बायोस्फीयर रिजर्व, स्थल और तटीय पारिस्थितिकी के वे क्षेत्र हैं, जिनको यूनेस्को के मानव एवं जीवमण्डल कार्यक्रम (MAB) के तहत अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दी गई है । बायोस्फीयर रिजर्व की विशेषता यह है कि इनमें संरक्षण न केवल संरक्षित क्षेत्र के वनस्पतियों और जीवों के लिए उपलब्ध कराया जाता है, बल्कि इन क्षेत्रों में रहने वाले मानव समुदायों को भी संरक्षण प्रदान किया जाता है । इन जीव मंडलों को यूनेस्को की मान्यता प्राप्त करने से पूर्व अपेक्षित न्यूनतम शर्तों को पूरा करना होता है । इनके बारे में इस लेख में विस्तार से चर्चा की गई है । साथ ही देश के सभी बायो- स्फेयर रिजर्व की भी जानकारी दी गई है ।
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क्या हैं बायोस्फीयर रिजर्व?
प्रकृति संरक्षण के दृष्टिकोण से संरक्षित और न्यूनतम अशांत ऐसे क्षेत्र जो सम्मिलित रूप से एक जैव-भौगोलिक इकाई के समान हों, और उसका क्षेत्र इतना बड़ा हो कि वह पारिस्थितिकी तंत्र के सभी पोषण स्तरों का प्रतिनिधित्व कर रहे जीवों की संख्या का समर्थन करे; उन्हें बायोस्फीयर रिजर्व का दर्जा दिया जा सकता है ।
यह जीव मण्डल जैव- विविधता और सांस्कृतिक परम्परा से समृद्ध होते हैं और इनमें अद्वितीय पारिस्थितिकी सम्मिलित होती है जो विश्व के मुख्य जैव -भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधि हैं । इसका उद्देश्य प्रतिनिधित्व भू-दृश्यों और विविध जैव-विविधता, जो सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से स्थायी है, का संरक्षण करना और अनुसंधान, निगरानी, शिक्षा और सूचना आदान-प्रदान के लिए सहायता उपलब्ध करवाना है।
भारत में अब तक 18 बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किये जा चुके हैं । बायोस्फीयर रिजर्वो का उद्देश्य न केवल प्रतिनिधि पारिस्थितिकी की सुरक्षा करना है बल्कि ये विकास के वैकल्पिक मॉडल तैयार करने के लिए प्रयोगशालाओं के रूप में भी कार्य करते हैं । पर्यावरण मंत्रालय बायोस्फीयर रिजर्वों के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए संबंधित राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता देने के साथ-साथ अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को भी सहायता प्रदान करता है । जैसा कि हमने समझा, बायोस्फीयर रिजर्व की विशेषता यह है कि इनमें संरक्षण न केवल संरक्षित क्षेत्र के वनस्पतियों और जीवों के लिए उपलब्ध कराया जाता है, बल्कि इन क्षेत्रों में रहने वाले मानव समुदायों को भी संरक्षण प्रदान किया जाता है ।
भारत के बायोस्फियर रिज़र्व | |||||
क्रम | स्थापना वर्ष | नाम | राज्य | क्षेत्रफल | |
1 | 1986 | नीलगिरि बायो-स्फेयर रिजर्व | तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक | 5520 वर्ग कि.मी. | |
2 | 1988 | नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान एवं बायो-स्फेयर रिजर्व | उत्तराखंड | 5860 वर्ग कि.मी. | |
3 | 1989 | मन्नार की खाड़ी बायो-स्फेयर रिजर्व | तमिलनाडु | 10500 वर्ग कि.मी. | |
4 | 1988 | नोक्रेक बायो-स्फेयर रिजर्व | मेघालय | 820 वर्ग कि.मी. | |
5 | 1989 | सुन्दरवन बायो-स्फेयर रिजर्व | पश्चिम बंगाल | 9630 वर्ग कि.मी. | |
6 | 1989 | मानस बायो-स्फेयर रिजर्व | असम | 2837 वर्ग कि.मी. | |
7 | 1994 | सिमलिपाल बायो-स्फेयर रिजर्व | उड़ीसा | 4374 वर्ग कि.मी. | |
