विश्व मधुमक्खी दिवस- 2022

हाल ही में 20 मई, 2022 को दुनिया भर में विश्व मधुमक्खी दिवस मनाया गया |  संयुक्त राष्ट्र संघ  द्वारा हर साल 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस (World Bee Day) के रूप में मनाया जाता है। इसकी पहल 2014 में यूरोपीय देश स्लोवेनिया के मधुमक्खी पालन संघ के द्वारा की गई थी | वर्ष 2022 के विश्व मधुमक्खी दिवस का थीम था “Bee Engaged: मधुमक्खियों  की विविधता एवं  मधुमक्खी पालन का महत्त्व |” 

इस लेख में हम मधुमक्खियों और उनके पालन से जुड़े हर महत्वपूर्ण पहलू की चर्चा करेंगे | विश्व कछुआ दिवस की जानकारी के लिए हमारे लिंक किये गए लेख को देखें |  हिंदी माध्यम में यूपीएससी से जुड़े मार्गदर्शन के लिए अवश्य देखें हमारा हिंदी पेज  आईएएस हिंदी |

विश्व मधुमक्खी दिवस स्लोवेनियाई मधुमक्खी पालन के अग्रणी एंटोन जानसा (Anton Jansa) के जन्मदिन के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 20 मई को  मनाया जाता है। इसका उद्देश्य मधुमक्खियों के साथ -साथ अन्य परागणकों (pollinators) जैसे  चिड़ियों, तितलियों, चमगादड़ों एवं अन्य कीटों  के भी पर्यावरण में  महत्व के बारे में जागरूकता फैलाना  है। स्लोवेनिया के तरफ से आए प्रस्ताव के कारण ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस के रूप में घोषित किया । इस तिथि को चुनने का एक  कारण यह भी है  कि मई का ही महीना वह समय होता है  जब मधुमक्खियां सबसे अधिक सक्रिय होती हैं और प्रजनन करना शुरू करती हैं। निश्चित रूप से इस समय उन्हें  पराग कणों की भी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। 

स्लोवेनिया प्रति व्यक्ति मधुमक्खी पालकों की संख्या के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है, जहाँ  0.5% लोग  मधुमक्खी पालक हैं |  स्लोवेनियाई नागरिकों के लिए, मधुमक्खी पालन न केवल जीविका का साधन बल्कि  एक  परंपरागत व्यवसाय  है। स्लोवेनिया यूरोप का एकमात्र देश भी  है जिसने  मधुमक्खियों के लिए कानूनी सुरक्षा की शुरुआत की है। 2011 में यह मधुमक्खियों के लिए हानिकारक कीटनाशकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने वाला यूरोप का पहला देश बन गया है ।

दुनिया भर  में मधुमक्खियों की 20 हज़ार से भी अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं और यही कारण है कि मधुमक्खियां सबसे बड़ी परागणकर्ता (pollinator) भी  हैं। भारत में  मधुमक्खियों  की 5 प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं जिनसे शहद प्राप्त किया जाता है | ये प्रजातियाँ  हैं:- 

1) एपिस डोरसॅटा (Rock Bee): ये बड़े आकार की आक्रामक मधुमक्खियां होती हैं जिनका पालन काफी कठिन होता है |  इसलिये अधिकांशतः  जंगलों  से ही  इनका शहद प्राप्त कर लिया जाता है। इन मधुमक्खीयों के एक छत्ते से एक साल में तकरीबन 36 किलो तक शहद प्राप्त हो सकता है | ऊँची -ऊँची इमारतों पर अक्सर इनके छत्ते देखे जा सकते हैं क्योंकि ये मधुमक्खियाँ उंचाई पर ही अपने छतों का निर्माण करती हैं | 

2) एपिस फ्लोरिया (Little Bee): यह मधुमक्खियों की सबसे छोटी प्रजातियों में से एक है और इनका   शहद भी जंगल से ही प्राप्त कर  लिया जाता  है क्योंकि ये घुमन्तु स्वाभाव की होती हैं और  बहुत कम उपज देती हैं। इनके एक छत्ते से एक साल में तक़रीबन ½  किलो ही शहद प्राप्त होता है |

3) एपिस सेराना इन्डिका (Asian Bee): एशिया क्षेत्र की मूल ,मध्यम आकार की  ये मधुमक्खियां कृत्रिम कृत्रिम पालन के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं | इनकी एक कोलोनी से 6-8 किलो शहद प्राप्त हो सकता है | ये मधुमक्खियां डंक मारने के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती हैं |

4) एपिस मेलिफेरा (यूरोपीय  मधुमक्खी) : ये दूसरी सबसे बड़ी मधुमक्खियां हैं | भारत में इनका पालन यूरोप (इटली) से आयातित कर किया जाता है | इनका औसत शहद उत्पादन 25-40 किलो है |

5) मेलिपोना /ट्रिगोना (Dammer or Stingless Bees): ये मधुमक्खियां शहद की अत्यंत कम उपज (100 ग्राम तक) देती हैं |

एक अध्ययन के अनुसार हमें जो भोजन प्राप्त होता है उसका प्रत्येक 3 में से 1 निवाला हमें मधुमक्खियों के कारण ही प्राप्त होता है | अर्थात विश्व की लगभग 33% कृषि मधुमक्खियों  पर ही  निर्भर है। मधुमक्खियाँ पराग (नेक्टर) पाने के लिए एक से दुसरे फूल पर  मंडराती हैं | इस बीच पराग कण उनमे चिपक जाते हैं और इस तरह वे पादप प्रजनन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं | किंतु वर्तमान  में मधुमक्खियाँ निवास स्थान के नुकसान (habitat loss), कृषि में  कीटनाशकों के अन्धाधुन प्रयोग, जलवायु परिवर्तन  और  मोबाइल टावरों की बढती संख्या इत्यादि के  कारण  खतरे में हैं। पिछले कुछ दशकों में ही दुनिया भर में मधुमक्खियों की संख्या में लगभग 40% की कमी आई है | यदि इसपर नियंत्रण नहीं किया गया तो इनकी कई प्रजातियाँ हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगी, जो कि न केवल वैश्विक खाद्य सुरक्षा बल्कि सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए घातक होगा  |

पहल : जैव विविधता पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन ने  इस चिंता जनक स्थिति पर ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया । COP-2000  (Conference of Parties)  में भी  अंतर्राष्ट्रीय परागकण पहल की  शुरूआत की गई थी। 2022 में भारत सरकार ने भी  मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए 500 करोड़ के वित्त से “मीठी क्रांति” (sweet revolution) की  शुरुआत की | इस मिशन का उद्देश्य  5 बड़े  एवं 100 छोटे शहद व अन्य मधुमक्खी उत्पाद (जैसे वैक्स/मोम) परीक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित करना है। साथ ही मधुमक्खी पालकों की आय को दो-गुना करना भी है | इस प्रकार इस योजना में पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ कृषकों की बेहतरी का दोहरा लक्ष्य है |

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