवाद के समाधान के लिए वर्ष 1991 में भारतीय संसद द्वारा ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम’ पारित किया गया था और अब ज्ञानवापी मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच उपजे विवाद के समाधान के लिए न्यायालय द्वारा सुनवाई की जा रही है।
अधिनियम से संबंधित प्रमुख प्रावधान
- इस अधिनियम की धारा 2 में ‘उपासना स्थल’ शब्द को परिभाषित किया गया है। इसे परिभाषित करते हुए कहा गया है कि उपासना स्थल के अंतर्गत ऐसा सार्वजनिक धार्मिक स्थल शामिल होगा, जो किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर, मठ या किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग से संबंधित हो।
- इस अधिनियम की धारा 3 में यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी धर्म या उसके किसी संप्रदाय के किसी उपासना स्थल का, उसी धर्म के किसी अन्य संप्रदाय के उपासना स्थल में या किसी अन्य धर्म या उसके किसी संप्रदाय के उपासना स्थल में रूपांतरण नहीं करेगा।
- इस अधिनियम की धारा 4(1) में यह घोषित किया गया है कि देश भर में मौजूद उपासना स्थलों का धार्मिक स्वरूप ठीक वैसा ही बना रहेगा, जैसा कि भारत की आजादी के दिन 15 अगस्त, 1947 को था।
- इस अधिनियम की धारा 4(2) में यह प्रावधान किया गया है कि 15 अगस्त, 1947 के दिन विद्यमान किसी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन से संबंधित यदि कोई वाद, अपील या कोई अन्य कार्यवाही किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य किसी प्राधिकारी के समक्ष लंबित है, तो उसे समाप्त माना जाएगा और उस विवाद से संबंधित कोई नई याचिका दायर करने की अनुमति भी नहीं होगी। इसके अलावा, यदि 15 अगस्त 1947 के दिन उपस्थित किसी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन कर दिया गया है, तो न्यायालय में उससे संबंधित वाद आरंभ किया जा सकेगा।
- यह अधिनियम राज्य पर ऐसा सकारात्मक दायित्व आरोपित करता है कि राज्य 15 अगस्त, 1947 के दिन उपस्थित किसी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र को बनाए रख सके।
- इस अधिनियम की धारा 6 में अधिनियम का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत यह घोषित किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, तो उसे अधिकतम 3 वर्ष की कैद अथवा जुर्माना अथवा दोनों के माध्यम से दंडित किया जा सकता है।
इस अधिनियम के तहत छूट प्राप्त धार्मिक स्थल
- इस अधिनियम की धारा 5 के तहत उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित ‘राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद’ नामक धार्मिक स्थल को छूट प्रदान की गई है। इसका अर्थ है कि बेशक यह धार्मिक स्थल 15 अगस्त, 1947 के दिन मौजूद था, लेकिन यदि किसी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र में परिवर्तन किया जाता है तो यह अधिनियम इस पर रोक नहीं लगाता है।
- यह अधिनियम किसी ऐसे धार्मिक स्थल पर भी लागू नहीं होता है, जो कोई प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्मारक हो।
- इसके अलावा, यह अधिनियम किसी ऐसे धार्मिक स्थल पर भी लागू नहीं होता है, जिसे ‘पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत संरक्षण प्रदान किया गया हो।
- इस अधिनियम की कोई बात किसी ऐसे धार्मिक स्थल पर भी लागू नहीं होगी, जिससे संबंधित विवाद उसमें शामिल पक्षों द्वारा आपसी सहमति के माध्यम से सुलझा लिया गया हो।
अधिनियम का महत्व
- चूँकि यह अधिनियम 15 अगस्त, 1947 के दिन उपस्थित लोक धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र में किए जाने वाले किसी भी परिवर्तन को प्रतिबंधित करता है, इसीलिए यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को बढ़ावा देता है और धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का मूल ढांचा है।
- यह अधिनियम लोक धार्मिक स्थलों की यथास्थिति को स्वीकार करता है, इसीलिए यह अधिनियम न सिर्फ देश में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, बल्कि देश में सांप्रदायिक विभेद को कम करने की कोशिश भी करता है।
- जिन परिस्थितियों में यह अधिनियम लाया गया था, उस दौर में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। उस समय लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में रथ यात्रा भी निकाली गई थी और उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव अत्यधिक बढ़ गया था। ऐसे में, यह आवश्यक था कि एक ऐसा देशव्यापी अधिनियम लाया जाना चाहिए, जो लोक धार्मिक स्थलों के कारण उभरने वाले सांप्रदायिक तनाव का समाधान कर सके। अतः उन परिस्थितियों में लाया गया यह ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991’ अत्यंत महत्व का प्रतीत होता है।
अधिनियम की आलोचना
- इस अधिनियम के विरोधियों का मत है कि अधिनियम में निर्धारित की गई आधार तिथि 15 अगस्त, 1947 मनमानी और तर्कहीन है।
- यह अधिनियम न्यायिक समीक्षा के अधिकार को भी प्रतिबंधित करता है। इसीलिए विरोधियों का मत है कि चूँकि न्यायिक समीक्षा वर्तमान में संविधान का मूल ढांचा है, अतः यह अधिनियम संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।
- विरोधियों का यह भी मानना है कि न्यायिक समीक्षा के अधिकार को प्रतिबंधित करने के कारण यह अधिनियम हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म के लोगों को अपने उपासना स्थलों को पुनः प्राप्त करने से रोकता है।
- इस अधिनियम के एक आलोचक वर्ग का यह भी कहना है कि चूँकि तीर्थ यात्रा और कब्रिस्तान संबंधी मुद्दे राज्य सूची के विषय हैं, इसीलिए इन विषयों से संबंधित मुद्दों पर कानून निर्माण की शक्ति केंद्र सरकार की नहीं हो सकती है।
निष्कर्ष
ऊपर किए गए विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि देश के तत्कालीन सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए यह अधिनियम लाया जाना अपरिहार्य था, लेकिन इसमें कुछ वर्गों के हितों की अनदेखी भी की गई है। इसके कारण वर्तमान में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है। अभी इस विवाद का समाधान करने के लिए मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इस पर कोई भी राय बनाने से पूर्व हमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का इंतजार करना चाहिए। तब तक देश के समस्त नागरिकों और संबंधित प्राधिकारियों को जिम्मेदारी पूर्वक व्यवहार करते हुए देश के माहौल को शांतिमय बनाए रखना चाहिए।
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