19 जनवरी 2023 : समाचार विश्लेषण

A. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 1 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

B. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

C. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

पर्यावरण:

  1. पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों से सम्बंधित विवाद/टकराव:

D. सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 4 से संबंधित:

आज इससे संबंधित कुछ नहीं है।

E. संपादकीय:

राजव्यवस्था:

  1. स्वतंत्र न्यायपालिका:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

  1. भारत की चीन के विरुद्ध रणनीति:

F. प्रीलिम्स तथ्य:

  1. स्पॉट-बेलिड ईगल उल्लू:

G. महत्वपूर्ण तथ्य:

  1. केंद्रीय पैनल ने अरुणाचल प्रदेश से पनबिजली परियोजना की समीक्षा करने को कहा:
  2. सीखने के अंतराल की खाई चौड़ी हो रही हैं: रिपोर्ट

H. UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

I. UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों से सम्बंधित विवाद/टकराव:

पर्यावरण:

विषय: पर्यावरण संरक्षण।

प्रारंभिक परीक्षा: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ), संरक्षित क्षेत्रों और वन अधिकार अधिनियम (FRA) से सम्बंधित जानकारी।

मुख्य परीक्षा: देश में अपनाए गए पर्यावरण संरक्षण प्रयासों से जुड़े प्रमुख मुद्दे एवं चुनौतियाँ।

प्रसंग:

  • पूरे देश में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ) के निर्माण के कारण केरल और अन्य राज्यों के ऐसे क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

पृष्ठभूमि:

  • इस मुद्दे पर पृष्ठभूमि की विस्तृत जानकारी हेतु 31 दिसंबर 2022 का यूपीएससी परीक्षा विस्तृत समाचार विश्लेषण देखें।

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ):

  • इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा घोषित संरक्षित क्षेत्रों के आसपास का एक संवेदनशील या कमजोर क्षेत्र है।
  • इको-सेंसिटिव जोन (ESZs) को पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्र (Ecologically Fragile Areas (EFAs)) के रूप में भी जाना जाता है।
  • ESZs की भूवैज्ञानिक सीमा संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से 0 किमी से लेकर 45.82 किमी (हिमाचल प्रदेश के पिन वैली नेशनल पार्क में) तक हो सकती है।
  • देश के लगभग 15 राज्यों में 10 किमी से अधिक के ESZ क्षेत्र शामिल हैं।
  • वर्तमान में लगभग 341 ESZs को 29 राज्यों और पांच केंद्र शासित प्रदेशों में अधिसूचित किया गया है, जबकि अन्य 85 ESZs इस अधिसूचना के लागू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
  • ESZ के साथ संरक्षित क्षेत्र भारत के 8.66% भूमि क्षेत्र को कवर करते हैं और उनमें से अधिकांश वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत ग्राम सभाओं के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
  • इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) से सम्बंधित अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक कीजिए: Eco-Sensitive Zone (ESZ)

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZs) का कार्यान्वयन:

  • 2002 की वन्यजीव संरक्षण रणनीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं के 10 किमी के भीतर के क्षेत्रों को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 ( Environment Protection Act 1986) की धारा 3(2)(v) और इसके नियम 5(viii) और (x) के तहत पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिए।
  • MoEFCC को उद्योगों, संचालनों और प्रक्रियाओं को विनियमित और प्रतिबंधित करके पर्यावरण की रक्षा के उपाय करने का काम सौंपा गया था।
  • हालांकि, नियम 5(1)(vi) में संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरण के अनुकूल भूमि उपयोग की अनुमति देने के प्रावधान शामिल थे।
  • इसके अलावा, 2005 में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife (NBWL)) ने उन पर व्यापक प्रतिबंध लगाने के बजाय विशिष्ट गतिविधियों को विनियमित करने के लिए स्थल-विशिष्ट ESZs को परिभाषित करने का निर्णय लिया। इस प्रकार MoEFCC ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ESZ प्रस्तावित करने का निर्देश दिया था।
  • MoEFCC के दिशानिर्देशों के अनुसार,क्षेत्रों को ESZs के रूप में घोषित करने के लिए वन्यजीव वार्डन, एक पारिस्थितिकीविद्, और स्थानीय सरकार के एक अधिकारी की एक समिति द्वारा प्रत्येक ESZ की सीमा निर्धारित करनी होती है।
  • चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन को उन गतिविधियों की सूची तैयार करने का काम सौंपा गया था जिन्हें निषिद्ध या प्रतिबंधित किया जाना है या जिन्हें अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ इसकी अनुमति दी जा सकती है।
  • इसके बाद राज्य सरकार को इस सूची को भौगोलिक विवरण, जैव विविधता मूल्यों, स्थानीय समुदायों के अधिकारों, उनकी आर्थिक क्षमता और उनकी आजीविका के निहितार्थों के साथ अधिसूचना के लिए MoEFCC (Ministry of Environment, Forest, and Climate Change (MoEFCC)) के समक्ष एक प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
  • इसके अलावा राज्य सरकार को इस अधिसूचना के दो साल के भीतर क्षेत्रीय मुख्य योजना का मसौदा तैयार करना अनिवार्य है।

