राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति को भारत में बाढ़ प्रबंधन के प्रभावी उपाय के रूप में मान्यता दी गई है। जल शक्ति राज्य मंत्री ने हाल ही में राज्यसभा में राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति के बारे में उल्लेख किया था।
इस लेख में हम आपको आईएएस परीक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति के बारे में और विस्तार से बताएंगे।
राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति, यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा 2023 से लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण विषय है। इस विषय से संबंधित प्रश्न भूगोल या पर्यावरण विषय में पूछे जाने की बहुत अधिक संभावना है। साथ ही यह विषय यूपीएससी करंट अफेयर्स सेक्शन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
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राष्ट्रीय बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण नीति – पृष्ठभूमि
नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा बाढ़ की प्रतिक्रिया पर एक रिपोर्ट तैयार की गई और केरल विधानसभा में प्रस्तुत की गई थी। यह रिपोर्ट 2018 की विनाशकारी केरल की बाढ़ पर आधारित थी। जल शक्ति मंत्रालय ने लगातार राज्यों को फ्लड प्लेन जोनिंग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 45 वर्ष बाद केंद्र सरकार द्वारा सभी राज्यों को बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण कानून के लिए एक मॉडल मसौदा विधेयक प्रसारित किया है। हालांकि राज्यों ने अभी तक बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण कानून नहीं बनाया है।
यह विधेयक बाढ़ की बारंबारता के अनुसार एक नदी के बाढ़ के मैदान के क्षेत्रीकरण की परिकल्पना करता है और बाढ़ के मैदान के उपयोग के प्रकार को परिभाषित करता है।
बाढ़ के मैदानों का परिसीमन और सीमांकन अभी किया जाना है। इसे लेकर मणिपुर, राजस्थान, उत्तराखंड और पूर्ववर्ती राज्य जम्मू और कश्मीर जैसे राज्यों ने कानून बनाया था।
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राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति क्या है?
फ्लड प्लेन जोनिंग को बाढ़ प्रबंधन के लिए एक प्रभावी गैर-संरचनात्मक उपाय के रूप में मान्यता दी गई है।
साल 2008 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority) ने बाढ़ को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण “गैर-संरचनात्मक उपाय” के रूप में फ्लडप्लेन ज़ोनिंग के लिए राज्यों के लिए दिशानिर्देश जारी किए।
इसमें सुझाव दिया गया है कि बाढ़ से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में ठोस संरचनाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और 10 वर्षों की आवृत्ति में पार्कों, उद्यानों आदि जैसे हरित क्षेत्रों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए।
राष्टीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने बाढ़ के मैदान में अन्य क्षेत्रों के बारे में भी बात की जहां 25 साल की आवृत्ति में बाढ़ आ सकती है और राज्यों से उन क्षेत्रों के अनुसार योजना बनाने को कहा गया है।
फ्लड प्लेन जोनिंग की मूल अवधारणा बाढ़ से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए बाढ़ के मैदानों में भूमि उपयोग को विनियमित (regulate) करना है।
बाढ़ के निम्न कारण हो सकते हैं –