8 | 1998 | दिहांग-दिबांग बायो-स्फेयर रिजर्व | अरुणाचल प्रदेश | 5112 वर्ग कि.मी. | |
9 | 1999 | पचमढ़ी बायो-स्फेयर रिजर्व | मध्य प्रदेश | 4926.28 वर्ग कि.मी. | |
10 | 2005 | अचनकमार-अमरकंटक बायो-स्फेयर रिजर्व | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ | 3835 वर्ग कि.मी. | |
11 | 2008 | कच्छ का रण बायो-स्फेयर रिजर्व | गुजरात | 12454 वर्ग कि.मी. | |
12 | 2009 | कोल्ड डेज़र्ट बायो-स्फेयर रिजर्व | हिमाचल प्रदेश | 7770 वर्ग कि.मी. | |
13 | 2000 | कंचनजंघा बायो-स्फेयर रिजर्व | सिक्किम | 2620वर्ग कि.मी. | |
14 | 2001 | अगस्त्यमलाई बायो-स्फेयर रिजर्व | केरल, तमिलनाडु | 3500.08 वर्ग कि.मी. | |
15 | 1989 | ग्रेट निकोबार बायो-स्फेयर रिजर्व | अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह | 885 वर्ग कि.मी. | |
16 | 1997 | डिब्रू-सैखोवा बायो-स्फेयर रिजर्व | असम | 765 वर्ग कि.मी. | |
17 | 2010 | शेषचलम पहाड़ियाँ बायो-स्फेयर रिजर्व | आंध्र प्रदेश | 4755 वर्ग कि.मी. | |
18 | 2011 | पन्ना राष्ट्रीय उद्यान एवं बायो-स्फेयर रिजर्व | मध्य प्रदेश | 2998.98 वर्ग कि.मी. |
भारत के बायोस्फीयर रिजर्व
1.नीलगिरि बायो-स्फेयर रिजर्व : यह जैव मंडल पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों की तलहटी में तमिलनाडु,केरल व कर्नाटक के सीमा क्षेत्र में स्थित है। इसके अंतर्गत 6 राष्ट्रीय उद्यान अरलम, मुदुमलाई, मुकुर्ती, नागरहोल, बांदीपुर और साइलेंट वैली आते हैं। यह बायो-स्फेयर रिजर्व भारत के सर्वाधिक जैव विविधता तप्त्स्थल क्षेत्र में स्थित है | इस क्षेत्र में फूलों की पांच हजार से ज्यादा प्रजातियां, 139 स्तनपायी प्रजातियां, 508 चिडि़यों की प्रजातियां और 179 उभयचर प्रजातियां पाई जाती हैं। पश्चिमी घाट में कम से कम 84 उभयचर प्रजातियां और 16 चिडि़यों की प्रजातियां और सात स्तनपायी और 1600 फूलों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जो विश्व में और कहीं नहीं हैं। टोडा, कोटा, इरुल्लास, कुरुम्बस, पनियां, अदियां, एडनदान चेट्टी, अल्लार, मलायन, आदि इस रिजर्व में पाई जाने वाली जनजातियाँ हैं। लुप्तप्राय निलगिरी टार एवं सिंह पुच्छी मकाक यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं | इसकी स्थापना 1986 में हुई थी |
2.नंदा देवी बायो-स्फेयर रिजर्व : नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखण्ड में नन्दा देवी पर्वत के आस-पास विस्तृत है | नंदा देवी भारत की दूसरी एवं विश्व की 23 वीं सबसे ऊँची पर्वत माला (7817 मी.) है | उपरी ऋषि घाटी, जिसे अक्सर ”भीतरी अभ्यारण्य” के रूप में उल्लिखित किया जाता है, इसे उत्तर में चांगबांग, उत्तर ऋषि और उत्तर नंदा देवी हिमनदी द्वारा तथा नंदादेवी पर्वत के दक्षिण में दक्षिण नंदा देवी और दक्षिणी ऋषि हिमनदियों द्वारा सिंचित किया जाता है। उत्तरी और दक्षिणी ऋषि नदियों के संगम से नीचे की ओर देवी स्थान ऋषिकोट पर्वतमाला को काटते हुए एक चिताकर्षी संकीर्ण नदी घाटी विद्यमान है। त्रिशुली और रमणी हिमनदियां निचली ऋषि घाटी अथवा ”बाहरी अभ्यारण्य” की विशेषताएं हैं, और इसके नीचे ऋषि गंगा संकीर्ण, सीधी खड़ी नीचे की ओर संकरी नदी घाटी में प्रवेश करती है। यहाँ दुनिया की सबसे अनोखी ऊँचाई वाली वनस्पतियाँ और जीव पाए जाते हैं। रिज़र्व में “भारल” (जो नीली भेड़ के नाम से भी जानी जाती है), हिमालयी पक्षी, सरो, गोरल, हिम तेंदुआ, हिमालयी काला भालू, भूरा