भारत में संरक्षित क्षेत्र:

  • संरक्षित क्षेत्र वे क्षेत्र हैं जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) के तहत अधिसूचित किये जाते हैं।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत वर्णित संरक्षित क्षेत्रों में अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, टाइगर रिजर्व, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व शामिल होते हैं।
  • संरक्षित क्षेत्र भारत के भूमि क्षेत्र का लगभग 5.26% है जिसमें 108 राष्ट्रीय उद्यान और 564 वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं।
  • यहां तक कि “आरक्षित वनों” में जिन गतिविधियों की अनुमति है, वे भी संरक्षित क्षेत्रों में प्रतिबंधित हैं, इस प्रकार संरक्षित क्षेत्रों की घोषणा वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों को कम कर देती है, जब तक कि विशेष रूप से इसकी अनुमति प्रदान नहीं की जाती है।
  • इसके अलावा इस अधिकार-नकारात्मक “किला संरक्षण मॉडल” (“fortress conservation model”) ने पर्यावरण विशेषज्ञों की व्यापक आलोचना को आकर्षित किया है।

वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act (FRA)):

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006,जिसे वन अधिकार अधिनियम (FRA) के रूप में भी जाना जाता है, वन संसाधनों पर निर्भर रहने वाले वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करने के लिए लाया गया था जो समुदायों की आजीविका, आवास और अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के लिए आवश्यक हैं।
  • वन अधिकार अधिनियम व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों सहित वन संसाधनों पर वन में रहने वाले समुदायों के प्रथागत और पारंपरिक अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम की शुरूआत के माध्यम से नीति निर्माताओं ने वन में रहने वाले समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का प्रयास किया है।
  • इसके माध्यम से अब ग्राम सभाओं को एक खुली लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाकर अधिकारों का निर्धारण करने का अधिकार दिया गया है।
  • ग्राम सभाओं को गाँव की सीमाओं के भीतर वनों, वन्य जीवन और जैव विविधता के संरक्षण, सुरक्षा और प्रबंधन के लिए अधिकृत वैधानिक प्राधिकरण बनाया गया है।
  • ग्राम सभाओं के दायरे में आने वाले इन क्षेत्रों को “सामुदायिक वन संसाधन (community forest resource (CFR))” कहा जाता है और ग्राम सभाओं को वन विभाग की “कार्य योजनाओं” के साथ अपनी CFR संरक्षण योजना को एकीकृत करना अनिवार्य किया गया है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 से संबंधित अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक कीजिए:Forest Rights Act (FRA), 2006

मूल मुद्दा:

  • देश के लगभग दस राज्यों में स्थित ESZs के हिस्से जिनमें छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्य शामिल हैं, संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों में आते हैं।
  • ये अनुसूचित क्षेत्र भारत के 11% से अधिक भूमि क्षेत्र में विस्तृत हैं एवं इसमें घने जंगल और पहाड़ शामिल हैं।
  • ऐसे क्षेत्रों में मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति समूह निवास करते हैं एवं ये क्षेत्र अनुच्छेद 244 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किए जाते हैं जहां 1996 के पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (Panchayat (Extension to Scheduled Areas) Act (PESA) of 1996 ) [PESA] के प्रावधान लागू होते हैं।
  • हालांकि, MoEFCC ने पेसा (PESA) और एफआरए (FRA) के अनुपालन के लिए भारतीय वन अधिनियम 1927, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 (जिसके तहत ESZs को अधिसूचित किया गया है) में संशोधन करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है।
  • इसके अलावा, मंत्रालय ने पूर्ववर्ती FRA अनुपालन प्रक्रिया को वापस लाने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ( National Commission for Scheduled Tribes) की मांगों की भी उपेक्षा की है।
  • इसके अतिरिक्त,क्षेत्रीय मुख्य योजना के बारे में जनता को कोई जानकारी नहीं है, जिसे राज्यों को 2012 से इसका मसौदा तैयार करना अनिवार्य किया गया था जब ESZs को पहली बार अधिसूचित किया गया था।
  • FRA से जुड़े विषय से सम्बन्धित अधिक जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक कीजिए:The issues with FRA

