03 May 2022: UPSC Exam Comprehensive News Analysis

03 मई 2022 : समाचार विश्लेषण

A.सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 1 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

B.सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था एवं शासन:

  1. किसी को भी टीका लगवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: SC
  2. राष्ट्रभाषा पर बहस:
  3. अर्ध-संघवाद/अर्ध-संघीय व्यवस्था:

C.सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

D.सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 4 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

E.सम्पादकीय:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

  1. यू.एस. और दिल्ली का दो तरफ़ा जुड़ाव:

अर्थव्यवस्था:

  1. GST संकेत:

F. प्रीलिम्स तथ्य:

  1. रूस-यूक्रेन युद्ध-संघर्ष में ट्रांसनिस्ट्रिया उलझते हुए:

G.महत्वपूर्ण तथ्य:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

H. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

I. UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था एवं शासन:

किसी को भी टीका लगवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: SC

विषय: भारत का संविधान – विशेषताएं, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी ढांचा।

मुख्य परीक्षा: वैक्सीन अधिदेश (vaccine mandate); इसकी आलोचना एवं सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश।

प्रसंग:

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना हैं कि केंद्र सरकार की वर्तमान COVID-19 वैक्सीन नीति सही है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को इसे लगाने के लिए बाध्य/मजबूर नहीं किया जा सकता है।

पार्श्वभूमि:

  • सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका में तर्क दिया गया था कि सेवाओं के लाभ के लिए टीकाकरण को अनिवार्य करना नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है,इसलिए यह असंवैधानिक है।
  • केंद्र ने अदालत में तर्क दिया कि इस प्रकार की याचिका “राष्ट्रीय हित के खिलाफ” हैं और इससे टीका लगवाने में दुविधा (vaccine hesitancy) पैदा होगी।
  • तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश ने अपने वैक्सीन अधिदेश का बचाव करते हुए इसे प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा, विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों और परिवहन का उपयोग करने वालों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां:

टीकाकरण नीति पर:

  • सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि केंद्र की COVID-19 टीकाकरण नीति “स्वैच्छिक” है।
  • स्वैच्छिक टीकाकरण नीति: एक स्वैच्छिक टीकाकरण नीति में यह स्पष्ट किए जाना चाहिए कि राज्य ने टीकाकरण को अनिवार्य नहीं बनाने का विकल्प चुना है और इसे व्यक्ति की पसंद-नापसंद के अनुसार लागु किया जा सकता है।
  • उपचार से इंकार करने काअधिकार: अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को इलाज से इंकार करने का अधिकार है।
  • किसी व्यक्ति की स्वायत्तता में “यह निर्धारित करने का अधिकार शामिल है कि उसे अपना जीवन कैसे जीना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत स्वास्थ्य के क्षेत्र में किसी भी चिकित्सा उपचार से इनकार करने का अधिकार शामिल है”।
  • शारीरिक और व्यक्तिगत स्वायत्तता: सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के तहत शारीरिक गरिमा की रक्षा की जाती है और किसी भी व्यक्ति को टीकाकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
  • किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता में स्वास्थ्य के क्षेत्र में किसी भी चिकित्सा उपचार से इनकार करने का अधिकार शामिल है।
  • बच्चों के टीकाकरण के मुद्दे पर: पीठ ने कहा कि इस देश में बाल आबादी का टीकाकरण करने के लिए भारत संघ द्वारा लिया गया निर्णय वैश्विक वैज्ञानिक सहमति और डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ जैसे विशेषज्ञ निकायों के अनुरूप है।
  • बाल चिकित्सा जनसंख्या:बाल चिकित्सा जनसंख्या को “जन्म से लेकर 18 वर्ष की आयु के बीच की जनसंख्या के समूह” के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • ‘उचित सीमाओं’ पर:सुप्रीम कोर्ट ने यह भी घोषित किया कि जब व्यक्ति के इनकार करने से सार्वजनिक रूप से नुकसान हो सकता है, तो राज्य का दायित्व है कि वह व्यक्तिगत अधिकारों पर “उचित और आनुपातिक” सीमाएं लागू करे।

सरकारी हस्तक्षेप की न्यायिक जांच:

