07 नवंबर 2022 : समाचार विश्लेषण

A. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 1 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

B. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था:

  1. समान नागरिक संहिता:

शासन:

  1. पुरानी पेंशन योजना:

C. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

D. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 4 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

E. संपादकीय:

राजव्यवस्था और अभिशासन:

  1. वास्तुकला के पेशे को सुदृढ़ता प्रदान करने की आवश्यकता:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

  1. म्यांमार में जारी गतिरोध:

शासन:

  1. अक्टूबर में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं व्यापक चिंता की ओर इशारा करती हैं:

F. प्रीलिम्स तथ्य:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

G. महत्वपूर्ण तथ्य:

  1. विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह:
  2. हिम तेंदुआ (Snow Leopard):
  3. ‘इंडियन ब्लैक हनी बी'(Indian Black Honeybee):

H. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

I. UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

समान नागरिक संहिता:

राजव्यवस्था:

विषय: भारत का संविधान-मौलिक अधिकार।

मुख्य परीक्षा: भारतीय समाज में समान नागरिक संहिता की प्रासंगिकता।

संदर्भ:

  • हाल ही में गुजरात राज्य द्वारा घोषणा की गयी हैं कि वह समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए सभी पहलुओं का मूल्यांकन करने हेतु उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करेगा।

विवरण:

  • समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) का उद्देश्य एक एकल राष्ट्रीय कानून का निर्माण करना है जो गोद लेने, विरासत और विवाह जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी धार्मिक समुदायों पर एक समान लागू होगा।
  • समान नागरिक संहिता भारत में मौजूदा सभी व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों की जगह लेगा और यह एक समान नागरिक कानून देश के नागरिकों पर एक समान तरीके से लागु होगा/या उनकी सभी क़ानूनी आवश्यकताओं को पूरा करेगा चाहे वे किसी भी धर्म से सम्बंधित हो।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy (DPSP)) के अनुरूप है, जिसमें कहा गया है कि राज्य अपने नागरिकों के लिए भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र में एक समान नागरिक संहिता (uniform civil code (UCC)) प्रदान करने का प्रयास करेगा।

समान नागरिक संहिता के सम्बन्ध में संविधान सभा में की गई बहस:

  • समान नागरिक संहिता के खंड ने संविधान सभा में एक सारभूत बहस को जन्म दिया था कि इसे संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया जाना चाहिए या निदेशक सिद्धांत के रूप में।
  • इस पर बहस के बाद समान नागरिक संहिता को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) में शामिल करने के लिए 5:4 के बहुमत से इस मामले को सुलझाया गया।
    • सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों पर उप-समिति ने निर्णय लिया कि समान नागरिक संहिता को मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं रखा जा सकता है।
  • UCC पर संविधान सभा के सदस्यों का रुख विरोधाभासी था। जबकि कुछ ने यह भी महसूस किया कि भारत विविधता वाला देश हैं अतः यहां UCC लागू नहीं की जा सकती हैं।
    • के.एम. मुंशी ने इस धारणा को सिरे से खारिज किया कि UCC धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ होगा क्योंकि संविधान ने सरकार को उन धार्मिक प्रथाओं से संबंधित धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को समाहित करने वाले कानून बनाने की अनुमति दी हैं जो सामाजिक सुधार से अभिप्रेत हैं।
    • उन्होंने UCC की राष्ट्र की एकता को बढ़ावा देने वाला और महिलाओं के लिए समानता जैसे लाभों को गिनाते हुए इसका समर्थन किया।
    • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का मत था कि प्रारंभिक चरण में UCC को “विशुद्ध रूप से स्वैच्छिक” रहना चाहिए।
  • अंततः व्यक्तिगत कानूनों को UCC से बचाने हेतु किए गए संशोधनों को खारिज कर दिया गया।

समान नागरिक संहिता(UCC) के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क:

UCC के पक्ष में:

  • भारत में UCC को लागू करने का उद्देश्य एक देश के रूप में भारत को एक सूत्र में पिरोना है क्योंकि देश के सभी हिस्सों के लोग विभिन्न धर्मों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं का पालन करते हैं। अतः इस संहिता को लागू करने का उद्देश्य भारत को एकीकृत करना है।
  • एक राष्ट्रीय नागरिक आचार संहिता वहां के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करेगी। समान नागरिक संहिता में विवाह, तलाक, विरासत, रखरखाव, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे विषयों को शामिल किया जाएगा, जो सभी के लिए समान होंगे।
  • समान नागरिक संहिता का तात्पर्य व्यक्तिगत कानूनों पर एक सामान नियम (संहिता) है जो सभी नागरिकों को एकजुट करता है, चाहे वे किसी भी धर्म का पालन करते हों या किसी भी लिंग अथवा आयु वर्ग से सम्बंधित हों।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकांश व्यक्तिगत कानून विभिन्न समुदायों में उनके धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं पर आधारित होते हैं और इस प्रकार यह देश एवं समाज में वृहद विभाजन का कारण बनते हैं।
  • चूँकि धर्मनिरपेक्षता प्रस्तावना में निहित मुख्य उद्देश्यों में से एक है, अतः एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के लिए धार्मिक प्रथाओं के आधार पर विभेदित नियमों के बजाय सभी नागरिकों के लिए एक सामान्य कानून की आवश्यकता होती है।
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार गोवा इसका एक “उत्कृष्ट उदाहरण” है, जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है।

UCC के विपक्ष में तर्क:

  • भारत में अधिकांश आपराधिक और दीवानी मामलों जैसे आपराधिक प्रक्रिया संहिता, नागरिक प्रक्रिया संहिता आदि में एकरूपता है, लेकिन राज्यों ने इन आपराधिक और नागरिक कानूनों में 100 से अधिक संशोधन किए हैं।
    • उदाहरण के लिए, कई राज्यों ने संशोधित मोटर वाहन अधिनियम के तहत केंद्र द्वारा निर्धारित और उचित जुर्माने को कम कर दिया है।
  • विभिन्न समुदायों के विविध व्यक्तिगत कानूनों के संबंध में पहले से ही संहिताबद्ध नागरिक और आपराधिक कानूनों में यह बहुलता ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ के तर्क को कमजोर करती है।
  • हिंदू कोड बिल के लागू होने के बाद भी सभी हिंदू एक समान व्यक्तिगत कानून द्वारा शासित नहीं होते हैं, जो मुसलमानों और ईसाइयों के लिए उनके व्यक्तिगत कानूनों में समान है।
    • यहां तक कि 1950 के दशक में हिंदू कोड बिल को भी कई बार संशोधित किया गया, बदला गया,कमजोर किया गया और अंत में इसे चार अलग-अलग अधिनियमों में विभाजित किया गया – हिंदू विवाह अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम और हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम।
    • उदाहरण के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह निषिद्ध है, जबकि भारत के दक्षिण भाग में इसे शुभ माना जाता है।
    • इसी तरह जब मुस्लिम पर्सनल लॉ या 1937 में पारित शरीयत अधिनियम की बात करें तो अभी भी इसमें कोई कोई समान प्रयोज्यता/उपयुक्तता/प्रासंगिकता नहीं है।
  • जम्मू और कश्मीर में मुसलमान अभी भी प्रथागत कानून के अधीन हैं, जो देश के बाकी हिस्सों में मुस्लिम पर्सनल लॉ से अलग है क्योंकि वहां शरीयत अधिनियम लागू नहीं है।इसके अतिरिक्त विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों के लिए प्रयोज्यता भिन्न होती है।
  • भारत में कई आदिवासी समूह धर्म की परवाह किए बिना, अपने स्वयं के प्रथागत कानूनों का पालन करते हैं।

UCC पर उच्चतम न्यायालय:

  • उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में UCC को लागू करने का आह्वान किया है।
  • 1985 के शाह बानो मामले में जब एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने अपने पूर्व पति से भरण-पोषण की मांग की,तो इसमें उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPc) या मुस्लिम पर्सनल लॉ को प्रचलन में लाने का फैसला करते हुए UCC को लागू करने की मांग की थी।
  • न्यायालय ने सरकार से 1995 के सरला मुद्गल निर्णय के साथ-साथ पाउलो कोटिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा मामले (2019) में भी UCC को लागू करने का आह्वान किया था।

UCC पर विधि आयोग:

  • विधि आयोग ने परिवार कानून में सुधार पर एक परामर्श पत्र में कहा है कि एक एकीकृत राष्ट्र को अनिवार्य रूप से “एकरूपता” की आवश्यकता नहीं थी और धर्मनिरपेक्षता देश में प्रचलित/प्रभुत्व संपन्न बहुलता का विरोध नहीं कर सकती है।
  • इसने यह भी कहा हैं कि UCC “इस स्तर पर न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है”।
  • इस रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि एक विशेष धर्म और उसके व्यक्तिगत कानूनों के भीतर भेदभावपूर्ण प्रथाओं, पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों का अध्ययन और संशोधन किया जाना चाहिए।
  • आयोग द्वारा विवाह और तलाक के सम्बन्ध में भी कुछ उपाय सुझाए गए हैं उन्हें सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में समान रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
  • इसने हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) को कर-मुक्त इकाई के रूप में समाप्त करने का भी आह्वान किया हैं।

सारांश:

  • संविधान के निर्माताओं ने कल्पना की थी कि समान नागरिक संहिता कानूनों का एक समान समूह होगा जो प्रत्येक धर्म के अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों को प्रतिस्थापित करेगा।हालाँकि विभिन्न राज्य सरकारों ने इससे संबंधित समितियों का गठन किया है,एवं केंद्रीय कानून मंत्रालय ने भारत के 22वें विधि आयोग ( Law Commission of India) से इससे संबंधित विभिन्न मुद्दों की जांच करने का अनुरोध किया है।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

पुरानी पेंशन योजना:

शासन:

विषय: सरकारी नीतियों एवं उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

मुख्य परीक्षा: भारत में पेंशन प्रणाली से सम्बंधित मुद्दे।

संदर्भ:

  • कई राज्य और कर्मचारी संघ पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (National Pension System (NPS)) को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

विवरण:

  • हाल ही में राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को फिर से शुरू किया है जो सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित आय प्रदान करती है।
  • इसके अलावा केरल, आंध्र प्रदेश और असम की सरकारों ने भी पुरानी पेंशन योजना को लेकर समितियों का गठन किया है।
  • हाल ही में केंद्र सरकार के कर्मचारी संघों के संघ ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर पुरानी पेंशन योजना (old pension scheme-OPS) को बहाल करने की मांग की है।

पृष्ठभूमि:

  • पुरानी पेंशन योजना (OPS) या परिभाषित पेंशन लाभ योजना एक कर्मचारी के सेवानिवृत्ति के बाद उसके गुजारे भत्ते हेतु जीवन भर आय प्रदान करने का आश्वासन हैं जो आमतौर पर अंतिम आहरित वेतन के 50% के बराबर होता है।
    • पेंशन पर होने वाले व्यय को सरकार वहन करती है।
    • OPS की आय पर कर नहीं लगता हैं।
  • वर्ष 2003 में केंद्र सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को बंद करने का फैसला किया और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (New Pension scheme) की शुरुआत की।
    • केंद्र सरकार ने इस नई प्रणाली को अपनाने का फैसला राज्यों पर छोड़ दिया, और उन्हें इसे वापस लेने की भी शक्ति है।
  • नई पेंशन योजना ( New Pension scheme), 1 अप्रैल 2004 से केंद्र सरकार की सेवा (सशस्त्र बलों को छोड़कर) में शामिल होने वाले सभी नए रंगरूटों के लिए लागू की गई है। यह एक भागीदारी तथा बाजार से जुड़ी योजना है, जहां कर्मचारी अपने वेतन से पेंशन कोष में सरकार के बराबर योगदान के साथ वित्तीय योगदान करते हैं। पश्चिम बंगाल को छोड़कर, सभी राज्यों ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली को लागू किया है।