हालिया विरोध के कारण:

  • जून 2022 में उच्चतम न्यायालय ने ESZ पर अपने निर्देश दिए जिसमें न्यायालय ने कहा की MoEFCC के दिशा-निर्देशों को मसौदा अधिसूचना में प्रस्तावित क्षेत्र में अंतिम रूप देने की प्रतीक्षा में और अभी तक प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्रों के 10 किलोमीटर के दायरे में लागू किया जाना चाहिए।
  • न्यायालय ने राज्यों को ESZs की न्यूनतम चौड़ाई में परिवर्तन करने की भी अनुमति दी है।
  • न्यायालय ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक [ Principal Chief Conservator of Forests (PCCF)] और संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों के गृह सचिव में सम्बंधित दिशानिर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने की शक्तियां निहित कीं हैं।
  • न्यायालय ने यह भी घोषित किया कि ESZ के भीतर किसी भी उद्देश्य के लिए कोई नया स्थायी ढांचा नहीं बनाया जा सकता है।
  • न्यायालय के इन आदेशों का तात्पर्य था कि दिशा-निर्देशों द्वारा अनुमत सभी गतिविधियां और जो पहले से ही की जा रही हैं, केवल तभी जारी रह सकती हैं जब PCCF अनुमति दें, और वह भी न्यायालय के आदेश के छह महीने के भीतर।
  • इसलिए बहुत से लोगों का जीवन अब PCCF के हाथों में सौंप दिया गया है, जिसका अधिकार जंगल से परे एक ESZs के भीतर आने वाली राजस्व भूमि तक भी फैला हुआ है।
  • इसके अलावा, नई संरचनाओं पर प्रतिबंध में बिजली के खंभे, सार्वजनिक भवनों, सड़कों और पुलों की स्थापना भी शामिल हो सकती है, जो वन भूमि और वनों के किनारे रहने वाले वनवासियों को प्रभावित करेगा।

सारांश:

  • कई वर्षों से वन अधिकारों से वंचित होने के कारण वन भूमि और वनों के सीमांतों पर रहने वाले वनवासी समुदायों को अब बुनियादी सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से भी वंचित कर दिया गया है। इस प्रकार की परिस्थितियों को देखते हुए पर्यावरण के लिए एवं आजीविका की रक्षा के लिए नीति निर्माताओं और न्यायपालिका को मौजूदा कानूनों में सुधार लाने की आवश्यकता है।

संपादकीय-द हिन्दू

संपादकीय:

स्वतंत्र न्यायपालिका:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

राजव्यवस्था:

विषय: भारतीय संविधान में नियंत्रण और संतुलन के प्रावधान।

मुख्य परीक्षा: सरकार द्वारा मनमानी कार्रवाई के विरुद्ध शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का महत्व।

संदर्भ:

  • केंद्रीय कानून मंत्री द्वारा न्यायिक कॉलेजियम में सरकार द्वारा सुझाये गए नामों का प्रस्ताव दिया गया हैं।

भूमिका:

  • केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को “सुझाव” लिखा है कि उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम में केंद्र सरकार के एक नामिती और उच्च न्यायालय के प्रत्येक कॉलेजियम में एक राज्य प्रतिनिधि को उस कॉलेजियम में शामिल किया जाना चाहिए जो न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिफारिशें करता है।
  • पत्र में सुझाव दिया गया हैं क्योंकि प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) “अंतिम रूप से लंबित” है।
  • पत्र में कई अन्य शिकायतें भी उठाई गईं हैं,तथा एक खोज-और-मूल्यांकन समिति के गठन की मांग की गई हैं।
  • पत्र इस तथ्य से मेल खाता है कि उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की सिफारिशें सरकार के पास लंबित हैं।
  • हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष ने भी कॉलेजियम प्रणाली (collegium system) के विरोध में बयान दिया था।

पृष्ठभूमि:

