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भारत सरकार ने जुलाई 1991 में नए आर्थिक सुधारों की घोषणा की थी जिसे नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) या आमतौर पर “LPG”  सुधार के नाम से जाना जाता है । यहां “L” का अर्थ लिबरलाइजेशन (उदारीकरण); “P” का अर्थ प्राइवेटाइजेशन (निजीकरण) और “G” का अर्थ ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण) है । इस दिन से भारत में एक नए आर्थिक युग की शुरुआत हुई जिसका मुख्य लक्ष्य आर्थिक समृद्धि को प्राप्त करना एवं देश की अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याओं को दूर करना था ।

उदारीकरण

उदारीकरण  का अर्थ है ‘बाज़ार को मुक्त करना’ अर्थात उसपर से अनावश्यक सरकारी नियन्त्रण को कम करना । भारतीय अर्थव्यवस्था में एक समय ऐसा आया जब  आर्थिक गतिविधियों के नियमन के लिए बनाए गए कानून ही देश की वृद्धि और विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गए । इस दौर को कोटा- परमिट राज के नाम से जाना जाता था जहाँ किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि के लिए औद्योगिक अनुज्ञप्ति (लाइसेंस) की आवश्यकता होती थी । यह एक जटिल और लम्बी प्रक्रिया थी जो लाल -फीताशाही को बढ़ावा देती थी । उदारीकरण इन्हीं जटिलताओं व प्रतिबंधों को दूर कर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को ‘मुक्त’ करने की एक कोशिश थी ।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर उदारीकरण नीति के कुछ प्रमुख प्रभाव निम्नवत हैं :

  • इसने घरेलू उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया तथा इस माध्यम से आर्थिक विकास को सुनिश्चित किया;
  • इसने नियमित आयात और निर्यात के साथ अन्य देशों के साथ विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया;
  • इसने देश में विदेशी पूंजी और प्रौद्योगिकी को बढ़ाया;
  • इसने देश की वैश्विक बाजार सीमाओं का विस्तार किया और देश के कर्ज के बोझ को कम करने में सहायता की ।

उदारीकरण नीति के तहत  कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किए गए :- औद्योगिक क्षेत्रक, वित्तीय क्षेत्रक, कर-सुधार, विदेशी विनिमय बाज़ार, व्यापार तथा निवेश क्षेत्र ।

औद्योगिक क्षेत्र का विनियमीकरण 

1991 के सुधारों से पहले देश में  कोटा-परमिट राज व्यवस्था थी, जिसमें  फर्म स्थापित करने, बंद करने या उत्पादन की मात्रा का निर्धारण करने के लिए किसी न किसी सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती थी । अनेक उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया था और उनमें  निजी उद्यमियों का प्रवेश ही निषिद्ध था । कुछ वस्तुओं का उत्पादन केवल लघु उद्योग ही कर सकते थे और सभी निजी उद्यमियों को कुछ औद्योगिक उत्पादों की कीमतों के निर्धारण तथा वितरण के बारे में भी अनेक नियंत्रणों का पालन करना पड़ता था । 1991 की उदारीकरण नीति ने इनमें से अनेक प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया । निम्नलिखित 6  उत्पाद श्रेणियों को छोड़ अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया:- 

  • एल्कोहल, 
  • सिगरेट, 
  • जोखिम भरे रसायन व औद्योगिक विस्फोटक, 
  • इलेक्ट्रोनिकी, 
  • विमानन तथा 
  • दवाइयां

अब सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए सुरक्षित उद्योगों में भी केवल कुछ मुख्य गतिविधियाँ, जैसे  परमाणु ऊर्जा उत्पादन, रक्षा क्षेत्र  और रेल परिवहन इत्यादि  ही बचे हैं । लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अधिकांश वस्तुएँ भी अब अनारक्षित श्रेणी में आ गई हैं । अनेक उद्योगों में अब  कीमत  निर्धारण का कार्य बाज़ार स्वयं करता है । यही उदारीकरण का लक्ष्य भी था ।

वित्तीय क्षेत्र के  सुधार

वित्तीय क्षेत्र में व्यावसायिक और निवेश बैंक, स्टॉक एक्सचेंज तथा विदेशी मुद्रा बाज़ार जैसी वित्तीय संस्थाएँ सम्मिलित हैं । भारत में वित्तीय क्षेत्र के  नियमन का दायित्व भारतीय रिजर्व बैंक(RBI) का  है । वित्तीय क्षेत्र की  सुधार नीतियों का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि रिजर्व बैंक को इस क्षेत्र  का केवल  नियंत्रक न बना कर  उसे इस क्षेत्र का  एक सहायक बनाया जाए । इसका अर्थ है कि वित्तीय क्षेत्रक रिजर्व बैंक से सलाह किए बिना ही कई मामलों में अपने निर्णय लेने में स्वतंत्र हो जाए ।

वित्तीय क्षेत्र की सुधार नीतियों के तहत  बैंकों की पूँजी में विदेशी भागीदारी की सीमा 74 प्रतिशत कर दी गई । कुछ निश्चित शर्तों को पूरा करनेवाले बैंक अब रिज़र्व बैंक की अनुमति के बिना ही नई शाखाएँ खोल सकते हैं । यद्यपि बैंकों को अब देश -विदेश से और अधिक संसाधन जुटाने की भी अनुमति है पर खाता धारकों और देश के हितों की रक्षा के उद्देश्य से कुछ नियंत्रक शक्ति अभी भी रिजर्व बैंक के पास ही हैं । विदेशी निवेश संस्थाओं (F.I.I) तथा व्यापारी बैंक, म्युचुअल फंड और पेंशन कोष आदि को भी अब भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेश की अनुमति मिल गई है ।

कर व्यवस्था में सुधार

इन सुधारों का संबंध राजकोषीय नीतियों से है जिसके अंतर्गत  सरकार की कराधान शक्ति और सार्वजनिक व्यय नीतियां आती  हैं । इस नीति के तहत  1991 के बाद से व्यक्तिगत आय पर लगाए गए करों में निरंतर रियायतें दी गई है ताकि दरों को कम कर कर -चोरी से होने वाले नुकसान से बचा जा सके । यह तर्क दिया  जाता है कि करों की दरें अधिक ऊँची नहीं हों, तो बचतों को बढ़ावा मिलता है और लोग अपेक्षाकृत अधिक ईमानदारी  से अपनी आय का विवरण  देते हैं । निगम कर की दर में भी कमी की  गई ताकि कंपनियों के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सके ।

विदेशी विनिमय सुधार

विदेशी विनिमय क्षेत्र में सुधार के तहत  1991 में भुगतान संतुलन की समस्या के तत्कालिक निदान के लिए अन्य देशों की और मुद्रा की तुलना में रुपये का अवमूल्यन किया गया । इससे निर्यात को बढ़ावा मिला और  देश में विदेशी मुद्रा के भंडार  में वृद्धि हुई । इसके कारण व्यापार संतुलन साम्य भी स्थापित हुआ ।

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