भालू, , हिमालयन कस्तूरी मृग इत्यादि प्रजातियाँ प्रमुख हैं । लगभग 630 वर्ग किलोमीटर तक फैला हुआ उत्तर-भारत का यह विशालतम अभयारण्य है। गढ़वाल हिमालय के भीतर चमोली जिले में फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान भी अवस्थित है। इसमें ऋषि गंगा, धौली गंगा, धौली गंगा की एक पूर्वी सहायक नदी, जो जोशीमठ में अलकनंदा नदी में प्रवाहित होती है, का जल संग्रहण क्षेत्र शामिल है। यह क्षेत्र एक विशाल हिमनदीय घाटी है, जो एक सामानांतर श्रृंखलाओं अर्थात् उत्तर-दक्षिण उन्मुख पर्वतमालाओं द्वारा विभक्त हैं। ये पर्वत किनारा को घेरते हुए ऊपर की ओर बढ़ती हैं, जिसके साथ दुनागिरि, चांगबांग और नंदा देवी पूर्व सहित बेहतर रूप से ज्ञात लगभग एक दर्जन शिखर हैं। इस घाटी को पिंडर घाटी अथवा पिंडर वैली के नाम से भी जाना जाता है | पिंड का अर्थ होता है हिम | नवम्बर से मई माह के मध्य घाटी सामान्यतः हिमाच्छादित रहती है। भ्रमण के लिये जुलाई, अगस्त व सितंबर के महीनों को सर्वोत्तम माना जाता है। इस घाटी का पता सबसे पहले ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस स्मिथ और उनके साथी आर एल होल्डसवर्थ ने लगाया था, जो 1931 में अपने कामेट पर्वत के अभियान से लौट रहे थे। इसकी खूबसूरती से प्रभावित होकर स्मिथ ने 1938 में “वैली ऑफ फ्लॉवर्स” नाम से एक किताब लिखी | तभी से यह बागवानी विशेषज्ञों या फूल प्रेमियों के लिए एक विश्व प्रसिद्ध स्थल बन गया। यहाँ सामान्यतः पाये जाने वाले फूलों के पौधों में एनीमोन, जर्मेनियम, मार्श, गेंदा, प्रिभुला, पोटेन्टिला, जिउम, तारक, लिलियम, हिमालयी नीला पोस्त, बछनाग, डेलफिनियम, रानुनकुलस, कोरिडालिस, इन्डुला, सौसुरिया, कम्पानुला, पेडिक्युलरिस, मोरिना, इम्पेटिनस, बिस्टोरटा, लिगुलारिया, अनाफलिस, सैक्सिफागा, लोबिलिया, थर्मोपसिस, ट्रौलियस, एक्युलेगिया, कोडोनोपसिस, डैक्टाइलोरहिज्म, साइप्रिपेडियम, स्ट्राबेरी एवं रोडोडियोड्रान इत्यादि प्रमुख हैं। नंदा देवी बायोस्फियर रिज़र्व को 1988 में यूनेस्को विश्व विरासत स्थल का दर्जा दिया गया |
3.मन्नार की खाड़ी बायो-स्फेयर रिजर्व : भारत व श्रीलंका के मध्य स्थित यह बायोस्फियर रिज़र्व समृद्ध समुद्री पर्यावरण के लिए प्रसिद्ध है। यह रिजर्व कई प्रकार की सम्वेदनशील प्रजातियों जैसे व्हेल शार्क, डुगोंग (समुद्री गाय), हरे समुद्री कछुए, समुद्री घोड़े, डॉल्फ़िन, हॉक्सबिल कछुए आदि का प्राकृतिक निवास स्थान है। इस जैव मंडल क्षेत्र में 21 द्वीपों के साथ (जो कि चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किये जा सकते हैं – तूतीकोरिन, मंडपम, कीजाखराई और वेम्बर), नद मुखों, समुद्र तटों, जंगलों के निकटवर्ती वातावरण शामिल हैं, जिसमें समुद्री शैवाल, समुद्री घास, प्रवाल भित्तियाँ (कोरल), खारे दलदल और मैंग्रोव आदि शामिल हैं। खाड़ी के 3,600 पौधों और जानवरों की प्रजातियों में विश्व स्तर पर लुप्तप्राय समुद्री गाय (डुगॉन्ग डगॉन) और छह मैंग्रोव प्रजातियाँ प्रायद्वीपीय भारत में स्थानिक हैं। यहाँ केवल प्रवाल की 117 से भी अधिक प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं | यहाँ के निवासियों में मुख्य रूप से मारकेयर हैं, स्थानीय लोग जो मुख्य रूप से मत्स्य पालन में लिप्त हैं। इस जैव मंडल क्षेत्र में भारत की ओर से ताम्रपर्णी नदी और श्रीलंका की तरफ से अरुवी सहित अनेक नदियाँ मिलती हैं। हाल ही में इसे रामसर साईट के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का आर्द्र भूमि स्थल घोषित किया गया है |
