‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ (UNFPA) ने ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट’ जारी की। इसके अनुसार, वर्ष 2010 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या में 1.2% की औसत वृद्धि हुई है। यह वृद्धि चीन की औसत वार्षिक वृद्धि दर के दोगुने से भी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी के द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट के मद्देनजर यह आवश्यक हो जाता है कि हम भारत की जनसंख्या नीति की पड़ताल करें।
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जनसंख्या किसे कहते हैं?
किसी विशिष्ट प्रजाति के जीवों के उस समूह को जनसंख्या के नाम से संबोधित किया जाता है, जो आपस में अंतः प्रजनन करने में सक्षम होते हैं तथा अपनी वंश वृद्धि कर सकते हैं।
जनसंख्या वृद्धि किसे कहते हैं?
किसी क्षेत्र विशेष में एक निश्चित समय अवधि के दौरान जनसंख्या में होने वाली बढ़ोतरी को जनसंख्या वृद्धि कहा जाता है। जनसंख्या में होने वाली यह बढ़ोतरी धनात्मक भी हो सकती है और ऋणात्मक भी।
भारत में जनसंख्या नीति
- स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद से ही भारत सरकार भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को लेकर चिंतित थी। पहली पंचवर्षीय योजना के समय से ही भारत सरकार ने भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयास किए हैं। इसी कड़ी में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाने वाला भारत विश्व का पहला देश बना था।
- सर्वप्रथम वर्ष 1960 में एक विशेषज्ञ समूह ने भारत में एक जनसंख्या नीति बनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद वर्ष 1976 में भारत ने पहली जनसंख्या नीति अपनाई थी।
- भारत सरकार ने एम. एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल गठित किया था। इसकी सिफारिश के आधार पर वर्ष 2000 में भारत ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति अपनाई थी। भारत की इस नवीनतम जनसंख्या नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- प्रति 1000 जीवित बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 30 से कम करना।
- प्रति 1 लाख बच्चों के जन्म पर मातृ मृत्यु 100 से कम करना।
- प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य की देखभाल के लिए एक समुचित सेवा प्रणाली विकसित करना।
- गर्भनिरोधक एवं स्वास्थ्य सुविधाओं संबंधी बुनियादी ढांचा सुदृढ़ करना।
- वर्ष 2010 तक 2.1 की ‘सकल प्रजनन दर’ (TFR) प्राप्त करना तथा वर्ष 2045 तक जनसंख्या स्थायित्व प्राप्त करना।
- लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि करना।
- एड्स का प्रसार रोकना और प्रजनन अंग संबंधी रोगों के प्रबंधन व ‘राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन’ (NACO) के बीच समन्वय स्थापित करना।
- 80% प्रसव अस्पतालों, नर्सिंग होम्स इत्यादि में संपन्न कराना तथा इस कार्य हेतु प्रशिक्षित लोगों को नियुक्त करना।
- प्रत्येक व्यक्ति को सूचना व परामर्श देना तथा गर्भनिरोधक संबंधी अनेक विकल्प उपलब्ध कराना।
- चौदह वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाना।
- बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या 20% से कम करना।
- सभी बच्चों को टीका जनित प्रतिरक्षित उपलब्ध करना।
- जन्म, मरण, विवाह और गर्भ का 100% पंजीकरण सुनिश्चित करना।
- संक्रामक रोगों को नियंत्रित करना तथा प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य सुविधाओं को घर-घर तक पहुंचाना।
- एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित करना।
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग
‘राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000’ के अंतर्गत मई 2000 में एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित किया गया था। इस आयोग के अंतर्गत एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष’ की स्थापना भी की गई थी, लेकिन आगे इसे ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग’ को हस्तांतरित कर दिया गया था। इस आयोग की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। इस आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
- राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करना।
- राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की निगरानी करना तथा इससे संबंधित दिशा-निर्देश देना।
- इस जनसंख्या नीति हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण व अन्य विकास कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करना।
- इससे संबंधित कार्यक्रमों की योजना बनाने व उन्हें क्रियान्वित करते समय अंतरक्षेत्रीय समन्वय को बढ़ावा देना।
भारत में जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारक
भारत अनेक प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा हुआ देश है। ऐसे में, भारत की जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले अनेक कारक उत्तरदाई हैं।
- यदि स्थलाकृतिक दृष्टि से देखें तो भारत के लोग पर्वतों और पठारों की अपेक्षा मैदानों में रहना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए भारत में मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक है। मैदानी क्षेत्र सामान्यतः कृषि, विनिर्माण व सेवा क्षेत्रकों के लिहाज से अधिक उपयुक्त होते हैं।
- भारत की जलवायु में गर्मी व सर्दी दोनों का समावेश देखने को मिलता है। इसलिए भी भारत में जनसंख्या वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं।
- भारत का मैदानी क्षेत्र अधिकांशतः नदियों के द्वारा बाहर कर लाई गई मिट्टी से निर्मित हुआ है, इसीलिए भारत में अत्यधिक उपजाऊ मृदा उपस्थित है। इससे खाद्यान्न उत्पादन की समस्या नहीं होती है और जनता के भरण-पोषण की समस्या का समाधान हो जाता है। इससे अंततः जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
- पानी की उपलब्धता भी जनसंख्या वितरण को प्रभावित करती है। जिन स्थानों पर पेयजल की उपलब्धता अधिक होती है, वहाँ पर जनसंख्या घनत्व अधिक होता है, जबकि पानी की कम उपलब्धता वाले रेगिस्तानी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम होता है। जनसंख्या वितरण के वर्तमान स्वरूप तथा प्राचीन सभ्यताओं के विकसित होने वाले स्थानों के विश्लेषण के आधार पर इस बात की पुष्टि की जा सकती है।
- इसके अलावा, ऐसे स्थान जहाँ पर खनिज संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता होती है, वहाँ पर भी जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है। क्योंकि खनिज संपदा की उपलब्धता के चलते मानव जीवन सजह हो जाता है और उन्हें आवश्यक वस्तुएँ जुटाने के लिए अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ती है।
- विभिन्न सामाजिक सुविधाओं की उपलब्धता दी जनसंख्या वितरण को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, ऐसे क्षेत्र जहां पर स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास इत्यादि की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, वहां पर जनसंख्या घनत्व अधिक होता है।
- आर्थिक कारक भी जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है। जिस क्षेत्र में औद्योगिक विकास व अन्य प्रकार की रोजगारपरक गतिविधियां अधिक होती हैं, वहां पर जनसंख्या घनत्व अधिक होता है।
इस प्रकार, हमने भारत की जनसंख्या नीति के विभिन्न पहलुओं को समझा तथा जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों पर सारगर्भित तरीके से चर्चा की। वर्तमान में देश की बढ़ती जनसंख्या के बारे में भी सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। उम्मीद है कि इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार जल्द ही कोई बेहतर कदम उठाएगी।
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