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Question

With reference to adultery, consider the following statements.

1. Adultery can be a civil wrong and a ground for divorce.

2. Section 497 of IPC is violative of right to equality and right to equal opportunity to women.

Which of the above statement(s) is/are correct?

व्यभिचार के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

1. व्यभिचार एक नागरिक गलत और तलाक के लिए एक आधार हो सकता है।

2. IPC की धारा 497 समानता के अधिकार और महिलाओं को समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है।

उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से कथन सत्य है/हैं?


  1. Only 2

    केवल 2

  2. Both 1 and 2

    1 और 2 दोनों

  3. None of the above

    इनमे से कोई भी नहीं

  4. Only 1

    केवल 1


Solution

The correct option is B

Both 1 and 2

1 और 2 दोनों


The Supreme Court has removed provisions on adultery in IPC and CrPC, and subsequently decriminalised adultery.

  • The top court said that Adultery can be a civil wrong and a ground for divorce but it cannot be a criminal offence.
  • The court said Section 497 is violative of right to equality and right to equal opportunity to women and disallows them from making their own choices.
  • The court pronounced four sets of concurring Judgements to declare as unconstitutional the penal provision on adultery and Section 198 of the Code of Criminal Procedure (CrPC) that deals with prosecution of offences against marriage.
  • Section 497 is a clear violation of fundamental rights granted in the Constitution and there is no justification for the continuation of the provision.

सुप्रीम कोर्ट ने IPC और CRPC से व्यभिचार के प्रावधान और बाद में व्याभिचार को विअपराधिकृत कर दिया है।

  • शीर्ष अदालत ने कहा कि व्यभिचार नागरिक के तौर पर गलत और तलाक के लिए आधार हो सकता है लेकिन यह एक फौजदारी अपराध नहीं हो सकता है।
  • अदालत ने कहा कि धारा 497 समानता के अधिकार और महिलाओं को समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है और उन्हें अपनी पसंद बनाने से रोकती है।
  • अदालत ने विवाह के खिलाफ अपराधों के अभियोजन से निपटने वाली दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 198 और व्यभिचार पर दंडात्मक प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने के लिए निर्णायक फैसलों के चार सेटों का वर्णन किया।
  • धारा 497 संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और प्रावधान को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है

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