4.नोक्रेक बायो-स्फेयर रिजर्व : मेघालय राज्य के पश्चिम गारो हिल्स ज़िले में स्थित नोक्रेक बायोस्फीयर रिजर्व के अधिकांश हिस्सों में मिट्टी लाल दोमट है। हालाँकि मिट्टी कार्बनिक पदार्थों और नाइट्रोजन से भरपूर है। यही कारण है कि यह जैव मंडल वनस्पतियों और जीवों की एक बड़ी विविधता का समर्थन करता है | यहाँ सफेद मेरांती, जंगली नींबू, लाली, केमपाका और भव्य रसमाला जैसे ऑर्किड की दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। गारो हिल्स क्षेत्र की सभी महत्वपूर्ण नदियाँ और धाराएँ नोकरेक रेंज से निकलती हैं, जिनमें से सिम्संग (Simsang) नदी, जिसे सोमेश्वरी के नाम से जाना जाता है, यह बाघमारा में बांग्लादेश से निकलती है, सबसे प्रमुख है। पार्क में उल्लेखनीय स्थलों में नोकेरेक पीक और रोंगबैंग डेयर वाटर फॉल शामिल हैं। संरक्षित जैवमंडल का 90% भाग सदाबहार वन से आच्छादित है। यहाँ की विशिष्ट प्रजातियों में बॉम्बैक्स सीइबा , स्टेरकुलिया विलोसा और कैसिया फ़िस्टुला (गोल्डन शॉवर ट्री) शामिल हैं। जबकि प्राणियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में स्लो लोरिस, विशालकाय उड़न गिलहरी और पिग-टेल्ड मैकाक शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ बाघ, तेंदुए, हाथी और हूलॉक बंदर जैसे कई प्राणी भी पाए जाते हैं । हूलॉक बंदर भारत के सबसे लुप्तप्राय बंदरों में आते हैं ।
5.सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान एवं बायो-स्फेयर रिजर्व : सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान भारत के पश्चिम बंगाल राज्य तथा बांग्लादेश में गंगा नदी के सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान, बाघ संरक्षित क्षेत्र (Tiger Reserve) एवं बायोस्फ़ीयर रिज़र्व क्षेत्र है। यह क्षेत्र गरान (Mangrove) के घने जंगलों से घिरा हुआ है और रॉयल बंगाल टाइगर का सबसे बड़ा संरक्षित क्षेत्र है। यह विश्व का एकमात्र नदी डेल्टा है जहां बाघ पाए जाते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की संख्या 103 है। यहां पक्षियों, सरीसृपों तथा रीढ़विहीन जीवों (इन्वर्टीब्रेट्स) की कई प्रजातियों के साथ साथ खारे पानी के मगरमच्छ भी मिलते हैं। वर्तमान सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान 1973 में मूल सुंदरवन बाघ रिज़र्व क्षेत्र का कोर क्षेत्र तथा 1977 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित हुआ था। यहाँ के गरान जंगलों में सुंदरी के वृक्ष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं जिसके कारण इसका नाम सुंदर वन पड़ा |
6.मानस बायो-स्फेयर रिजर्व : मानस राष्ट्रीय उद्यान असम में स्थित है जिसे यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के साथ साथ एक हाथी रिजर्व, एक प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व और एक बायोस्फीयर रिजर्व का भी दर्जा प्राप्त है। यह हिमालय की तलहटी में स्थित है और भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा हुआ है। यह पार्क अपने लुप्तप्राय और दुर्लभ स्थानिक वन्यजीवों जैसे हर्पिड खरगोश,बंगाल फ्लोरिकन (Bengal Florican) ,स्वाम्प डियर,बाघ ,गेंडों , पिग्मी हॉग और गोल्डन लंगूर के लिए प्रसिद्ध है। यह राष्ट्रीय उद्यान अपनी जंगली भैंसों की आबादी के लिए भी प्रसिद्ध है। इस पार्क का नाम मानस नदी पर रखा गया है । मानस नदी ब्रह्मपुत्र नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, जो इस राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरती है।