  • MoP सरकार और न्यायपालिका द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली को संचालित करने वाली आधिकारिक मार्गदर्शिका है।
  • चूंकि कॉलेजियम प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की एक श्रृंखला के माध्यम से विकसित हुई है, और कानून पर आधारित नहीं है, MoP नियुक्तियों की प्रक्रिया का आधार है।
  • 2015 में उच्चतम न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) में लाए गए संवैधानिक संशोधन को रद्द करने के बाद MoP पर फिर से बातचीत करने की मांग की गई थी।
  • उच्चतम न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि वह उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम के साथ परामर्श करके, योग्यता मानदंड, पारदर्शिता, एक नए सचिवालय की स्थापना तथा प्रस्तावित उम्मीदवारों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए एक तंत्र को ध्यान में रखते हुए मौजूदा MoP को अंतिम रूप दे।
  • MoP को उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के परामर्श से सरकार द्वारा अंतिम रूप दिया जा रहा है।
  • उच्चतम न्यायालय ने MoP में निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं करने और न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायिक फैसलों का पालन नहीं करने के लिए सरकार के विरुद्ध अवमानना का मामला शुरू किया है।

मूल संरचना सिद्धांत के विरुद्ध:

  • जयपुर में 83वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में भारत के उपराष्ट्रपति (Vice-President of India) जगदीप धनखड़ ने विधायिका की तुलना में न्यायपालिका की शक्तियों का मुद्दा उठाया।
  • उन्होंने कहा कि वह इस विचार का समर्थन नहीं करते हैं कि न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित संशोधनों को इस आधार पर रद्द कर सकती है कि वे “संविधान के मूल संरचना सिद्धांत” (Basic Structure doctrine of the Constitution) का उल्लंघन करते हैं, जिसे केशवानंद भारती मामले (1973) (Kesavananda Bharati case (1973)) में अपने फैसले के माध्यम से उच्चतम न्यायालय ( Supreme Court ) द्वारा विकसित किया गया था।
  • उन्होंने आगे कहा कि कार्यपालिका या न्यायपालिका द्वारा संसदीय संप्रभुता को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • कॉलेजियम प्रणाली के सुधारों पर चल रही बहस के केंद्र में मूल संरचना निहित है, यह देखते हुए कि उच्चतम न्यायालय ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को समाप्त करने के लिए इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया था।
  • उच्चतम न्यायालय ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि केशवानंद भारती के फैसले ने स्पष्ट किया था कि न्यायिक समीक्षा संसदीय संप्रभुता को कमजोर करने का एक साधन नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि संवैधानिक पदाधिकारी अपनी सीमा का उल्लंघन ना करें, यह नियंत्रण एवं संतुलन की प्रणाली का केवल एक हिस्सा था।
  • न्यायालय ने यह भी माना कि उपराष्ट्रपति द्वारा की गई टिप्पणी “देश में प्रवर्तनीय कानूनों” के विरुद्ध है।
  • मिनर्वा मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1980) में उच्चतम न्यायालय के अनुसार, “संसद भी संविधान की एक निकाय है”। इसलिए, इसके पास केवल ऐसी शक्तियाँ हो सकती हैं जो स्पष्ट रूप से इसमें निहित हों। यदि उसकी शक्तियों पर कोई सीमाएं नहीं होंगी, तो संसद अब संविधान द्वारा बाध्य नहीं होगी तथा इसके बजाय “इस पर सर्वोच्च हो जाएगी, क्योंकि उसके पास मूलभूत ढांचे सहित पूरे संविधान में संशोधन करने का अधिकार होगा।”

चित्र स्रोत: The Hindu

स्वतंत्र न्यायपालिका:

  • न्यायपालिका के विरुद्ध आधिकारिक निंदा की श्रृंखला में यह नवीनतम पत्र है।
  • सरकार बार-बार कॉलेजियम प्रणाली की कुछ अभिस्वीकृत कमियों को सही ढंग से उजागर करके प्रश्न उठा रही है।
  • नियुक्तियों की प्रक्रिया में सुधार के नाम पर न्यायपालिका के विरुद्ध अभियान चलाने की सरकार की मंशा पर विभिन्न विशेषज्ञ तथा राजनीतिक विपक्ष प्रश्न उठा रहे हैं।
  • एक तटस्थ तंत्र बनाने के लिए नए विधायी प्रयास करके जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करता है, सरकार अधिक खुली तथा निष्पक्ष प्रक्रिया की आवश्यकता को पूरा कर सकती है।
  • कॉलेजियम के माध्यम से नियुक्तियों की वर्तमान प्रणाली देश की वैधानिक प्रक्रिया के रूप में तब तक बनी रहेगी जब तक कि इस तरह के संवैधानिक संशोधन का प्रयास सफल नहीं हो जाता है।
  • नियंत्रण एवं संतुलन की एक प्रणाली जो किसी एक शाखा को प्रभुत्वशाली होने से रोकती है, लोकतांत्रिक कामकाज के लिए आवश्यक है।

सारांश:

  • केंद्रीय कानून मंत्री द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को हालिया “सुझाव” न्यायाधीशों की नियुक्ति के मुद्दे पर सरकार और न्यायपालिका के बीच चल रही खींचतान तथा ‘मूल संरचना सिद्धांत’ पर उपराष्ट्रपति द्वारा व्यक्त किए गए संदेह की पृष्ठभूमि में आया है। अतः शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत ( doctrine of separation of powers) के इस मुद्दे पर एक बार फिर से बहस शुरू हो गई है।

भारत की चीन के विरुद्ध रणनीति:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 2 से संबंधित:

अंतर्राष्ट्रीय संबंध:

विषय: भारत और उसका पड़ोस – संबंध।

मुख्य परीक्षा:चीन भारत के लिए एक बड़े रणनीतिक खतरे के रूप में।

संदर्भ:

  • इस लेख में चीन द्वारा उत्पन्न खतरों के प्रति भारत के असंतुलित व्यवहार पर चर्चा की गई है।

भूमिका:

  • 1962 के युद्ध के बाद भारत-चीन संबंध अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। मई 2020 से चीन-भारतीय सीमा पर कई स्थानों पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और भारतीय सैनिक आपस में भिड़ गए हैं।
  • PRC ने भारतीय सीमा के विवादित क्षेत्र पर कब्जा कर इस संकट को भड़काया हैं।
  • चीन के प्रति भारत के ‘खतरे को पहचानने में विफल रहने वाला व्यवहार’ (Underbalancing) भारतीय सामरिक समुदाय के सामने एक पहेली रहा है।
  • कुछ विशेषज्ञ चीन के संबंध में भारत के खतरे को पहचानने में विफल रहने वाले व्यवहार को अलग-अलग तरीकों से चित्रित करते हैं, जिसमें अन्य को जिम्मेदारी का हस्तांतरण (यह अपेक्षा कि कोई और इससे निपटेगा), खतरे के स्रोत का तुष्टीकरण, खतरे से पूरी तरह से छिपना, या इन सभी का संयोजन शामिल हैं।
  • असंतुलन तब पैदा होता हैं जब देश खतरनाक खतरों को पहचानने में विफल होते हैं, उन पर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, या मामूली और अविवेकपूर्ण तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं।

खतरे पर भारत की प्रतिक्रिया:

  • चीन दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत की सुरक्षा के साथ-साथ विश्व राजनीति में इसके व्यापक आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों के लिए खतरा है।
  • भारत ने चीन को रोकने के लिए बाहरी प्रयास किए हैं; (i) संवर्धित सैन्य प्रतिरोध; (ii) चीनी अर्थव्यवस्था पर निर्भरता कम करना; और (iii) रणनीतिक प्रभाव के लिए चीन की आर्थिक शक्ति का लाभ उठाने के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए रणनीतिक भागीदारों के साथ सामूहिक लामबंदी।
  • भारतीय सेना ने लड़ाकू सैनिकों, क्रूज मिसाइलों और उन्नत लड़ाकू विमानों को तैनात करके अपनी सीमा को सुदृढ़ किया है। हालाँकि, चीन ने भारत की तुलना में अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने के लिए दबाव डालते हुए, बहुत कुछ ऐसा ही किया है।
  • साथ ही भारत ने चीनी अर्थव्यवस्था पर अपनी निर्भरता कम करने की भी कोशिश की है। भारत ने चीनी निवेश में तेजी से कटौती की जब लद्दाख में 2020 का सीमा टकराव हुआ, जिससे टिकटॉक, वीचैट तथा यूसी ब्राउज़र जैसी प्रमुख चीनी कंपनियों को बाहर कर दिया गया।

भारत का असंतुलित व्यवहार:

  • हाल की कार्रवाइयों के बावजूद, भारत में चीन का मुकाबला करने के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता का अभाव है जिसे चीन के खतरे के गहन विश्लेषण या संभावित भारतीय उपायों की समीक्षा के अभाव में देखा जा सकता है।
  • भारतीय रणनीति इस विचार पर आधारित है कि चीन को संतुलित करना खतरनाक है। भारत न तो चीन के साथ पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सक्रिय रूप से काम कर सकता है और न ही वह ऐसा करना चाहता है।
  • चीन को जवाब देकर संघर्ष को बढ़ावा देने से बचना भारत के हित में है क्योंकि ऐसा करने से वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ अन्य संघर्ष क्षेत्रों का विकास हो सकता है।
  • एक सुदृढ़ देश के साथ सैन्य संघर्ष की अप्रत्याशितता भी भारत के असंतुलित व्यवहार में योगदान करती है।