आमतौर पर भारी बारिश के समय जब प्राकृतिक जल संग्रहण स्रोतों/मार्गों पर जब क्षमता से अधित जल बहने लगता है तो ये आसपास से निचले हिस्सों में बहने लगता है और बाढ़ का कारण बन जाता है। लेकिन बाढ़ हमेशा बारिश के कारण ही नहीं आती है, इसके प्राकृतिक के साथ-साथ कुछ मानव निर्मित कराण भी है। नीचे हम बाढ़ के कुछ सामान्य कारणों के बारे में बता रहे हैं – बाढ़ के प्राकृतिक कारण बारिश के कारण आने वाली बाढ़ – बारिश के समय तीन-चार महीनों तक नदियों में जल प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे कई क्षैत्रों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक यदि एक दिन में 15 सेमी से अधिक बारिश होती है, तो इससें नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है और बाढ़ आने का खतरना बढ़ जाता है। बादल फटने से आने वाली बाढ़ – पहाड़ी क्षैत्रों या नदियों के आस-पास बादलों के फटने से भी बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। पहाडी इलाकों में अचनाक बादल फटने से नदियों में जल प्रवाह तेज हो जाता है, जिससे मैदानी इलाकों में बाढ़ आ सकती है। गाद संचय से आने वाली बाढ़ – पहाडी क्षैत्रों खासकर हिमालय से निकलने वाली नदियों में बारिश के समय पानी के साथ-साथ बड़ी मात्रा में गाद और रेत बहकर मैदानी इलाकों में जमा हो जाती है। जब कई सालो तक इस गाद और रेती की सफाई नहीं होती है तो इससे नदियों का जलमार्ग अवरुद्ध हो जाता है जिससे नदी का पानी मैदानी इलाकों में जाने लगता है और इससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। बाढ़ के मानव निर्मित कारण मानव निर्मित अवरोध से आने वाली बाढ़ – नदियों के बहाव पर मानव निर्मित अवरोध के कारण भी भयंकर बाढ़ आ सकती है। नदियों पर बांध, नहरें और रेलवे से संबंधित निर्माण से उसका जलमार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। उत्तराखंड में साल 2013 में आई भयंकर बाढ़ मानव निर्मित कारणों से आने वाली बाढ़ का सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां पहाड़ों में नदि के जल प्रवाह मार्गों पर बांध बनाने से बारिश में नदि के जलमार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। वनों की कटाई से आने वाली बाढ़ – पहाड़ों और तटीय क्षैत्रों में पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही पेड बारिश के पानी को मैदाने इलाकों में जाने से रोकने के लिए भी प्राकृतिक अवरोध का काम करते हैं। लेकिन जब मानव द्वारा पेड़ों की कटाई कर दी जाती है तो ये अवरोध खत्म हो जाता है और बारिश के समय नदि का जल मैदानी इलाकों में बहने लगता है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। |
राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति की विशेषताएं
यह नीति संरक्षित और असुरक्षित दोनों क्षेत्रों के विकास पर सीमाएं निर्धारित करती है।
यह बिल फ्लड ज़ोनिंग अथॉरिटीज, सर्वे और फ्लड प्लेन एरिया के डिलाइनेशन, फ्लड प्लेन्स की सीमाओं की अधिसूचना, फ्लड प्लेन्स के उपयोग पर रोक, मुआवजे और पानी के मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं को हटाने के बारे में खंड प्रदान करता है।
बाढ़ संभावित क्षेत्रों में मानव बस्ती के कम होने से वहां जान-माल का नुकसान कम होगा; इसलिए, इनस नीति के तहत निचले क्षेत्रों में आवासों की जगह पार्कों और खेल के मैदान बनाए जाने पर जोर दिया जा रहा है
स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन (National Mission for Clean Ganga) भी राष्ट्रीय बाढ़ के मैदानों की ज़ोनिंग नीति के अनुरूप है। इस नीति के तहत गंगा बेसिन में सभी राज्यों को समय-समय पर सीमांकन और नदी के बाढ़ के मैदानों की अधिसूचना तथा गंगा नदी के नदी तल / बाढ़ के मैदान से अतिक्रमण हटाने की सलाह दी जाती है।
बाढ़ प्रबंधन नीति के तहत, गंगा नदी (कायाकल्प, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 के अनुपालन में इसकी सहायक नदियों को भी सम्मिलित किया गया है।
बाढ़ के दुष्परिणाम –
बाढ़ के दुषित जल से कई क्षेत्रों में हैजा, आंत्रशोथ (Enteritis), हेपेटाईटिस एवं अन्य बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है। वर्तमान में COVID-19 महामारी के दौर में बाढ़ से होने वारी बीमारियां बड़ा खतरना पैदा कर सकती है। बिहार, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पूर्वी उत्तर प्रदेश (मैदानी क्षेत्र), ओडिशा और गुजरात के तटीय क्षेत्रों तथा पंजाब, राजस्थान, उत्तर गुजरात एवं हरियाणा में बार-बार बाढ़ आने से वहां की कृषि व्यवस्था पर विपरित असर पड़ता है। इन क्षैत्रों में मानव बस्तियों के बाढ़ में डूबने से बडे पैमाने पर सामाजिक एवं आर्थिक नुकसान होता है। |
राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति का उद्देश्य
राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति का उद्देश्य विकासात्मक गतिविधियों का निर्धारण करना है अर्थात विकासात्मक गतिविधियों के लिए स्थानों और क्षेत्रों की सीमा इस तरह से निर्धारित की जाएगी कि बाढ़ से समय वहां कम से कम नुकसान हो। भारत में बाढ़ के उच्च जोखिम और दुर्बलता को इस तथ्य से उजागर किया जा सकता है कि यहां 3290 लाख हेक्टेयर के भौगोलिक क्षेत्र में से करीब 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ की चपेट में है।
भारत में हर साल औसतन 75 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ जैसी आपदाओं से प्रभावित होती है, जिससे करीब 1600 लोगों की जान चली जाती है और फसलों, घरों और सार्वजनिक उपयोगिताओं को बाढ़ से करीब 1805 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है।
हालांकि, फ्लड प्लेन जोनिंग (Floodplain Zoning) मौजूदा स्थितियों के लिए कारगर उपाय नहीं हो सकता है, लेकिन यह निश्चित रूप से आने वाले समय में बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करेगा। फ्लड प्लेन जोनिंग न केवल नदियों में आने वाली बाढ़ के मामले में आवश्यक है बल्कि यह विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में जल निकासी के जाम से होने वाले नुकसान को कम करने में भी बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
बाढ़ नीति के संबंध में संवैधानिक प्रावधान
बाढ़ के मैदानी क्षेत्रों के सीमांकन और उनकी गतिविधियों को विनियमित करने की कार्रवाई संबंधित राज्य सरकारों द्वारा की जानी है, क्योंकि नदी के किनारे की भूमि राज्य सरकार के अधिकार क्षैत्र में आती है। और भूमि सूची II की प्रविष्टि 18 के तहत यह राज्य का विषय है।
सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 17 के रूप में जल निकासी और तटबंधों को शामिल करने के आधार पर, “अंतर-राज्यीय नदियों और नदी के विनियमन और विकास” के मामले को छोड़कर, बाढ़ नियंत्रण आदि काम राज्य सरकार के दायरे में आते है। जिसका उल्लेख सूची-I (संघ सूची) की प्रविष्टि 56 में किया गया है।
बाढ़ नीति कार्यान्वयन का विरोध
राज्य सरकारें, बाढ़ प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं को लेकर आपत्ति व्यक्त कर रही हैं, जिसमें यह संभावित कानून शामिल हैं। इसका मुख्य कारण संबंधित राज्य में जनसंख्या का दबाव और वैकल्पिक आजीविका की चाह बताया जा रहा हैं।
पिछले कुछ दशकों में बाढ़ के मैदानों में अतिक्रमणों में पर्याप्त विस्तार हुआ है। इन अतिक्रमणों को कभी-कभी नगर नियोजन प्राधिकरणों द्वारा विधिवत अनुमोदित और अधिकृत भी कर दिया जाता है। इन अतिक्रमणों का कारण बाढ़ नियमों के अधिनियमन के प्रति राज्यों का अनुत्तरदायी होना है।
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राष्ट्रीय बाढ़ क्षेत्र क्षेत्रीकरण नीति के साथ आगे का रास्ता
पिछले कुछ दशकों में ये देखने में आया है कि हर साल बाढ़ से बड़े पैमाने पर जनजीवन और संपत्ति का नुकसान होता है, इसलिए यह समय है कि बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें एक दीर्घकालिक योजना तैयार करने पर काम करें ताकि इस नुकसान से बचा जा सके। यह उपाय तटबंधों के निर्माण और ड्रेजिंग जैसे छोटे-छोटे उपायों से परे होने चाहिए, जो बाढ़ से समय-समय पर होने वाले नुकसान से बचा सके।
इसके लिए एक एकीकृत बेसिन प्रबंधन योजना बनाने की आवश्यकता है जो सभी नदी-बेसिन
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