7.सिमलिपाल बायो-स्फेयर रिजर्व : यह ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के उत्तरी भाग में स्थित है जो पूर्वी घाट के पूर्वी छोर पर स्थित है। सिमलीपाल में पक्षियों की 300 से भी अधिक प्रजातियाँ, उभयचरों की 20 प्रजातियाँ और सरीसृप की 62 प्रजातियाँ , फूलों की 1,076 प्रजातियाँ और ऑर्किड की 96 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसमें उष्णकटिबंधीय अर्द्ध-सदाबहार वन, उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन, शुष्क पर्णपाती पहाड़ी वन और विशाल घास के मैदान मौजूद हैं। सेमल के वृक्षों के बहुतायत में पाए जाने के कारण इस जैव मंडल का नाम सिमलीपाल पड़ा | इस बायोस्फीयर रिजर्व के अंदर 1,265 गांव स्थित हैं। यहाँ रहने वाले निवासियों में लगभग 73% जनजाति हैं। इस बायोस्फीयर रिज़र्व क्षेत्र में दो जनजातियाँ – इरेंगा केरिया और मनकीरदियाह निवास करती हैं, जो आज भी पारंपरिक कृषि गतिविधियों (जैसे बीज और लकड़ी का संग्रहन ) के माध्यम से जीविकोपार्जन करती हैं। अन्य प्रमुख जनजातियों में गोंडा और मुंडा शामिल हैं। सिमलीपाल बाघों और हाथियों सहित तेंदुआ ,मगरमच्छ ,बंदरों इत्यादि जैसे जंगली जानवरों की एक विस्तृत शृंखला का समर्थन करता है | सिमलीपाल पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी खैरिबुरु (1,168 मीटर) है। इस क्षेत्र को कई जलप्रपात और बारहमासी नदियाँ सिंचित करती हैं, जैसे बुद्धबलंग, बैतरणी और सुवर्णरेखा इत्यादि ।
8.दिहांग-दिबांग बायो-स्फेयर रिजर्व : यह जैव मंडल अरुणाचल प्रदेश में स्थित है । यह क्षेत्र भारत की जैव विविधता का दूसरा सबसे अधिक त्प्तस्थ्ल (पूर्वी हिमालय) है | इस बायो-स्फेयर रिजर्व के अंदर कई जनजातियां निवास करती हैं, जिनमें पासी, पदम, कार्कोस, पांगिस, सिमोंग, एशिंग्स, तांगम, कोमकार, मिलंग्स, डालबिंग्स, मेम्बास, खंबा और इदु मिश्मी शामिल हैं। यहाँ पाये जाने वाले पौधों में मैंगलेटिया गिवेना, मैगनोलिया कैंपबेली, शिज़ांद्रा नेगलेक्टा, होल्बेलिया लैटिफ़ोलिया, और रैनुनकुलस की विभिन्न प्रजातियां आदि शामिल हैं। जबकि जानवरों में बाघ , लाल पांडा, टाकिन, कस्तूरी मृग, बाइसन, सीरो, हिमालयी काला भालू, भारतीय जंगली कुत्ता, लाल लोमड़ी, हिरण, असमिया मकाक, गिलहरी, सिवेट, जंगली सूअर, स्पॉटेड या कॉमन लेपर्ड, क्लाउडेड लेपर्ड, स्नो लेपर्ड, गोल्डन कैट, जंगल कैट, मार्बल कैट, लेपर्ड कैट आदि प्रमुख हैं।
9.पचमढ़ी बायो-स्फेयर रिजर्व : पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व, मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों के मध्य स्थित है। इसके अंतर्गत तीन वन्यजीव संरक्षण स्थल शामिल हैं: बोरी अभयारण्य, पचमढ़ी अभयारण्य तथा सतपुड़ा नेशनल पार्क | यह पर्णपाती वन के अंतर्गत आता है । इन जंगलों में मुख्य रूप से सागौन (टीक) व साल (सखुआ) के पेड़ पाए जाते हैं | अन्य स्थानिक वनस्पतियों में जंगली आम, सिल्वर फ़र्न, जामुन और अर्जुन आदि शामिल हैं। बड़े स्तनपायी प्रजातियों में बाघ, तेंदुए, जंगली सूअर, गौर, चीतल हिरण, हिरण, सांभर हिरण, और रीसस बन्दर शामिल हैं। चिंकारा, नीलगाय, जंगली कुत्ते, भारतीय भेड़िया, गवल, भारतीय विशाल गिलहरी, और उड़न गिलहरी की भी अच्छी संख्या है । गोंड इस जैव मंडल में निवास करने वाली प्रमुख जनजाति है |