वर्तमान रणनीति में उल्लेखनीय जोखिम:

  • सक्रिय भारतीय प्रतिक्रियाओं की अनुपस्थिति चीन को अपनी क्षेत्रीय गतिविधियों की गति बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती है।
  • और तो और, चीन को कमतर आंकने में चीन के खतरे के बारे में राजनीतिक स्पष्टता की कमी और उस खतरे का सामना करने के लिए रेडलाइन की स्पष्ट अभिव्यक्ति भी शामिल है। फलस्वरूप, यह इस बारे में अनिश्चितता की ओर ले जाता है कि चीन के साथ गतिरोध होने पर भारत के मित्र और भागीदार भारत के लिए क्या कर सकते हैं या क्या करेंगे।
  • चीन के खतरे का सामना करने के लिए राजनीतिक स्पष्टता तथा रेडलाइन की स्पष्ट अभिव्यक्ति का अभाव चीन के साथ संकट की स्थिति में भारत की रणनीति की अनिश्चितता पर प्रश्न खड़ा करता है।
  • पाकिस्तान के साथ चीन का गठबंधन तथा अन्य दक्षिण एशियाई देशों के साथ गहराते संबंध इस क्षेत्र में जिस पर भारत का दशकों से प्रभुत्व रहा है,भारत की स्थिति के लिए एक उल्लेखनीय चुनौती का निरूपण करते हैं।
  • भारत के विरुद्ध वित्तीय सहायता और संतुलन प्रदान करने की चीन की क्षमता भारत को अपने ही पड़ोस में कमजोर करते हुए भारत के छोटे पड़ोसियों को एक शक्ति के विरुद्ध दूसरी शक्ति का प्रयोग करने के लिए लुभा सकती है।

भारत के विकल्प:

  • भारत जैसे को तैसा रणनीति के तहत सावधानीपूर्वक आकलित आक्रामकता की रणनीति अपना सकता है तथा चीनी पक्ष के मानव रहित क्षेत्रों पर कब्जा करने पर विचार कर सकता है। लेकिन भारत को चीन की ओर से इसी तरह की कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • भारतीय निर्णय निर्माताओं को इस अपेक्षा में महत्वपूर्ण लघु और मध्यम अवधि के रणनीतिक निर्णयों को स्थगित करने के प्रलोभन का भी विरोध करना चाहिए कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास चीन की चुनौती को दूर करने के लिए पर्याप्त होगा।
  • चुनिंदा क्षेत्रों में उच्च तकनीक वाले चीनी आयात को कम करके भारत चीन की आर्थिक लागत को और बढ़ा सकता है।
  • भारत को परमाणु आधुनिकीकरण तथा कम क्षमता वाले हथियार विकसित करने पर भी पर भी विचार करना चाहिए जिससे चीन को एक संदेश जाएगा।
  • भारत को अमेरिका और पश्चिम के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • यह इस बारे में अधिक स्पष्टता प्रदान करेगा कि चीन के साथ तनावपूर्ण स्थिति की स्थिति में भारत की प्रमुख रणनीतिक साझेदारी और रक्षा समझौते कैसे उसकी सहायता करेंगे।
  • भारत को देश के अंदर चीन को लेकर चल रही बहस , इसके कई आंतरिक अंतर्विरोधों तथा सजग कमजोरियों को ध्यान में रखने तथा अपने हित में इसका लाभ उठाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

सारांश:

  • चीन का उदय तथा उसके खतरे भारत की त्रुटि की संभावना को उल्लेखनीय रूप से कम कर रहे हैं, और भारतीय नीति निर्माताओं को इस बदली हुई वास्तविकता को पहचानने की आवश्यकता है। भारत को चीन के प्रति अपने असंतुलित व्यवहार को ठीक करना चाहिए और चीन के साथ किसी भी तनावपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए अपनी प्रमुख रणनीतिक नीतियों पर स्पष्टता की तलाश करनी चाहिए।

इस संबंध में अधिक पढ़ने के लिए India-China Relations

प्रीलिम्स तथ्य:

1. स्पॉट-बेलिड ईगल उल्लू:

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र 3 से संबंधित:

विषय: पर्यावरण संरक्षण।

प्रारंभिक परीक्षा: स्पॉट-बेलीड ईगल आउल से सम्बंधित जानकारी।

प्रसंग:

  • एक स्पॉट-बेलिड ईगल उल्लू (Bubo Nipalensis) को शेषचलम वन में पहली बार और आंध्र प्रदेश में तीसरी बार देखा गया है।