NPS से संबंधित मुद्दे:

  • पुरानी योजना के तहत कर्मचारियों को पूर्व निर्धारित फार्मूले के तहत पेंशन मिलती है जो अंतिम आहरित वेतन का आधा (50%) होता है।
  • उन्हें साल में दो बार महंगाई राहत (Dearness Relief (DR)) के संशोधन का भी लाभ मिलता है। इसमें भुगतान तय (Fixed) होता है और इस वेतन से किसी प्रकार की कोई कटौती नहीं की जाती हैं।
    • पुरानी पेंशन प्रणाली (OPS) के तहत सामान्य भविष्य निधि (General Provident Fund (GPF)) का भी प्रावधान था।
  • NPS के तहत कर्मचारियों को महंगाई भत्ते के साथ मूल वेतन का 10% जमा करना होता है।
    • साथ ही इसमें कोई सामान्य भविष्य निधि का लाभ नहीं दिया जाता है और पेंशन की राशि भी तय नहीं है।
    • इस योजना के साथ प्रमुख चुनौती यह है कि यह बाजार से जुड़ा हुआ है और रिटर्न-आधारित है जो भुगतान को अनिश्चित बनाता है।
    • NPS के तहत पेंशन में मूल्य वृद्धि/मुद्रास्फीति की भरपाई के लिए कोई महंगाई राहत नहीं है जैसा कि OPS में उपलब्ध थी।
    • NPS कर्मचारी के 60 वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले जमा कोष से सभी प्रकार की वित्तीय निकासी को प्रतिबंधित करता है।
  • NPS की अनिश्चितता कई प्रतिभाशाली युवाओं को भविष्य में निजी क्षेत्र द्वारा दिए जाने वाले वेतन और अन्य लाभों में वृद्धि को देखते हुए सरकारी क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए हतोत्साहित कर सकती है।

सारांश:

  • NPS के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है और अब यह विरोध बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के रूप में दिख रहा है जिसमे OPS को फिर से शुरू करने की लगातार मांग की जा रही है। हाल ही में कई राजनीतिक दल लोकलुभावन चुनावी वादे के रूप में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि सरकारी कर्मचारी बहुत मुखर और एक महत्वपूर्ण दबाव समूह हैं।

संपादकीय-द हिन्दू

संपादकीय:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

वास्तुकला के पेशे को सुदृढ़ता प्रदान करने की आवश्यकता:

राजव्यवस्था और अभिशासन:

विषय: सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप।

मुख्य परीक्षा: वास्तुविद अधिनियम 1972 और संबंधित चिंताएं।

प्रारंभिक परीक्षा: वास्तुविद अधिनियम 1972

संदर्भ: वास्तुविद अधिनियम (1972) के नियमन के 50 साल पूर्ण हो चुके हैं।

पृष्ठभूमि विवरण:

  • वास्तुकला के आधुनिक पेशे को वैधानिक दर्जा देने के लिए वर्ष 1972 में वास्तुविद अधिनियम पारित किया गया था। तब से वास्तुकला के पेशेवर आधार में विस्तार हुआ और इसमें सतत प्रगति भी दर्ज की गई। वर्तमान में भारत में लगभग 1,26,000 पंजीकृत वास्तुविद हैं और प्रति वर्ष लगभग 10,000 नए वास्तुविद पंजीकृत होते हैं।
  • 19वीं शताब्दी में यूनाइटेड किंगडम में वास्तुकला एक अलग पेशे के रूप में उभरा। हालाँकि, यह भारत में अधिक लोकप्रिय नहीं था। देश में वास्तुविदों का पहला राष्ट्रीय स्तर का संघ 1929 में स्थापित किया गया था जिसमें लगभग 158 सदस्य थे।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में व्यवसायीकरण ने गति पकड़ी और दंत चिकित्सक अधिनियम 1948 और भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 जैसे पेशेवर कानून पारित किए गए। वास्तुविदों ने भी इसी तरह के कानून की मांग की और फलस्वरूप इस संबंध में 1972 में अधिनियम पारित किया गया।
  • 50 साल बाद भी इस पेशे से संबंधित जो समस्याएँ कायम हैं, वे इस प्रकार हैं:
    • पेशे को अभी तक उसका उचित अधिकार नहीं मिला है।
    • इंजीनियरिंग क्षेत्र के विरुद्ध एक कड़वी प्रतिद्वंद्विता मौजूद है।
    • वास्तुविदों के लिए कम पेशेवर वेतन।
    • बाजार की शक्तियों से अपर्याप्त सुरक्षा।
    • समाधान और प्रस्तावित कार्यप्रणाली को लेकर भी असमंजस की स्थिति।
  • वास्तुविद समुदाय की ओर से एक मांग है कि अधिनियम में संशोधन किया जाए और राज्य द्वारा इस पेशे को अधिक संरक्षण दिया जाना चाहिए।

कानूनी रूट के परिणाम:

  • इंजीनियरों और संबंधित व्यावसायिक सेवाओं से पेशे को अलग करने के लिए वास्तुविदों द्वारा अधिनियम को आवश्यक माना गया।
  • दूसरी ओर, सरकार ने वास्तुशिल्प सेवाओं को केवल वास्तुविदों के लिए रखने से करने से इनकार कर दिया, क्योंकि भवन से संबंधित सेवाएं इंजीनियरिंग सेवाओं के साथ अधिव्यापित थीं। सरकार द्वारा केवल योग्य और पंजीकृत पेशेवरों के लिए ‘वास्तुविद’ उपाधि को संरक्षित रखा गया।
  • अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अधिनियम उत्कृष्टता की गारंटी नहीं देते हैं और विनियम अपेक्षित प्रभाव के प्रतिकूल हैं क्योंकि बाजार की ताकतें अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • विशेषज्ञों का विचार है कि वास्तुकारों को ‘पेशे’ की पुरातन धारणाओं को त्याग देना चाहिए, जिनका संकीर्ण क्षेत्राधिकार है। इसके बजाय उन्हें व्यवसाय के विस्तार, आंतरिक सामंजस्य बढ़ाने और पेशेवर नैतिकता तथा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार पर ध्यान देना चाहिए।
  • एलियट फ्रीडसन का “डेफिनिटिव वर्क ऑन प्रोफेशनलिज्म” इस बात को सही ठहराता है कि व्यवसायीकरण श्रम विभाजन का एक सिद्धांत है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि इस तरह के एकाधिकार की आवश्यकता है, क्योंकि समाज द्वारा आवश्यक विशेष ज्ञान को पेशेवर प्राप्त करते हैं, उनका नियमन करते हैं और उनको विकसित करते हैं।
  • एलियट फ्रीडसन के विचार को स्वीकार करने वाले वास्तुविद तीन प्रमुख तथ्यों की अनदेखी करते हैं:
    • किसी भी पेशे में कोई अन्तर्निहित सुविधा नहीं होती है और ये केवल राज्य समर्थित कानूनों द्वारा संरक्षित होते हैं।
    • भारतीय संदर्भ में कोई भी पेशा बिना किसी होड़ के विकसित नहीं हुआ हैं,और इनसे संबंधित विमर्श अभी भी जारी है।
    • पिछले तीन दशकों में जमीनी हालात में काफी बदलाव आया है और बाजार एक प्रमुख संरक्षक बन गया है।

पेशे के संबंध में राज्य का दृष्टिकोण:

  • सार्वजनिक कल्याण की परिभाषा के संबंध में राज्य का दृष्टिकोण बदल गया है और यह काफी हद तक बाजार अर्थव्यवस्था से संबंधित हो गया है।
  • बड़े कॉर्पोरेट और बुनियादी ढांचा उद्योग प्रभावशाली ग्राहक और संरक्षक के रूप में वास्तुविद अधिनियम के प्रावधानों की अवहेलना कर सकते हैं।
  • इसके अलावा, पूर्ण सेवाओं जिसमें डिजाइन और निर्माण जैसी सेवाएं शामिल हैं, को उपलब्ध कराने वाली कंसल्टेंसी फर्मों को परियोजनाएं आवंटित करना बेहतर है।
  • राज्य और बाजार पर निर्भरता के कारण वास्तुविद असमान समूहों में बँट गए हैं।
  • माइकल रीड (संगठनात्मक विश्लेषण के विद्वान) के अनुसार, इन्हें इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है:
    • प्रभावशाली अभिजात वर्ग और उनकी बड़ी फर्मों का एक अल्पसंख्यक समूह।
    • मध्यम और छोटी फर्मों वाले स्वतंत्र वास्तुकारों का एक प्रभावी समूह।
  • प्रभावशाली अभिजात वर्ग के अल्पसंख्यक समूह बाजार अर्थव्यवस्था को एक लाभ के रूप में देखते हैं और प्रतिस्पर्धी मांगों का समर्थन करते हैं। उच्च टर्नओवर आवश्यकताओं जैसे बड़े प्रवेश अवरोधक की स्थिति में ये फलते-फूलते हैं, क्योंकि छोटी और मझोली फर्मों को प्रतिस्पर्धा से बाहर रखा जा सकता है।

भावी कदम:

  • पेशे से संबंधित 19वीं और 20वीं सदी की परिभाषाएं, जो विशेष क्षेत्राधिकारों पर जोर देती है, को त्यागने की आवश्यकता है। वास्तुविदों को अपने पेशे को एक ऐसी सेवा के रूप में देखना चाहिए जो परियोजना प्रबंधन और भवन विज्ञान जैसी अन्य संबद्ध भवन सेवाओं से सुदृढ़ होती है। बिल्डिंग पेशेवरों का गठबंधन बनाने से उनकी सामूहिक प्रासंगिकता बढ़ सकती है और सौदेबाजी की शक्ति बढ़ सकती है।
  • बड़ी फर्मों और अभिजात समूहों को छोटी और मध्यम फर्मों की मदद करनी चाहिए और गंभीर प्रवेश बाधाओं जो पूरे पेशे के लिए प्रतिकूल हो सकती हैं, को दूर करने के लिए एक साथ आना चाहिए।
  • पेशे की आत्मा जो कि ‘व्यवसाय और संस्थागत नैतिकता’ है, को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इससे सेवा की गुणवत्ता में वृद्धि होगी।

सारांश:

  • वास्तुविद अधिनियम 1972 और वास्तुविद के पेशे से संबंधित कई चिंताएं जुड़ी हुई हैं। अधिनियम में किए जाने वाले किसी भी नए संशोधन में बदले हुए परिदृश्य पर विचार किया जाना चाहिए और व्यवसायों के बीच गठबंधन और तालमेल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित

म्यांमार में जारी गतिरोध:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

विषय: भारत के हित पर विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव।

प्रारंभिक परीक्षा: म्यांमार में सैन्य तख्तापलट।

मुख्य परीक्षा: म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और लोकतंत्र को बहाल करने का प्रयास।

संदर्भ: म्यांमार में सैन्य तख्तापलट को इक्कीस महीने बीत चुके हैं।

विवरण:

  • म्यांमार में 2021 में एक सैन्य तख्तापलट ने एक दशक पुराने लोकतंत्र के प्रयोग को पुनः पटरी से उतार दिया। इसके परिणामस्वरूप, म्यांमार के नागरिक कष्ट झेलने को मजबूर हैं, अधिकारी और विपक्षी ताकतें हिंसक झड़पों में घिरे हुए हैं और अर्थव्यवस्था बदतर हो चुकी है।
  • म्यांमार में समस्या के समाधान हेतु आसियान का मिशन भी विफल हो गया है।

पृष्ठभूमि विवरण:

  • म्यांमार की सेना (तत्माडॉ) नवंबर 2020 के चुनावों में आंग सान सू की के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की जीत से नाखुश थी। नतीजतन, इसने संविधान का उल्लंघन करते हुए एक तख्तापलट को अंजाम दिया।
  • सेना की सोच थी कि म्यांमार के लोग पिछले दशकों की तरह ही उसके फरमान को स्वीकार करेंगे। इसने स्वतंत्रता और लोकतंत्र के प्रति जनता की प्रतिबद्धता को कम करके आंका।
  • 2,300 से अधिक लोगों को मारने और हजारों (सु की सहित) को कैद करने के बाद भी सेना को अभी भी जनता के गुस्से और विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है।

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें: Myanmar Coup d’état 2021: Background and Events [UPSC Notes]

सेना पर लगाम लगाने में विपक्षी दलों की भूमिका:

विपक्ष ने दो तरीकों से म्यांमार को नियंत्रित करने के सेना के प्रयास पर लगाम लगाया:

  • राष्ट्रीय एकता सरकार (NUG) ने सैन्य शासन के खिलाफ आक्रोश को प्रभावी दिशा प्रदान किया।
    • NUG एक समानांतर सरकार है जिसे किसी राज्य (राष्ट्र) द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। हालाँकि, इसे विदेशों से राजनीतिक और वित्तीय सहायता प्राप्त होती है।
  • लगभग 20 जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) जो म्यांमार के पूर्व, पश्चिम और उत्तर में स्थित हैं, ने तख्तापलट के बाद के संघर्ष के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए। उदाहरण के लिए, काचिन और केरेन जैसे समूहों ने NUG का समर्थन किया, जबकि चीन और रखाइन राज्यों में सक्रिय समूह का सेना के साथ भयंकर सशस्त्र संघर्ष हुआ।
  • लेकिन यह महसूस किया गया कि संसाधनों की कमी और NUG में नेतृत्व की कमी तथा EAO में विभाजन और सापेक्ष कमजोरियों के कारण, इसके द्वारा सेना को हराने की संभावना नहीं दिख रही है।

अंतर्राष्ट्रीय आयाम:

  • लगभग 1.1 मिलियन रोहिंग्या जो 2017 में सैन्य उत्पीड़न के कारण बांग्लादेश चले गए, वहां अभी भी दुर्बल स्थिति में रह रहे हैं। उनकी सुरक्षित वापसी की व्यवस्था करने के बांग्लादेश के प्रयास कई बार विफल रहे हैं। इसके अलावा, म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्र में सेना और उनके जातीय विरोधियों के बीच सशस्त्र संघर्षों का बांग्लादेश पर प्रभाव पड़ा है।
  • संयुक्त राष्ट्र ने तख्तापलट की आलोचना की है और हिंसा पर चिंता व्यक्त की है। इसने सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए आवाज उठाई है, हितधारकों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया है और एक लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन किया है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष दूत क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देने में कुछ खास उपलब्धि हासिल नहीं कर सके।
  • इस समस्या से निपटने तरीके पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भी तीखे मतभेद हैं, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र के प्रयास विफल हो गए हैं। उदाहरण के लिए:
    • पश्चिमी देश सेना की कार्रवाई के आलोचक हैं और उन्होंने इस पर गंभीर प्रतिबंध लगाए हैं। उन्होंने NUG का भी समर्थन किया है।
    • रक्षा और ऊर्जा आपूर्ति में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में रूस ने सैन्य शासन को समर्थन प्रदान किया।
    • दूसरी ओर, चीन ने व्यापार जारी रखते हुए और चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे के अवसर का फायदा उठाते हुए लोकतंत्र के लिए दरवाजा खुला रखा है।
    • आसियान राष्ट्र इस तरह विभाजित हैं:
      • इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर लोकतंत्र के पक्षधर हैं।
      • थाईलैंड और लाओस सैन्य शासन के पक्ष में हैं।
      • फिलीपींस और वियतनाम दोनों पक्षों के समर्थक हैं।
  • आसियान के सदस्यों के बीच फूट के कारण पांच सूत्री सहमति को लागू नहीं किया जा सका।
  • तख्तापलट के बाद की स्थितियों ने भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय सहयोग पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। विभिन्न बड़ी परियोजनाओं को रोक दिया गया है और लगभग 50,000 शरणार्थियों ने मिजोरम में डेरा डाल दिया है। भारत द्वारा सक्रिय रूप से कैदियों की रिहाई, लोकतंत्र की जल्द बहाली और आंतरिक बातचीत की वकालत की गई है।

भावी कदम:

  • भारत आसियान और समान विचारधारा वाले पड़ोसी देशों के साथ मध्यस्थता की भूमिका निभाने का विकल्प भी तलाश सकता है।
  • अन्य देश राजनीतिक समझौते के लिए उपयुक्त वातावरण के निर्माण में म्यांमार को सहायता प्रदान कर सकते हैं। जापान और नॉर्वे जैसे देश शांति कायम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
  • इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि प्रमुख भूमिका म्यांमार में दोनों समूहों के नेतृत्व और अभिजात वर्ग में निहित है। उन्हें 2011-12 जैसे रास्ते की तलाश करनी चाहिए।

संबंधित लिंक:

India-Myanmar Relations: Importance, Background for UPSC International Relations

सारांश :

  • म्यांमार में लंबे समय से चले आ रहे सैन्य तख्तापलट ने इसकी अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण रूप से इसकी लोकतांत्रिक राजनीति दोनों को पटरी से उतार दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा क्षेत्र में शांति कायम करने के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनानागठित किया जाना चाहिए।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

अक्टूबर में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं व्यापक चिंता की ओर इशारा करती हैं:

शासन:

विषय: विभिन्न क्षेत्रों में विकास हेतु सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप- नागरिक उड्डयन क्षेत्र।

मुख्य परीक्षा: भारत में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएँ।

संदर्भ: हाल ही में उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटना।

विवरण:

  • अक्टूबर 2022 के महीने में भारत में तीन हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं में 13 लोगों की मौत हो गई। दो दुर्घटनाएं अरुणाचल प्रदेश के तवांग और ऊपरी सियांग जिलों में सैन्य हेलीकॉप्टर में हुईं, जबकि एक दुर्घटना केदारनाथ में हुई जिसमें सात तीर्थयात्रियों की मौत हो गई।
  • अभी तक विभिन्न दुर्घटनाओं में सैकड़ों मौतें हुई हैं। उत्तराखंड में सबसे ज्यादा हेलिकॉप्टर दुर्घटनाएं होती हैं। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 और 2019 के बीच उत्तराखंड में तीर्थयात्रियों को ले जाने वाले लगभग नौ हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं का शिकार हो गए।
  • अत्यधिक संख्या में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं पूर्वोत्तर भारत में भी देखी जाती हैं।

वाणिज्यिक हेलीकॉप्टर में दुर्घटनाएं:

  • 1990 और 2019 के बीच हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं में लगभग 150 लोगों (पायलट, चालक दल और यात्री) की मृत्यु हुई है।
  • इसमें लगभग 40% दुर्घटनाएं पायलट की गलती के कारण हुई हैं। जबकि 19 फीसदी दुर्घटनाएं खराब मौसम के कारण हुई हैं।
  • लगभग 9% दुर्घटनाओं के लिए ‘केबल हिट’ को उत्तरदायी ठहराया गया था, जहां एक हेलीकॉप्टर स्थानीय निवासियों द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों में वस्तुओं की ढुलाई के लिए उपयोग किए जाने वाले तारों/केबलों में फंस जाता है।
  • इसके अलावा, लगभग 85% मौतें दिन के उजाले में हुई हैं।
  • यह देखा गया कि दुर्घटनाओं के दौरान 54% हेलीकॉप्टर परिभ्रमण (cruising) कर रहे थे, और 37% हेलीकॉप्टर उतर रहे थे। टेक-ऑफ सबसे सुरक्षित था क्योंकि 1990-2019 के दौरान इससे सबसे कम मौतें हुई हैं।

अन्य विवरण:

  • वाणिज्यिक हवाई जहाज दुर्घटना के विश्लेषण के अनुसार, 1990-2019 के दौरान पूरे भारत में 999 मौतें दर्ज की गई हैं।
  • यह देखा गया कि पिछले दशक में उसके पिछले दशक की तुलना में हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज दोनों में हुई दुर्घटनाओं की संख्या में गिरावट आई है।
  • 1998 से 2021 की अवधि में रक्षा हेलीकॉप्टरों से जुड़ी दुर्घटनाओं में लगभग 124 सैन्य कर्मियों की मौत हो गई है।

भारतीय उड्डयन मानकों के साथ चुनौती:

  • अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के यूनिवर्सल सेफ्टी ओवरसाइट ऑडिट प्रोग्राम (2016 से 2018 तक) के विश्लेषण के अनुसार, इस पर प्रकाश डाला गया था कि:
  • विश्लेषण किए गए आठ मापदंडों में से दो में भारत का प्रदर्शन खराब रहा है। ये इस प्रकार हैं:
    • कार्मिक लाइसेंसिंग और प्रशिक्षण
    • नागरिक उड्डयन संगठन
  • ये दो क्षेत्र प्रमुख रूप से राज्य में उपयुक्त विमानन एजेंसियों के गठन से संबंधित हैं। ये डिटेल प्रक्रियाओं और उनके कार्यान्वयन को भी शामिल करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि कार्मिक और संगठन उड़ान की वांछित आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
  • लाइसेंसिंग व्यवस्था और संगठनात्मक प्रक्रियाओं में खराब स्कोर, इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि लगभग 40% हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं पायलट की त्रुटियों के कारण हुईं,जो एक गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती हैं।

सारांश:

  • अक्टूबर 2022 में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं के कारण बड़ी संख्या होने वाली मौतों ने एक बार फिर भारत में खराब विमानन मानकों के मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। भविष्य में मौतों की संख्या को कम करने के लिए अधिकारियों को इस मामले को गंभीरता से देखना चाहिए।

प्रीलिम्स तथ्य:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

1.विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह:

  • भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण (Anthropological Survey of India-AnSI) ने अपने विभिन्न क्षेत्रीय केंद्रों पर कई आदिवासी समुदायों की झोपड़ियों को फिर से बनाया है।
  • एएनएसआई (AnSI) ने इन झोपड़ियों को आदिवासी समुदायों की विरासत को प्रदर्शित करने के लिए फिर से बनाया है,जो की मुख्य तौर पर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTGs)) से सम्बंधित हैं।
  • इस प्रयास की प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई अलग अलग समूहों द्वारा की गई है।
  • झोपड़ियों की डिजाइन प्रामाणिक है और ये आदिवासी लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली सामग्रियों का उपयोग करके बनाई गई हैं, इस प्रकार ये कलाकृतियां उन समुदायों के जीवन की एक दुर्लभ झलक प्रस्तुत करते हैं जो उन स्थानों पर रहते हैं जो दूसरों के लिए सुलभ नहीं हैं।
    • उदाहरण के लिए-पारंपरिक जारवा झोपड़ी, जिसे चड्डा (chadda) कहा जाता है, में पारंपरिक टोकरियाँ, धनुष और तीर तथा इस समुदाय द्वारा उपयोग की जाने वाली अन्य कलाकृतियां बनाई की गई हैं।

2. हिम तेंदुआ (Snow Leopard):