10.अचनकमार-अमरकंटक बायो-स्फेयर रिजर्व : इस बायोस्फियर रिज़र्व का लगभग 70% छत्तीसगढ़ में, व शेष 30% मध्य प्रदेश राज्य में विस्तृत है । यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति मुख्यतः उष्णकटिबंधीय पर्णपाती प्रकार की है | भारत की 2 प्रमुख नदियां नर्मदा और सोन इसी बायोस्फीयर रिजर्व से निकलती है। यहाँ पाए जाने वाले मुख्य वन्य जीव हैं : चीतल,सांभर,बाइसन,बार्किंग डियर ,तेंदुआ,जंगली कुत्ता(ढोल),धारीदार लकड़बग्घा,स्लोथ बेयर ,नीलगाय, चौसिंघा,भालू,बाघ,भेड़िया,लोमड़ी,चिंकारा,जंगली सूअर,गीदड़,काला हिरण,बंदर उड़न गिलहरी आदि | यह एक टाइगर रिज़र्व भी है ।
11.कच्छ का रण बायो-स्फेयर रिजर्व : कच्छ का रण बायोस्फीयर रिजर्व गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में फैला हुआ एक नमक का दलदली प्रदेश है। क्षेत्रफल की दृष्टि से कच्छ का रण भारत में सबसे बड़ा बायोस्फीयर रिजर्व है। इस जैव मंडल क्षेत्र में जंगली गधा ,जिसे घुड़खर के नाम से भी जानते हैं ,सबसे प्रमुख वन्य जीव है | यह एक लुप्तप्राय प्राणी है जो पाकिस्तान में भी पाया जाता है | पास में ही स्थित गिर के जंगल एशियाई शेरों के दुनिया भर में एकमात्र प्राकृतिक आवास हैं |
12.अगस्त्यमलाई बायो-स्फेयर रिजर्व : तमिलनाडु व केरल में विस्तृत ,वर्षा आधारित वन क्षेत्र का यह जैव मंडल भी पश्चिमी घाट का ही हिस्सा है जिस में 2,254 प्रकार के पेड़-पौधे हैं, जिनमें लगभग 400 स्थानीय हैं। इसके अंतर्गत शेंदुर्नी (Shendurney), पेप्पारा (Peppara) और नेयार (Neyyar) तीन वन्य जीव अभ्यारण्य हैं। इसके अलावा यहां एक बाघ आरक्षित क्षेत्र कलाकड मुंडनथुरई (Kalakad Mundan Thurai) भी है। यह बायोस्फियर रिज़र्व विश्व की प्राचीनतम जनजातियों में से एक कनिकर्ण का प्राकृतिक निवास स्थान है |
13.कंचनजंघा बायो-स्फेयर रिजर्व : सिक्किम के लगभग एक -चौथाई क्षेत्र में विस्तृत इस राष्ट्रीय उद्यान में विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी, कंचनजंगा विद्यमान है। इस उद्यान का कुल क्षेत्रफल 1784 वर्ग कि.है जो कि सिक्किम के कुल क्षेत्रफल का 25 % है। यहाँ बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ और विभिन्न झीलें और हिमनद शामिल हैं, जिसमें 26 किलोमीटर लंबी ज़ेमू हिमनद प्रसिद्द है जो की इसके आधार पर स्थित है। यह हिम तेंदुआ, हिमालयी काला भालू, तिब्बती एंटीलोप, जंगली गधा, काकड़, कस्तूरी मृग, फ्लाइंग गिलहरी और लाल पांडा जैसे स्थानिक(endemic) और संकटग्रस्त पशु प्रजातियों के लिये प्राकृतिक आवास है | वनस्पति में यहाँ मैगनोलिया, बुरुंश और देवदार की प्रमुखता है ।
14.पन्ना राष्ट्रीय उद्यान एवं बायो-स्फेयर रिजर्व : पन्ना बायो-स्फेयर रिजर्व विंध्य पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में मध्य प्रदेश राज्य के छतरपुर जिले में फैला हुआ है। यह प्रोजेक्ट टाइगर के तहत एक बाघ अभयारण्य है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान 1981 में बनाया गया था। इसे 1994 में भारत सरकार द्वारा एक परियोजना टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उद्यान में प्रमुख वनस्पतियों में सागौन, बाँस, बोसवेलिया आदि शामिल हैं। इस उद्यान में कई दुर्लभ प्रजातियों और लुप्तप्राय प्रजातियों को देखा जा सकता है। यहाँ पाए जाने वाले जानवरों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, चिंकारा, नीलगाय, सांभर और भालू हैं। यह उद्यान 200 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों का घर है, जिनमें लाल सिर वाला गिद्ध, बार-हेडेड हंस, हनी बुज़ार्ड और भारतीय गिद्ध शामिल हैं। इस उद्यान में गिद्ध की छह प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