स्पॉट-बेलिड ईगल उल्लू (Spot-Bellied Eagle Owl):

चित्र स्रोत:www.traffic.org

  • स्पॉट-बेलिड ईगल आउल (बुबो निपलेंसिस) को घने नम तराई एवं पर्वतीय वनों में देखा जाता है।
  • स्पॉट-बेलीड ईगल उल्लू बड़े और अति शक्तिशाली हिंसक पक्षी प्रजातियां हैं।
  • ये प्रजातियाँ भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम में पाई जाती हैं।
  • भारत में इस प्रजाति के पक्षियों को तमिलनाडु, केरल, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में विस्तृत तौर पर देखा जाता है।
  • स्पॉट-बेलिड ईगल उल्लू मुख्य रूप से निशाचर प्राणी होते हैं, लेकिन ये कभी-कभी दिन में भी शिकार करते हैं। इसके अलावा वे बड़े शिकार जैसे छोटे हिरण, सुनहरे गीदड़, खरगोश, सिवेट और शेवरोटेन का शिकार करने के लिए भी जाने जाते हैं।
  • यह पक्षी मनुष्यों के समान एक अजीब सी चीख निकालता है जिसके कारण इसे भारत में “जंगल का भूत” और श्रीलंका में “शैतान पक्षी” कहा जाता है।
  • IUCN लाल सूची स्थिति: संकटमुक्त (Least Concern या LC)
  • WPA, 1972: अनुसूची IV सुरक्षा
  • CITES: परिशिष्ट II सुरक्षा

महत्वपूर्ण तथ्य:

1.केंद्रीय पैनल ने अरुणाचल प्रदेश से पनबिजली परियोजना की समीक्षा करने को कहा:

  • केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) ने इस परियोजना का स्थानीय लोगों द्वारा व्यापक विरोध पर विचार करने के बाद अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकार से एटालिन जलविद्युत परियोजना (Etalin hydropower project) के लिए दिबांग घाटी में वन भूमि को बदलने की अनुमति के लिए एक संशोधित अनुरोध प्रस्तुत करने को कहा है।
  • एटालिन जलविद्युत परियोजना अरुणाचल प्रदेश लिमिटेड के जिंदल पावर और हाइड्रो पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के बीच एक संयुक्त उद्यम है।
  • अरुणाचल प्रदेश हाल के वर्षों में विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बना रहा है, लेकिन ऐसी कई परियोजनाओं पर कार्य लागत में वृद्धि और स्थानीय विरोध के कारण देरी के कारण प्रभावित हुआ है।
  • अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में ऐसी कुछ रुकी हुई परियोजनाओं के निष्पादन का जिम्मा केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को सौंप दिया है।

2.सीखने के अंतराल की खाई चौड़ी हो रही है: रिपोर्ट

चित्र स्रोत: The Hindu

  • गैर सरकारी संगठन प्रथम द्वारा जारी शिक्षा रिपोर्ट की वार्षिक स्थिति ( Annual Status of Education Report (ASER)) 2022 ने संकेत दिया है कि कोविड-19 महामारी के कारण बंद होने के बाद स्कूल फिर से खुल गए हैं और कई वर्षों के सुधार के बाद भी छात्र नामांकन में वृद्धि होने के बावजूद पढ़ने और अंकगणित में मूलभूत कौशल सीखने की खाई चौड़ी हो गई है।
  • असर (ASER) 616 ग्रामीण जिलों में 3 से 16 वर्ष की आयु के लगभग 6.9 लाख बच्चों को कवर करने वाला एक घरेलू सर्वेक्षण है, ताकि उनकी स्कूली शिक्षा की स्थिति दर्ज की जा सके और उनके बुनियादी स्तर की पढाई और अंकगणितीय कौशल का आकलन किया जा सके।
  • सर्वेक्षण ने संकेत दिया है कि महामारी के कारण स्कूल बंद होने के बावजूद कुल नामांकन संख्या 2018 में 97.2% से बढ़कर 2022 में 98.4% हो गई है।
  • इसके अलावा, सरकारी स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या 2018 में 65.6% से बढ़कर 2022 में 72.9% हो गई है।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार इस महामारी ने परिवारों को पैसे बचाने के लिए अपने बच्चों का निजी स्कूलों से प्रवेश वापस लेने के लिए मजबूर किया है।
  • हालांकि, बच्चों की बुनियादी साक्षरता का स्तर गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है और उनकी पढ़ने की क्षमता और संख्यात्मक कौशल खराब हो गए हैं।
  • इस रिपोर्ट ने आगे महामारी के बारे में आशंकाओं पर स्पष्टता प्रदान की है, जिससे परिवार लड़कियों को स्कूलों से वापस लेने और उन्हें कम उम्र में विवाह करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार 11-14 वर्ष के आयु वर्ग की स्कूल से बाहर रहने वाली लड़कियों का प्रतिशत 4.1 से घटकर 2% हो गया है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1. कौन से कथन सही हैं? (स्तर-सरल)