  • पीठ ने कहा हैं की व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता और आजीविका के संसाधनों तक पहुंचने के लिए जो आवश्यक कदम एस. पुत्तुस्वामी मामलें के अनुसार बताए गए हैं,उनसे तीन गुना कदम उठाने की जरुरत है।
  • तीन गुना आवश्यकताओं में निम्न तथ्य शामिल हैं:
  1. इन सीमाओं को एक स्पष्ट वैधानिक कानून द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
  2. साथ ही इन सीमाओं की आवश्यकता किसी राज्य के उद्देश्य हेतु वैधानिक अनुपात में होनी चाहिए।
  3. प्रतिबंध लगाने के राज्य के उद्देश्यों और उन्हें प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधनों के बीच एक तर्कसंगत संबंध होना चाहिए।

सारांश:

  • सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल जबरन टीकाकरण के खिलाफ किसी व्यक्ति के अधिकार को बरकरार रखता है बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित में व्यक्तिगत अधिकारों पर “उचित और आनुपातिक” सीमाएं लगाने के लिए राज्य के दायित्व की रक्षा करता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने शारीरिक गरिमा के व्यक्तिगत अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकार की चिंता और इलाज से इनकार करने के बीच संतुलन बनाया है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था एवं शासन:

राष्ट्रभाषा पर बहस:

विषय: भारत का संविधान – विशेषताएं, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी ढांचा ।

प्रारंभिक परीक्षा: हिंदी की संवैधानिक स्थिति; आठवीं अनुसूची; त्रिभाषा सूत्र।

मुख्य परीक्षा: राष्ट्रीय भाषा पर बहस।

प्रसंग:

  • हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा है, एक हिंदी अभिनेता की इस टिपणी ने हाल ही में संविधान के तहत भाषा की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया।

संविधान सभा की बहस में राष्ट्रीय भाषा का मुद्दा:

  • राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर संविधान सभा में फूट थी ।

राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के समर्थकों के विचार:

  • हिंदी भाषा के समर्थक इस बात पर जोर दे रहे थे कि अंग्रेजी गुलामी की भाषा है।
  • वे चाहते थे कि जितनी जल्दी हो सके अंग्रेजी को खत्म कर हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाए।

राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी भाषा के विरोधियों के विचार:

  • हिंदी भाषा के विरोधी अंग्रेजी को खत्म करने के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उन क्षेत्रों में हिंदी का वर्चस्व हो सकता है जहाँ हिंदी भाषा नहीं बोली जाती हैं।

लिपि को लेकर मतभेद:

  • हिंदी भाषा के समर्थक चाहते थे कि ‘देवनागरी’ लिपि को शब्दों और अंकों दोनों के लिए अपनाया जाना चाहिए।
  • कुछ लोगों ने रोमन लिपि को अपनाने की वकालत की, क्योंकि इससे हिंदी सीखना आसान हो सकता था।
  • लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी अंकों के स्थान पर ‘अंतर्राष्ट्रीय अंक’ (दुनिया भर में प्रयुक्त और समझा जाने वाला अरबी रूप) अपनाने के पक्ष में था।

संविधान सभा का अंतिम निर्णय:

  • अंतत: यह निर्णय लिया गया कि 15 वर्षों की अवधि तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा।
  • संविधान में कहा गया है कि 15 वर्षों के बाद संसद कानून द्वारा अंग्रेजी के उपयोग और निर्दिष्ट उद्देश्यों के लिए देवनागरी के रूप में संख्याओं के उपयोग पर निर्णय ले सकती है।

15 साल पूरे होने के बाद राजभाषा अधिनियम:

  • राजभाषा अधिनियम, 1963 उस 15 वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद पारित किया गया था, जिसके दौरान संविधान ने मूल रूप से आधिकारिक उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग की अनुमति दी थी।
  • 15 साल की अवधि समाप्त होने के बावजूद अंग्रेजी भाषा के निरंतर उपयोग की बात कही गई।

1965 में भाषा के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन:

  • जवाहरलाल नेहरू ने 1959 में आश्वासन दिया था कि अंग्रेजी का आधिकारिक उपयोग जारी रहेगा और केंद्र और राज्यों के बीच संचार की भाषा के रूप में अंग्रेजी यथावत बनी रहेगी।
  • 1963 के राजभाषा अधिनियम में इस आश्वासन को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया, क्योंकि इससे कुछ राज्यों में आशंकाएं पैदा हुईं।
  • साथ ही, प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सभी उद्देश्यों के लिए हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया।
  • 1963 में राजभाषा अधिनियम के पारित होने के विरोध में, तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था।
  • हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनने के खिलाफ 1965 में तमिलनाडु में फिर से एक बड़ा हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हो गया।
  • राजभाषा संकल्प के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए: Official Language Resolution

संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद 343

संघ की राजभाषा हिन्दी होगी जिसकी लिपि देवनागरी होगी। संघ के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।

अनुच्छेद 344(1)

राष्ट्रपति संविधान के प्रारंभ से पाँच वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात्‌ ऐसे प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर,आदेश द्वारा एक आयोग गठित करेगा। इस आयोग का उद्देश्य संघ के आधिकारिक उद्देश्यों के लिए हिंदी के क्रामिक उपयोग और अंग्रेजी के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए सिफारिशें करना है।

अनुच्छेद 351

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

आठवीं अनुसूची:

  • आठवीं अनुसूची में देश की भाषाओं की सूची है।
  • पहली अनुसूची में 14 भाषाएं थीं, लेकिन अब 22 भाषाएं हैं।
  • आठवीं अनुसूची के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए:Eighth Schedule

त्रिभाषा सूत्र/फार्मूला :

  • 1960 के दशक से ही केंद्र की शिक्षा नीति में तीन भाषाओं में पढ़ाने की बात कि गई हैं –
  1. हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा।
  2. अन्य राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और आधिकारिक क्षेत्रीय भाषा।
  3. जबकि व्यवहार में, केवल कुछ राज्य अंग्रेजी के अलावा अपनी प्रमुख भाषा और हिंदी दोनों को पढ़ाते हैं।
  • NEP 2020 और त्रिभाषा सूत्र/फार्मूला के बारे में अधिक जानकरी के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए:NEP 2020 and Three language formula

सारांश:

  • संविधान सभा में राष्ट्रभाषा का मुद्दा सबसे विवादास्पद और भावुकता से बहस करने वाले मुद्दों में से एक था।यह बहस अभी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने भारत को एक राष्ट्र के रूप में गढ़ा, क्षेत्रीय और भाषाई पहचान को स्पष्ट किया,और आधुनिक भारत में एकता की नींव रखी थी ।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था एवं शासन:

अर्ध-संघवाद/अर्ध-संघीय व्यवस्था:

विषय: संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ।

मुख्य परीक्षा: भारत में अर्ध संघवाद-कारण और चिंताएं।

प्रसंग:

  • भारत में अर्ध संघवाद ।

भारत में अर्ध संघवाद:

  • अर्ध-संघीय शब्द का अर्थ एक संघीय व्यवस्था से है जहां – केंद्र और राज्य में बटी हुए सरकार होने के बावजूद केंद्र सरकार के पास अधिक शक्तियां हैं।
    • ऐसा कहा जाता है कि भारत में अर्ध-संघीय व्यवस्था है।भारत ने जानबूझकर संघवाद का एक संस्करण अपनाया जिसने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को एक-दूसरे पर निर्भर बना दिया।
  • भारत के केंद्रीकृत संघीय ढांचे को ‘एक साथ आने’ की प्रक्रिया द्वारा चिह्नित नहीं किया गया था, बल्कि यह यहाँ के लोग को ‘एक साथ रहने’ और ‘एक साथ रखने’ का परिणाम था।

अर्ध-संघवाद की स्थापना करने वाली संवैधानिक विशेषताएं:

  • भारतीय महासंघ को एक संघ माना जाता है क्योंकि यह अविनाशी शब्द को परिलक्षित करता हैं, इसलिए संविधान में संघवाद से संबंधित शब्द नहीं हैं।
  • भारत के संविधान में आवश्यकता के आधार पर भारतीय संघ के संघीय और एकात्मक होने के लिए अपेक्षित लचीलापन विद्यमान है।
  • संवैधानिक विशेषताओं में लोकसभा की तरह राज्यसभा भी है ताकि जिससे बड़े राज्यों का पक्ष लिया जा सके।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संघ को राज्य की सीमाओं को उसकी सहमति के बिना बदलने की अनुमति देता है।
  • अन्य उदाहरण हैं आपातकालीन शक्तियाँ, और सातवीं अनुसूची में शामिल समवर्ती सूची विषय जिनके सम्बन्ध में कुछ अपवादों को छोड़कर संघ के पास राज्य की तुलना में अधिक अधिकार हैं।

संघीय ढांचे के केंद्रीकृत होने कारण:

  • पहला कारण था भारत का विभाजन और उससे जुड़ी चिंताएं:
    • जवाहरलाल नेहरू द्वारा विधानसभा में पेश किए गए उद्देश्य प्रस्ताव का झुकाव एक विकेन्द्रीकृत संघीय ढांचे की ओर था ताकि राज्यों के पास अवशिष्ट शक्तियां हों।
    • हालाँकि देश के विभाजन के बाद संविधान सभा की केंद्रीय शक्ति समिति द्वारा सर्वसम्मति से एक संशोधित/लचीला रुख अपनाया,जो राष्ट्र की अखंडता की रक्षा के लिए अवशिष्ट शक्तियों और कमजोर राज्यों के साथ एक मजबूत संघ के पक्ष में था।
  • दूसरा कारण राष्ट्रीय नागरिक पहचान बनाना:
    • इसका एक दूसरा बहुत ही महत्वपूर्ण कारण एक अत्यधिक पदानुक्रमित और भेदभावपूर्ण समाज में तत्काल जाति और भाषाई पहचान के बजाय एक राष्ट्रीय नागरिक पहचान बनाने की दिशा में सामाजिक संबंधों के पुनर्गठन के इर्द-गिर्द घूमता है।
  • तीसरा कारण कल्याणकारी राज्य के निर्माण का उद्देश्य :
    • क्योंकि एक विकेन्द्रीकृत संघीय व्यवस्था में पुनर्वितरण नीतियों को संगठित समूहों द्वारा संरचनात्मक रूप से विफल किया जा सकता है।
    • इसके बजाय एक केंद्रीकृत संघीय व्यवस्था ऐसे मुद्दों पर लगाम लगा सकती है और एक सार्वभौमिक अधिकार-आधारित प्रणाली को आगे बढ़ा सकती है।
  • इसका अंतिम कारण अंतर-क्षेत्रीय आर्थिक असमानता को कम करना था:
    • बंबई में कपास मिल उद्योग और बंगाल में जूट मिल उद्योगों के श्रमिकों के अधिकारों और सुरक्षा जाल को एंग्लो-स्कॉटिश मिल मालिकों द्वारा विफल कर दिया गया था।
  • भारत की अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, नेहरू रिपोर्ट (1928) और बॉम्बे प्लान (1944) में सदस्यता ने कामकाजी और उद्यमी वर्गों के लिए सामाजिक-आर्थिक अधिकारों और सुरक्षा उपायों को बढ़ावा देने के लिए एक केंद्रीकृत प्रणाली पर जोर दिया था।

केंद्र और राज्य के बीच बढ़ती विषमता:

  • भारत में संघवाद पर समसामयिक चर्चा आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों में एक विवेचनात्मक सुर पर आगे बढ़ रही है।
  • हाल के घटनाक्रम अद्वितीय और स्वदेशी व्यवस्था को एक असममिति‍क/विषम व्यवस्था में बदल देते हैं।

कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

  • संसाधनों और कर आय के संवितरण में विलम्ब,
  • प्रतिकूल राज्यों में चनावी दृष्टिकोण के प्रति पूर्वाग्रह,
  • जवाबदेही से बचना,
  • प्राधिकरण के धुंधले क्षेत्र,
  • कमजोर हो रही संस्थाएं,
  • विखंडनीय राजनीतिक विचारधाराओं का प्रसार
  • बढ़ती विषमता के कारण भारत केंद्र-राज्य संबंधों में कडवहाहट।

सारांश:

  • भारत ने सभी पक्षों को जानते हुए संघवाद के इस संस्करण को अपनाया था जिसने केंद्र और राज्य सरकारों को एक-दूसरे पर निर्भर बना दिया और इस तरह अर्ध संघवाद की नींव रखी गई। लेकिन इस संरचना की प्रभावशीलता पूरी तरह से सरकार की मंशा के साथ-साथ नागरिकों की सामूहिक इच्छा और जन प्रतिनिधियों पर निर्भर करती है।

संपादकीय-द हिन्दू

सम्पादकीय:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध:

यू.एस. और दिल्ली का दो तरफ़ा जुड़ाव:

विषय: भारतीय संवैधानिक योजना की अन्य देशों के साथ तुलना।

मुख्य परीक्षा: भारतीय और अमेरिकी विधायिका के बीच अंतर।

सन्दर्भ:

  • हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस महिला इल्हान उमर की पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की उनकी यात्रा की भारत ने कड़ी निंदा की है।
  • जवाब में, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने इल्हान उमर से खुद को अलग करते हुए कहा कि उमर की पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की यात्रा अनौपचारिक और व्यक्तिगत थी।
  • इस संदर्भ में, भारतीय प्रणाली और अमेरिकी विधायिका के कामकाज की प्रणाली के बीच अंतर को समझना होगा। हालांकि भारत और यू.एस. दोनों ही लोकतांत्रिक गणराज्य हैं, लेकिन दोनों के बीच कुछ उल्लेखनीय अंतर हैं।

भारतीय और अमेरिकी विधायिका के बीच अंतर:

विधायी निकाय:

  • जहाँ संसद भारत का, तो वहीं कांग्रेस विधायिका संयुक्त राज्य अमेरिका का सर्वोच्च विधायी निकाय है।
  • जबकि लोकसभा (लोक सभा) और राज्य सभा (राज्यों की परिषद) भारत के दो सदन हैं, वहीं सीनेट और प्रतिनिधि सभा कांग्रेस के दो सदन हैं। जिसमे प्रतिनिधि सभा (आमतौर पर सदन के रूप में संदर्भित) निचला सदन है जबकि सीनेट उच्च सदन है।

विधायी प्राधिकारी:

  • भारतीय और अमेरिकी प्रणाली के बीच मूल अंतर यह है कि भारत में संसदीय प्रणाली है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति प्रणाली है।
    • भारत में, शक्तियों का कोई सख्त पृथक्करण नहीं है, जबकि यू.एस. में, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट पृथक्करण है।
    • भारत में, कार्यपालिका निर्वाचित विधायिका का हिस्सा है जबकि यू.एस. में कार्यपालिका और विधायिका दो अलग-अलग संस्थाएं हैं।
    • भारत में, कार्यपालिका तभी सत्ता में रहती है जब विधायिका अस्तित्व में होती है जबकि भारत में विधायिका और कार्यपालिका की शर्तें एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं।

विधायी शक्तियाँ:

  • भारत में, कार्यपालिका कानून बनाने के लिए विधायिका को ओवरराइड नहीं कर सकती है क्योंकि बिल केवल तभी कानून बनता है जब दोनों सदन इसे पारित करते हैं, और इस पर राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किए जाते हैं, जबकि यू.एस. में अमेरिकी राष्ट्रपति कांग्रेस को बायपास कर एक कार्यकारी आदेश जारी कर सकते हैं (जिसमें कानून की ताकत है)।
  • यू.एस. में, कांग्रेस द्वारा पारित कानून पर राष्ट्रपति वीटो कर सकता है और विचार के लिए उसे वापस भेज सकता है। भारत में भी, राष्ट्रपति किसी भी विधेयक को, यदि वह विचार योग्य है तो संसद में विचार के लिए वापस भेज सकता है। लेकिन अगर यह फिर से पारित हो जाता है, तो उसे इस पर हस्ताक्षर करने ही पड़ते है।
  • अमेरिकी कांग्रेस में दोनों सदन 2/3 बहुमत द्वारा राष्ट्रपति के वीटो को ओवरराइड कर सकते हैं।

विधायिका का कामकाज:

  • यू.एस. में, सदस्य द्वारा वोट तथा लिया गया स्टैंड पार्टी के निर्देशों के अनुसार नहीं होता है, यह व्यक्तिगत पसंद से प्रेरित होता है, लेकिन इसके विपरीत भारत में पार्टी जो निर्णय लेती है और सदस्य व्हिप के माध्यम से महत्वपूर्ण कानूनों पर उसी के अनुसार वोट देते हैं।
  • कांग्रेस के सदस्य विदेश नीति में विशेष रुचि लेते हैं और दुनिया भर में सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों की नियमित निगरानी करते हैं। कभी-कभी, सदन या सीनेट देश/मुद्दों-विशिष्ट विषयों पर सुनवाई भी करते है। जबकि भारत ऐसा नहीं करता है।
  • यू.एस. में विधायी शाखा के सदस्य कानून को लागू करने और कानून बनाने के लिए स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। भारत में सरकार के संसदीय स्वरूप को देखते हुए, कार्यपालिका और विधायिका के कामकाज में निकटता है।

भारत के लिए सिफारिशें:

  • अमेरिकी नीति निर्माण और विदेशी संबंधों में कांग्रेस के प्रभाव को देखते हुए, भारत को भारत के प्रति कांग्रेस में एक अनुकूल राय बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
  • भारत को आधिकारिक स्तर पर शामिल होने के अलावा कांग्रेस के सदस्यों और कर्मचारियों, वकिलों और पेशेवर लॉबी के साथ प्रवासी भारतीयों को जोड़ने का भी प्रयास करना चाहिए। यह अमेरिकी कांग्रेस में भारत के लिए द्विदलीय समर्थन बनाने में मदद करेगा।

सारांश:

  • सरकार की राष्ट्रपति प्रणाली और यू.एस. में शक्तियों के स्पष्ट पृथक्करण को देखते हुए, कांग्रेस का संयुक्त राज्य शासन प्रणाली में एक अलग स्थान है। इसे स्वतंत्र अध्ययन करने और विदेशी संबंधों पर प्रस्ताव पारित करने के लिए भी जाना जाता है। इसलिए भारत को अपने प्रति कांग्रेस में एक अनुकूल राय बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

अर्थव्यवस्था:

GST संकेत:

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना से संबंधित मुद्दे, संसाधन जुटाना, विकास और रोजगार।

प्रारंभिक परीक्षा: GST टैक्स स्लैब का युक्तिकरण और महत्व।

पृष्टभूमि:

रिकॉर्ड GST राजस्व:

  • अप्रैल 2022, नए वित्तीय वर्ष के पहले महीने में लगभग 1.67 लाख करोड़ रुपये के वस्तु और सेवा कर (GST) का रिकॉर्ड संग्रह किया गया है। यह GST लागू होने के बाद से पांच वर्षो में सबसे ज्यादा मासिक संग्रह है।
  • विशेष तौर पर, दूसरी कोविड-19 महामारी की लहर के चरम के दौरान दो महीनों को छोड़कर हाल के महीनों में GST राजस्व प्रभावशाली रहा है। कुल GST राजस्व 2021-22 में 30.8% की वृद्धि के साथ ₹14.9 लाख करोड़ हो गया है।

महत्व:

राजकोषीय दबाव में कमी:

  • GST का रिकॉर्ड संग्रह, 2022-23 में भी अधिक राजस्व संग्रह का संकेत देता है। इससे महामारी के दौरान हुए वित्तीय व्यवधान से प्रभावित केंद्र और राज्य के खजाने पर दबाव कमी आएगी।

राज्यों को फंड मुआवजा भुगतान:

  • GST के रिकॉर्ड संग्रह ने उन राज्यों की चिंताओं को कम किया है, जो जुलाई में GST लागू करने हेतु सुनिश्चित मुआवजा योजना की समाप्ति के बाद अपने राजस्व को लेकर चिंतित थे। यदि GST संग्रह इन स्तरों पर बना रहता है, तो मुआवजे के भुगतान के मुद्दे पर राज्यों और केंद्र के बीच वार्ता आसान हो जाएगी।
  • रिकॉर्ड GST राजस्व की आमद राज्यों को बकाया मुआवजे के भुगतान को आसान बनाने में मदद करेगी (₹78,700-करोड़, या चार महीने का बकाया)।

GST दर स्लैब को युक्तिसंगत बनाना:

  • उच्च कर प्रवाह, GST परिषद को GST दर स्लैब के युक्तिकरण पर विचार करने का अवसर प्रदान कर सकता है। परन्तु साथ में यह ध्यान में रखना भी आवश्यक है कि शुरुआत में इसके लॉन्च के दौरान यही राजस्व-तटस्थ GST कर दर अप्रभावी रही थी।
  • राजस्व का स्थिरीकरण GST परिषद को न केवल राजस्व प्रवाह को बढ़ाने में बल्कि सामाजिक-आर्थिक विचारों पर चिन्तन का अवसर प्रदान करता है।

अनुशंसा:

  • रिकॉर्ड GST संग्रह राहत का संकेत है, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि यह उच्च GST राजस्व आर्थिक गतिविधियों में पूनर्वापसी का संकेत हो। महामारी के बाद से ही भारत की आर्थिक सुधार में उच्च मुद्रास्फीति दर एक प्रमुख चिंता का विषय बनी हुई है।
  • इस दिशा में, GST परिषद को जल्द से जल्द बैठक कर मुद्रास्फीति की दरों पर लगाम लगाने के लिए प्रासंगिक नीतिगत उपायों पर विचार करना चाहिए। मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने और उपभोक्ता भावना को मजबूत करने के लिए तत्काल नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। इससे अधिक निवेश सुनिश्चित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास में मदद मिलेगी जिससे GST राजस्व भी अधिक मिलेगा।