15.शेषाचलम: 2010 में शेषाचलम को आंध्र प्रदेश का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (बायो-स्फेयर रिजर्व) घोषित किया गया । यह आंध्र प्रदेश के शेषाचलम पहाड़ियों को सम्मिलित कर बनाया गया है । दक्षिण आंध्र प्रदेश के चित्तूर और कडप्पा जिलों में फैले हुए इस बायो-स्फेयर रिजर्व के 3 उप-क्षेत्र हैं जो कोर, बफर और संक्रमण क्षेत्र में बंटे विभक्त हैं । यह क्षेत्र “लाल रक्त चंदन” के वृक्षों के लिए प्रख्यात है । तिरूपति मंदिर भी इस बायोस्फीयर रिजर्व के अंतर्गत आता है । शेषाचलम पहाड़ियां पूर्वी घाट का हिस्सा हैं । पेन्नार इस क्षेत्र की मुख्य नदी है ।
16.डिब्रू-सैखोवा बायो-स्फेयर रिजर्व : यह जैव मंडल असम राज्य के पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित है । इस क्षेत्र में मूलतः ऊष्णकटिबंधीय मॉनसूनी प्रकृति के वन पाए जाते हैं । डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क और बायोस्फीयर रिजर्व में प्राकृतिक वनस्पति में मुख्य रूप से अर्ध-सदाबहार वन, पर्णपाती वन, तटीय और दलदली – सदाबहार वन, जिनमें बांस की प्रमुखता है , और घास के मैदान शामिल हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के आर्किड पाए जाते हैं जिनमें सैलिक्स टेट्रास्पर्मा, बिस्कोफिया जावनिका, डिलेनिया इंडिका, बॉम्बैक्स सेइबा, टर्मिनलिया मायरियोकार्पा, लेगरस्ट्रोमिया परविफ्लोरा, मेसुआ फेरिया, डालबर्गिया सिसो, अरुंडो डोनैक्स, इम्पेराटा सिलिंड्रिका, फ्राग्मेटिस कारका, एरिएन्थस रवेनिया आदि का नाम लिया जा सकता है ।
डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान को मुख्य रूप से सफेद पंखों वाले हंस (Wood Duck) को अपनी प्राकृतिक आवास में संरक्षण प्रदान के लिए स्थापित किया गया था। हालांकि, उद्यान में स्तनधारियों की कुल 36 प्रजातियाँ भी पाईं जाती हैं। इनमें से कई स्तनधारी प्रजातियां वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 के तहत संरक्षित हैं । रॉयल बंगाल टाइगर, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, स्लॉथ बीयर, ढोल (भारतीय जंगली कुत्ता ), लघु भारतीय सीविट, विशलकाय मलायी गिलहरी, चीनी छिपकली, गांगेय सूंस डॉल्फिन, पिग टेल्ड मकाक, असमिया मकाक, रीसस मकाक, कैप्ड लंगूर, हलाक गिब्बन, एशियाई हाथी, हिरण, एशियाई जल- भैंस, जंगली घोड़े, बार्किंग डियर, जंगली सूअर, सांभर, हॉग डीयर आदि जानवर डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में प्रमुख हैं। इसके अलावा इस राष्ट्रीय उद्यान में सरी-सृप की अनेक प्रजातियां, कछुए और मेढकों की अनेक प्रजातियाँ दर्ज की गयीं है। जलीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ मछलियों की भी विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं । इस क्षेत्र में मछलियों की 60 से भी अधिक प्रजातियाँ दर्ज की गयीं हैं । इस क्षेत्र में पक्षियों की 350 से भी अधिक विभिन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं । इनमें व्हाइट विंग्ड वुड डक, बंगाल फ्लोरिकान, स्पॉटबिल पेलिकन, हार्नबिल, ग्रेटर एडजुटेंट सारस, लैसर एडजुटेंट सारस, बगुला, बिटर्न, किंगफिशर, बुलबुल, ओपनबिल सारस, कृष्ण ग्रीवा सारस, क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल,बर्बेट, गिद्ध , बैबलर, ब्लैक ब्रेस्टेड पैरॉट इत्यादि प्रमुख हैं ।