  1. शिक्षा रिपोर्ट की वार्षिक स्थिति मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रकाशित की जाती है।
  2. 17 वीं ASER रिपोर्ट के अनुसार, 6-14 वर्ष की आयु में नामांकन रिकॉर्ड उच्च स्तर पर है।

विकल्प:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर. b

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: शिक्षा रिपोर्ट की वार्षिक स्थिति (ASER) 2005 से प्रथम नाम के एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) द्वारा प्रकाशित की जाती है।
  • कथन 2 सही है: ASER 2022 के अनुसार, महामारी के कारण स्कूल बंद होने के बावजूद, छह से 14 आयु वर्ग के लिए समग्र नामांकन के आंकड़े जो पिछले 15 वर्षों से 95% से ऊपर हैं, 2018 में 97.2% से बढ़कर 2022 में 98.4% हो गए हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं? (स्तर-मध्यम)

  1. पेरिस अभिसमय के तहत पहला ग्लोबल स्टॉकटेक UNFCCC के पक्षकारों के 28वें सत्र के दौरान किया जाएगा।
  2. UNFCCC के पक्षकारों का 28वां सत्र मिस्र में आयोजित किया जाएगा।

विकल्प:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर. a

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है: पहला ग्लोबल स्टॉकटेक जो ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP 26) में चल रहा है और यह वर्ष 2023 में COP 28 में समाप्त होगा।
  • कथन 2 गलत है: UNFCCC की CoP 28 संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में आयोजित की जाएगी।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कितने सही सुमेलित हैं: (स्तर-सरल)

(बल: अंतर्राष्ट्रीय सीमा कवर)

  1. बीएसएफ: पाकिस्तान
  2. आईटीबीपी: चीन
  3. असम राइफल्स: बांग्लादेश
  4. एसएसबी: भूटान

विकल्प:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) केवल 3

(d) सभी 4

उत्तर. c

व्याख्या:

  • युग्म 1 सही है: बीएसएफ भारत-पाकिस्तान के साथ-साथ भारत-बांग्लादेश सीमाओं की भी रक्षा करता है।
  • युग्म 2 सही है: ITBP भारत-चीन सीमा की रक्षा करती है।
  • युग्म 3 गलत है: असम राइफल्स भारत-म्यांमार सीमा की रक्षा करती है।
  • युग्म 4 सही है: SSB भारत-भूटान के साथ-साथ भारत-नेपाल सीमाओं की सुरक्षा करता है।

प्रश्न 4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिएः (स्तर-सरल)

  1. राज्य चुनाव आयोग राज्य विधानसभा चुनावों की तिथियों की घोषणा करते हैं।
  2. चुनाव की तिथि घोषित होने के दिन से आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से गलत है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर. a

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: भारत का चुनाव आयोग राज्य विधानसभा चुनावों की तिथियों की घोषणा करता है।
  • कथन 2 सही है: आदर्श आचार संहिता (MCC) चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की तारीख की घोषणा की तारीख से लागू होती है और चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने तक लागू रहती है।

प्रश्न 5. विजयनगर के शासक कृष्णदेव की कराधान व्यवस्था से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिएः (PYQ 2016) (स्तर – कठिन)

1.भूमि की गुणवता के आधार पर भू-राजस्व की दर नियत होती थी।

2. कारखानों के निजी स्वामी एक औद्योगिक कर देते थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर. c

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है: विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने एक दमनकारी कराधान नीति का पालन किया और कृष्णदेव की कराधान प्रणाली में भूमि की गुणवत्ता के आधार पर भूमि पर कर की दर तय की गई थी।
  • कथन 2 सही है: कारखानों के निजी स्वामी एक औद्योगिक कर देते थे।

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न 1. शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र का आधार है। हाल के दिनों में भारतीय संविधान की इस मूल विशेषता में लगातार क्षरण देखा है। व्याख्या कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक) (जीएस II – राजव्यवस्था)

प्रश्न 2. ‘मूल संरचना सिद्धांत’ से आप क्या समझते हैं? संवैधानिक और कानूनी न्यायशास्त्र में इसकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक) (जीएस II – राजव्यवस्था)