  • हाल ही में एक कैमरा ट्रैपिंग में कश्मीर के ऊपरी बालटाल-जोजिला क्षेत्र में पहली बार एक हिम तेंदुए की उपस्थिति दर्ज की गई है।
  • इससे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में हिम तेंदुए (snow leopard) की उपस्थिति की उम्मीदें बढ़ी हैं।
  • प्रकृति संरक्षण फाउंडेशन (भारत) (Nature Conservation Foundation (India)) के शोधकर्ताओं द्वारा कैमरा ट्रैपिंग अभ्यास ने जम्मू-कश्मीर के वन्य जीव संरक्षण विभाग के साथ साझेदारी के तहत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के ऊपरी इलाकों में एशियाई आइबेक्स, भूरा भालू और कश्मीर कस्तूरी मृग जैसी अन्य महत्वपूर्ण और दुर्लभ प्रजातियों के लिए भी उम्मीद जगाईं हैं।
  • यह शोध केंद्र सरकार के स्नो लेपर्ड पापुलेशन असेसमेंट ऑफ इंडिया (Snow leopard Population assessment of India (SPAI)) का हिस्सा है।
    • SPAI अब तक हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में किया जा चुका है।
  • भारत ने ग्लोबल स्नो लेपर्ड एंड इकोसिस्टम प्रोटेक्शन प्रोग्राम ( Global Snow Leopard and Ecosystem Protection Program (GSLEP)) की पुष्टि की है, जो सभी 12 स्नो लेपर्ड क्षेत्रों वाले देशों का एक उच्च स्तरीय अंतर सरकारी गठबंधन है।
    • इन सरकारों ने संयुक्त रूप से विश्व के हिम तेंदुओं, या PAWS की जनसंख्या का आकलन करने का प्रयास शुरू किया है।
    • हिम तेंदुए की संरक्षण योजना के लिए और उनकी स्थिति को समझने के महत्व को स्वीकार करते हुए,भारत सरकार ने भारत का PAWS प्रयास शुरू किया है, जिसे यहां ‘हिम तेंदुए जनसंख्या आकलन भारत (SPAI)’ के रूप में संदर्भित किया गया है।
    • SPAI से इस लुप्तप्राय और दुर्ग्राह्य कैट (elusive cat) के उच्च ऊंचाई वाले निवास स्थान के अंदर और बाहर दोनों संरक्षित क्षेत्रों में वैज्ञानिक रूप से मजबूत राष्ट्रीय और राज्य-वार जनसंख्या अनुमान लगाने की उम्मीद है।

3. ‘इंडियन ब्लैक हनी बी'(Indian Black Honey Bee):

  • शोधकर्ताओं ने मधुमक्खी की एक नई प्रजाति की खोज की है जो पश्चिमी घाट के लिए स्थानिक है। 200 से अधिक वर्षों के अंतराल के बाद खोजी गई इस प्रजाति का नाम एपिस करिनजोडियन (Apis karinjodian) रखा गया है, जिसका सामान्य नाम ‘इंडियन ब्लैक हनी बी’ है।
  • भारत में आखिरी बार खोजी गई मधुमक्खी एपिस इंडिका (Apis indica) थी जिसे 1798 में फेब्रियस द्वारा पहचाना गया था।
  • एपिस करिंजोडियन एपिस सेराना मॉर्फोटाइप्स से विकसित हुआ है जो पश्चिमी घाट के गर्म और आर्द्र वातावरण के अनुकूल है।
  • एपिस करिनजोडियन का वितरण मध्य पश्चिमी घाट और नीलगिरी से लेकर दक्षिणी पश्चिमी घाट तक, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों में है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1. भारत में वायु प्रदूषण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (स्तर – मध्यम)

  1. लंबे समय तक हवा में मौजूद रहने वाले सूक्ष्म कणों (PM 2.5 प्रदूषक) के संपर्क में रहने से प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में रक्ताल्पता का खतरा बढ़ सकता है।
  2. प्रजनन आयु वर्ग (15-45 वर्ष) की महिलाओं में भारत में रक्ताल्पता की व्यापकता दुनिया में सर्वाधिक है।
  3. रक्ताल्पता अक्सर लाल रक्त कोशिकाओं में कमी की वजह से होता है। इससे रक्त की ऑक्सीजन वहन करने की क्षमता कम हो जाती है।

सही कूट का चयन कीजिए :

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर: d

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है: हाल के अध्ययन से पता चला है कि लंबे समय तक हवा में मौजूद रहने वाले सूक्ष्म कणों (PM 2.5 प्रदूषक) के संपर्क में रहने से सिस्टमेटिक इंफ्लमैशन के माध्यम से प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में रक्ताल्पता का खतरा बढ़ सकता है।
  • कथन 2 सही है: भारत में प्रजनन आयु (15-45 वर्ष) की महिलाओं में रक्ताल्पता की व्यापकता दुनिया में सबसे अधिक है।
  • एक अध्ययन के अनुसार, ‘स्वच्छ वायु के लक्ष्य के साथ प्रजनन आयु की भारतीय महिलाओं में रक्ताल्पता के बोझ को कम करना’, यदि भारत अपने हालिया स्वच्छ-वायु लक्ष्यों को पूरा करता है, तो रक्ताल्पता का प्रसार 53 प्रतिशत से घटकर 39.5 प्रतिशत हो जाएगा।
  • कथन 3 सही है: रक्ताल्पता वैश्विक बीमारी के बोझ में एक प्रमुख योगदानकर्ता है और इससे रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है और रक्ताल्पता अक्सर लाल रक्त कोशिकाओं में कमी की वजह से होता है।
  • इससे रक्त की ऑक्सीजन को वहन करने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 2. वर्ष 2018 में फाल्कन हेवी रॉकेट की पहली अंतरिक्ष उड़ान में, निम्नलिखित में से किसे परीक्षण पेलोड के रूप में भेजा गया था? (स्तर – कठिन)

(a) अमेरिकी राष्ट्रीय ध्वज को

(b) एक इलेक्ट्रिक स्पोर्ट्स कार को

(c) एक कुत्ता को

(d) एक पैराशूट को

उत्तर: b

व्याख्या:

  • वर्ष 2018 में फाल्कन हैवी को छोड़ा गया जिसमें परीक्षण पेलोड के रूप में ‘टेस्ला रोडस्टर कार’ को लॉन्च के समय इस्तेमाल किया गया था।
  • यह कार अभी भी अंतरिक्ष में सूर्य के चारों ओर एक आयताकार पथ पर चक्कर लगा रही है जो मंगल के कक्षीय पथ तक जाता है।

प्रश्न 3. मलेरिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (स्तर – कठिन)

  1. उप-सहारा अफ्रीका में मलेरिया से मरने वालों में अधिकांश पांच साल से कम उम्र के बच्चे हैं।
  2. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अक्टूबर 2021 में बच्चों के टीकाकरण के लिए ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन द्वारा विकसित RTS, S/AS01 (मॉस्क्यूरिक्स) को मंजूरी दे दी।
  3. 5 साल से कम उम्र के बच्चों को चार खुराक देने के बाद RTS, S/AS01 गंभीर मलेरिया के मामलों को केवल 30 प्रतिशत तक कम करता है।

सही कूट का चयन कीजिए:

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर: d

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है: मलेरिया से हर साल लगभग 600,000 लोगों की मौत होती है, जिनमें से अधिकांश उप-सहारा अफ्रीका में पांच साल से कम उम्र के बच्चे हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की तुलना में अफ्रीकी क्षेत्र में मलेरिया के सबसे अधिक मामले दर्ज किये गए है।
    • वर्ष 2020 में मलेरिया (malaria ) के सभी मामलों में से 95% और 96% मौत के मामले इस क्षेत्र से थे।
    • इस क्षेत्र में मलेरिया से होने वाली सभी मौतों में से लगभग 80% बच्चों की उम्र 5 वर्ष से कम है।
  • कथन 2 सही है: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अक्टूबर 2021 में बच्चों के टीकाकरण के लिए ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन द्वारा विकसित RTS, S/AS01 (मॉस्क्यूरिक्स) को मंजूरी दी थी।
    • WHO ने उप-सहारा अफ्रीका में मध्यम से उच्च पी. फाल्सीपेरम मलेरिया (P. falciparum malaria) संचरण वाले अन्य क्षेत्रों में बच्चों के बीच RTS, S/AS01 मलेरिया वैक्सीन के व्यापक उपयोग की सिफारिश की थी।
  • कथन 03 सही है:RTS, S/AS01 वर्ष 2015 में मलेरिया वैक्सीन की निर्धारित 75 प्रतिशत तक की प्रभावकारिता के लिए WHO के अपने बेंचमार्क को पूरा करने में विफल रहा था।
  • 5 साल से कम उम्र के बच्चों को दी जाने वाली चार खुराकों के बाद, RTS, S/AS01 में मामूली प्रभावकारिता होती है जो गंभीर मलेरिया के मामलों को केवल 30 प्रतिशत तक कम करता है।

प्रश्न 4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (स्तर – मध्यम)

  1. वर्ष 2021 को अब तक के सबसे गर्म वर्ष के रूप में रिकॉर्ड किया गया है।
  2. 2022 में ग्लोबल वार्मिंग अब तक के सर्वाधिक लंबे समय तक मौजूद रहने वाले ला नीना की उपस्थिति के बावजूद हुई है, जो अस्थायी रूप से पृथ्वी को थोड़ा ठंडा कर देती है।
  3. 2022 के लिए वैश्विक औसत तापमान वर्तमान में लगभग 1.15 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है जो पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में अधिक है।

सही कूट का चयन कीजिए:

(a) केवल 1 कथन सही है

(b) केवल 2 कथन सही हैं

(c) सभी कथन सही हैं

(d) कोई भी कथन सही नहीं है

उत्तर: b

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: वर्ष 2016 को अब तक के सबसे गर्म वर्ष के रूप में रिकॉर्ड किया गया है। जब वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक समय की तुलना में लगभग 1.28 डिग्री सेल्सियस अधिक मापा गया था।
  • कथन 02 सही है: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization (WMO)) के अनुसार, 2022 में ग्लोबल वार्मिंग अब तक ला नीना (भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के पानी का ठंडा होना) की उपस्थिति के बावजूद हुई है, जो अस्थायी रूप से पृथ्वी को थोड़ा ठंडा कर देती है।
  • कथन 03 सही है: WMO के एक नए आकलन के अनुसार, 2022 के लिए वैश्विक औसत तापमान के वर्तमान में पूर्व-औद्योगिक समय की तुलना में लगभग 1.15 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने का अनुमान है।

प्रश्न 5. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिएः (CSE-PYQ-2022) (स्तर-मध्यम)

  1. सरकारी विधि अधिकारियों और कानूनी फर्मों को एडवोकेट के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन कॉर्पोरेट वकीलों और पेटेंट अटॉर्नी को एडवोकेट के रूप में मान्यता से बाहर रखा गया है।
  2. बार काउंसिल को कानूनी शिक्षा और लॉ कॉलेजों की मान्यता से संबंधित नियम बनाने की शक्ति है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: b

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: कॉर्पोरेट वकीलों, साथ ही पेटेंट वकीलों को भी वकीलों के रूप में मान्यता प्राप्त है और वकीलों के रूप में उनकी मान्यता पर कोई रोक नहीं है।
  • कथन 2 सही है: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 7 (1) (h) के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को विधिक शिक्षा को बढ़ावा देने और ऐसी शिक्षा प्रदान करने वाले विश्वविद्यालयों के परामर्श से ऐसी शिक्षा के ‘मानक’ निर्धारित करने का अधिकार है।
  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 4 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है जो भारत में कानूनी अभ्यास और विधिक शिक्षा को नियंत्रित करता है।

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1. समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। क्या आप इससे सहमत हैं? इस कथन की पुष्टि कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र II-राजव्यवस्था)

प्रश्न 2.हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं के सबसे सामान्य कारणों का परीक्षण कीजिए साथ ही इसके निवारक उपायों का सुझाव भी दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र III-रक्षा)