17.ग्रेट निकोबार बायो-स्फेयर रिजर्व : यहाँ स्तनधारियों की कुल 14 प्रजातियाँ, पक्षियों की 71 प्रजातियाँ, सरीसृपों की 26 प्रजातियाँ, उभयचरों की 10 प्रजातियाँ और मछलियों की 113 प्रजातियाँ पाई गई हैं । इस क्षेत्र की विशेषता यह है कि यहाँ बड़ी संख्या में जीवों की स्थानिक (endemic) और लुप्तप्राय प्रजातियाँ पाई जाती हैं । यही कारण है कि यह क्षेत्र जैव विविधता का एक मुख्य तप्त स्थल है । अब तक यहाँ स्तनधारियों की कुल 14 में से 11 प्रजातियाँ, पक्षियों की 32 प्रजातियाँ, सरीसृपों की 7 प्रजातियाँ और उभयचरों की 4 स्थानिक दर्ज की जा चुकी हैं । इनमें मकैक़ बन्दर जो केंकड़े खाने के लिए प्रसिद्ध हैं, डुगॉन्ग (समुद्री गाय ), निकोबार मेगापोड, सर्प चील, खारे पानी के मगरमच्छ, समुद्री कछुए और जालीदार अजगर प्रमुख प्रजातियाँ हैं । इस रिजर्व में कई अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां भी पाई जाती हैं जिनमें अंडमान जंगली सुअर, पाम सिवेट, फ्रूट बैट, निकोबार पिजन, व्हाइट बेलिड सी ईगल, निकोबार सर्पेंट ईगल, पैराकेट्स, निकोबार पैराकेट्स, वाटर मॉनिटर छिपकली आदि शामिल हैं । निकोबारी व शोम्पेंन इस क्षेत्र की मुख्य जनजातियाँ हैं जो आज भी आदिम तरीके से जीवन यापन करने के लिए जानी जाती हैं ।
18.कोल्ड डेज़र्ट बायो-स्फेयर रिजर्व : यह एक नव-स्थापित बायो-स्फेयर रिजर्व है जो हिमाचल प्रदेश में है। इसकी विशेषता यह है की यह अत्यंत उंचाई पर स्थित है और बर्फ से आच्छादित रहता है । पिन वैली नेशनल पार्क , सार्चू, चंद्रताल इसके अंतर्गत आते हैं । हिम तेंदुआ इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख जीव प्रजाति है।
एक बायो-स्फेयर रिजर्व का संघटन
किसी बायो-स्फेयर रिजर्व के 3 मुख्य घटक होते हैं : 1.कोर क्षेत्र (Core Areas): यह बायोस्फीयर रिज़र्व का सबसे सुरक्षित व संरक्षित क्षेत्र है। यह केन्द्रीय भाग है इसमें संवेदन शील स्थानिक (ENDEMIC) प्रजातियाँ निवास करती हैं। इस क्षेत्र में अनुसंधान प्रक्रियों को अनुमति है बशर्ते वो इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी एवं वन्यजीवों को प्रभावित न करें । इस क्षेत्र में मुख्यतः वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित/विनियमित राष्ट्रीय उद्यान या वन्य जीव अभयारण्य आते हैं। इस क्षेत्र में सम्बंधित अधिकारियों/कर्मचारियों को छोड़करअन्य किसी को प्रव्रेश की अनुमति नहीं होती । 2.बफर क्षेत्र (Buffer Zone): कोर क्षेत्र के चारों ओर का क्षेत्र बफर क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र का प्रयोग सीमित तौर पर पर्यटन, मछली पकड़ना, चराई आदि कार्यों के लिये किया जाता है । इस क्षेत्र में मानव का प्रवेश कोर क्षेत्र की तुलना में अधिक होता है। 3.संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone): यह किसी बायोस्फीयर रिज़र्व का सबसे बाहरी हिस्सा होता है। इसमें मानवीय बस्तियाँ, कृषि , प्रबंधित जंगल और मनोरंजन के लिये क्षेत्र तथा अन्य आर्थिक उपयोग क्षेत्र शामिल हैं। इसमें मानवीय गतिविधि सर्वाधिक होती है । |
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