सारांश:

  • रिकॉर्ड GST संग्रह को, GST दर स्लैब के युक्तिकरण पर विचार करने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए जो न केवल GST प्रणाली को सरल बनाएगा बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने में भी सहायक होगा।

प्रीलिम्स तथ्य:

1. रूस-यूक्रेन युद्ध-संघर्ष में ट्रांसनिस्ट्रिया उलझते हुए:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

विषय: भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव

प्रारंभिक परीक्षा: ट्रांसनिस्ट्रिया (Transnistria)कहाँ है?

प्रसंग:

  • जैसे ही रूस-यूक्रेन युद्ध को दो महीने में पुरे हो रहे है, मोल्दोवा से टूटने वाले क्षेत्र ट्रांसनिस्ट्रिया, के इस संघर्ष में घसीटे जाने का जोखिम है।
  • अलगाववादी क्षेत्र ट्रांसनिस्ट्रिया डेनिस्टर नदी और यूक्रेनी सीमा के बीच की भूमि की एक संकरी पट्टी है।
  • इसने 1990 में मोल्दोवा से स्वतंत्रता की घोषणा की थी – हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसके स्व-घोषित राज्य को मान्यता नहीं देता है।
  • ट्रांसनिस्ट्रिया इसके पश्चिम में मोल्दोवा और पूर्व में यूक्रेन के बीच स्थित है।

Source:BBC

महत्वपूर्ण तथ्य:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1. हाल ही में चर्चा में रहा ‘PK2 अणु’ किसके उपचार से संबंधित है: [कठिनाई स्तर: कठिन]

(a)कैंसर

(b)HIV एड्स

(c)मधुमेह

(d)कोविड-19

उत्तर: c

व्याख्या:

  • पीके 2 नामक अणु अग्न्याशय द्वारा इंसुलिन की रिहाई को ट्रिगर करने में सक्षम है, और संभावित रूप से मधुमेह की दवा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • अत: विकल्प C सही है।

प्रश्न 2. सार्वजनिक संस्था – अनुभव मंडप या “आध्यात्मिक अनुभव का हॉल” की स्थापना निम्नलिखित में से किस वचनकर द्वारा की गई थी: [कठिनाई स्तर: मध्यम]

(a)बसवेश्वर

(b)अल्लामा प्रभु

(c)अक्का महादेवी

(d)जेदारा दशमैया

उत्तर: a

व्याख्या:

  • 12 वीं शताब्दी के दार्शनिक और कर्नाटक के राजनेता, बसवेश्वर ने वीरा शैववाद की स्थापना की।
  • कहा जाता है कि बसवेश्वर जो बसवन्ना के नाम से लोकप्रिय थे,ने भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति विकसित की थी जिसे- कुडलसंगम “मिलने वाली नदियों के भगवान” कहा गया।
  • उन्होंने अनुभव मंडप (`आध्यात्मिक अनुभव का हॉल”) जैसे नए सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना की, जिन्होंने आध्यात्मिक और सांसारिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों से आने वाले पुरुषों और महिलाओं का स्वागत किया।
  • “शिव अनुभव का हॉल” शिवानुभव मंडप प्रवचन के लिए एकत्रित होने का स्थान बन गया था।
  • अत: विकल्प A सही है।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौन से सुमेलित हैं?[कठिनाई स्तर: मध्यम]

पुरातत्व स्थल राज्य

  1. राखीगढ़ी राजस्थान
  2. शिवसागर अरुणाचल प्रदेश
  3. धोलावीरा गुजरात
  4. आदिचनल्लूर तेलंगाना

विकल्प:

(a)केवल 2, 3 और 4

(b)केवल 2 और 3

(c)1, 2, 3 और 4

(d)केवल 3

उत्तर: d

व्याख्या:

  • राखीगढ़ी हरियाणा में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है।
  • असम में 13वीं से 19वीं शताब्दी तक ब्रह्मपुत्र घाटी में स्थित शिवसागर अहोम साम्राज्य की राजधानी रही।
  • गुजरात के कच्छ के रण में हड़प्पा सभ्यता का शहर, धोलावीरा, यूनेस्को का विश्व धरोहर टैग पाने वाला भारत का 40 वां स्थल बन गया है।
  • आदिचनल्लूर तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में एक स्थल है।यह अब तक राज्य का सबसे पुराना स्थल है।
  • आदिचनल्लूर को पहली बार 1876 में एक कलश-दफन स्थल के रूप में खोजा गया था।
  • अत: विकल्प D सही है।

प्रश्न 4. ग्रीन हाइड्रोजन के संबंध में दिए गए कथनों में से कौन-सा/से गलत है/हैं? [कठिनाई स्तर: कठिन]

  1. हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन का लेबल तब दिया जाता है जब उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन को एकत्र और संग्रहीत कर लिया जाता है।
  2. स्टीम रिफॉर्मिंग इसके उत्पादन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है।
  3. हरित हाइड्रोजन, हाइड्रोजन उत्पादन का सबसे स्वच्छ रूप है क्योंकि इसका उप-उत्पाद केवल जल और जल वाष्प हैं।

विकल्प:

(a)केवल 1 और 3

(b)केवल 2 और 3

(c)केवल 1 और 2

(d)इनमे से कोई भी नहीं

उत्तर: c

व्याख्या:

  • जब भी स्टीम रिफॉर्मिंग से उत्पन्न कार्बन को औद्योगिक कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CSS) के माध्यम से भूमिगत रूप से संग्रहीत किया जाता है, तो हाइड्रोजन को नीला लेबल दिया जाता है। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन को उत्पादित हाइड्रोजन के रूप में परिभाषित किया जाता है,जो अक्षय बिजली का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके उत्पादित होता है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन में विनिर्माण, परिवहन, और बहुत कुछ के लिए स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता है – और इसका एकमात्र उपोत्पाद जल और जल वाष्प है। अतः कथन 3 सही है।

प्रश्न 5. ‘कोल बेड मीथेन’ और ‘शेल गैस’ नामक दो गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:PYQ (2014) [कठिनाई स्तर: मध्यम]

  1. कोयेले की मीथेन कोल संस्तर से निकाली गई शुद्ध मीथेन गैस है, जबकि शेल गैस प्रोपेन और ब्यूटेन का मिश्रण है जिसे केवल महीन दानेदार तलछटी चट्टानों से निकाला जा सकता है।
  2. भारत में प्रचुर मात्रा में कोयेले के मीथेन के स्रोत मौजूद हैं, लेकिन अभी तक कोई शेल गैस स्रोत नहीं पाया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a)केवल 1

(b)केवल 2

(c)1 और 2 दोनों

(d)न तो 1, न ही 2

उत्तर: d

व्याख्या:

  • कोलबेड मीथेन एक गैर-पारंपरिक और महत्वपूर्ण प्राकृतिक गैस स्रोत है। यह एक प्रकार का मीथेन है जो कोयले की परतों से निकाला जाता है।
  • शेल संरचनाओं में फंसी प्राकृतिक गैस को शेल गैस कहा जाता है। शेल गैस एक हाइड्रोकार्बन गैस मिश्रण है जो प्राकृतिक गैस के समान है। यह मुख्य रूप से मीथेन से बनती है।
  • इसमें कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन सल्फाइड के साथ-साथ अन्य हाइड्रोकार्बन जैसे ईथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन भी शामिल हैं। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • खंबे (गुजरात), असम-अराकान (उत्तर पूर्व), गोंडवाना (मध्य भारत), कृष्णा गोदावरी तटवर्ती (पूर्वी तट), कावेरी तटवर्ती, और भारत-गंगा बेसिन सभी को भारत में संभावित शेल गैस अन्वेषण क्षेत्रों के रूप में पहचाना गया है। अतः कथन 2 सही नहीं है।

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

प्रश्न 1. त्रिभाषा सूत्र क्या है? यह अपने मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने में कहाँ तक सफल रहा है? (250 शब्द; 15 अंक) जीएस II (राजनीति)

प्रश्न 2. भारतीय राजनीति के संदर्भ में ‘अर्ध संघवाद’ को परिभाषित कीजिए। भारत का संघवाद संयुक्त राज्य अमेरिका में अनुसरित संघवाद से किस प्रकार भिन्न है? (250 शब्द; 15 अंक) जीएस II (राजनीति)

Leave a Comment

Your Mobile number and Email id will not be published.

*

*