UPSC जंतु विज्ञान/प्राणी विज्ञान  का पाठ्यक्रम - Zoology Syllabus in Hindi

जीव विज्ञान (बायोलॉजी) की दो शाखाएँ हैं – वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) एवं जंतु विज्ञान (जूलॉजी) | वनस्पति विज्ञान में हम जहाँ पेड़-पौधों के विकास एवं उनकी संरचनाओं का  अध्ययन करते हैं ,वहीं जंतु अथवा प्राणी विज्ञान में जीव -जंतुओं की शारीरिक संरचना एवं उनके उद्भव व  विकास का अध्ययन करते हैं ( हिंदी माध्यम में  वनस्पति विज्ञान के सम्पूर्ण  पाठ्यक्रम की जानकरी के लिए देखें  IAS वनस्पति विज्ञान पाठ्यक्रम ) 

इस लेख में यूपीएससी मुख्य परीक्षा में वैकल्पिक विषय के तौर पर जंतु विज्ञान के पाठ्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी गई है | इस विषय के महत्वपूर्ण पुस्तकों की जानकारी  के लिए देखें हमारा हिंदी पेज जंतु विज्ञान पुस्तक सूचि| 

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IAS जंतु  विज्ञान/ प्राणी विज्ञान  का पाठ्यक्रम – प्रश्न पत्र -1

1.अरज्जुकी व रज्जुकी :

(क) विभिन्न फ़ाइलाओं का उप-वर्गों तक वर्गीकरण एवं संबंध;एसिलोमेटा व सिलोमेटा, प्रोटोस्टोम और ड्यूटोरोस्टोम्स, बाईलेटलेरिया  और रेडियेटा; प्रोटिस्टा, पैराजोआ, ओनिकॉफ़ोरा और हेमिकोरडाटा  की स्थिति; सममिति |

(ख) प्रोटोजोआ: गमन, पोषण, प्रजनन, लिंग;  पैरामाइशीअम, मोनोसिस्टिस, प्लॉज्मोड़ीयम और लीशमैनिया के सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त |

(ग) पोरिफेरा: कंकाल, नालतंत्र और प्रजनन।

(घ) निडारिया: बहुरूपता, रक्षा संरचनाएं और उनकी क्रियाविधि ;प्रवाल भित्तियों का निर्माण ; मेटाजेनेसिस; ओबिलिया व ओरिलिया के  सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त |

(ड) प्लेटिहेल्मंथस: परजीवी अनुकूलन; फ़ैसियोला और टीनिया के सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त  और उनके रोगजनक लक्षण |

(च) नेमेथेलमंट्स:  एस्केरिस और वुकेरिया के सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त तथा  परजीवी अनुकूलन |

(छ) एनेलिडा: सिलोम और विखंडता ,पोलीकीटों में जीवन विधि ,नेरिस ,केंचुआ व जोंक के सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त |

(ज) आर्थ्रोपोडा: क्रस्तेसिया में डिम्ब प्रकार  और परजीवीता ,आर्थोपोडा  (झींगा, तिलचट्टा और बिच्छू) में दृष्टि व श्वसन ; कीड़ों  (तिलचट्टा, मच्छर, मक्खी , मधुमक्खी और तितली) में मुखांगों का रूपांतरण ; कीट में कायांतरण तथा इसका हार्मोनी  नियमन, दीमकों तथा मधुमक्खियों का  सामाजिक व्यवहार |

(झ) मोलास्का: अशन ,श्वसन ,गमन ,लैमेलीडेंस ,पाइला व सीपिया के सामान्य लक्षण व जीवन -वृत्त ;गैस्ट्रोपोड़ो में एंठन तथा अव्यावर्तन |

(ञ) इचिनोडर्मोटा: अशन ,श्वसन ,गमन ,डिब्ब प्रकार , एस्टरियस के  सामान्य लक्षण और जीवन वृत्त |

(ट) प्रोटोकोरडाटा: राज्जुकियों का उद्भव ,ब्रेकियोस्तोमा व  हर्डमैनिया के  सामान्य लक्षण और जीवन वृत्त |

(ठ)पाइसेज : श्वसन, गतिरोध और प्रवासन |

(ड) एम्फ़ीबिया: चतुश्पादों का उद्भव ,जनकिय देखभाल ,शाव्कंतरण |

(ढ) रीप्टीलिया: सरीसृप की उत्पत्ति, करोटी के प्रकार, स्पिनोडोन और मगरमच्छ का स्थान |

(ण) एवीज: पक्षियों की उत्पत्ति, उड़ान अनुकूलन, प्रवासन |

(त) मैमेलिया : स्तनधारियों की उत्पत्ति, दंत्विन्यास  अंडे देने वाले स्तनधारी, कोष्टधारी स्तनधारी, जलीय स्तनधारियों और प्राइमेट्स के सामान्य लक्षण , अन्तः स्रावी ग्रंथियां (पियूष ,अवटु,परावटू,अधिवृक्क,अग्नासय ,जनन ग्रंथि ) तथा उनमे अंतर्संबंध |

(थ)कशेरुकी प्राणियों  के विभिन्न तंत्रों का तुलनात्मक,कार्यात्मक शरीर (अध्यावरण व इसके व्युत्पाद ,अन्तः कंकाल ,चलन अंग , पाचन तंत्र, श्वसन प्रणाली, हृदय और महाधमनी चापों सहित परिसंचारी तंत्र ,मूत्र जनन तंत्र ,मस्तिष्क व ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख,कान ) |

2.पारिस्थितिकी :

(क) जीवनमंडल : जीवनमंडल की संकल्पना ;बायोम ,जैवभूरसायन चक्र ,हरित गृह प्रभाव सहित वातावरण में मानव प्रेरित परिवर्तन, पारिस्थितिक अनुक्रम, जीवोम तथा ईकोटोन, सामुदायिक पारिस्थितिकी। 

(ख) पारितंत्र की संकल्पना, पारितंत्र की संरचना एवं कार्य पारितंत्र के प्रकार,पारिस्थितिक अनुक्रम, पारिस्थितिक अनुकूलन।

(ग) समष्टि, विशेषताएं, समष्टि गतिकी, समष्टि स्थिरीकरण |

(घ) प्राकृतिक संसाधनों का जैव विविधता एवं विवधता संरक्षण

(ड.) भारत का वन्य जीवन|

(च) संपोषणीय विकास के लिए सुदूर सुग्राहीकरण |

(छ) पर्यावरणीय जैवनिम्नीकरण, प्रदूषण तथा जीवमंडल पर इसके प्रभाव एवं उसकी रोकथाम।

3.जीव पारिस्थितिकी:

(क) व्यवहार: संवेदी नियंदन, प्रतिसंवेदिता, चिहन उद्दीपन, सीखना एवं स्मृति, वृत्ति,अभ्यास प्रानुकूलन, अध्यकन।

(ख) चालन में हार्मोनों की भूमिका,संचतन प्रसार में फीरोमोनों की भूमिका, गोपकता, परभक्षी पहचान, परभक्षी तौर तरीके, प्राइमेटों में सामाजिक सोपान, कीटों में सामाजिक संगठन।

(ग) अभिविन्यास, संचालन, अभीगृह, जैविक लय, जैविक नियतकालिकता, ज्वरीय, ऋतुपरक तथा दिवसप्राय लय । (घ) यौन द्वंद्व, स्वार्थपरता, नातेदारी एवं परोपकारिता  समेत प्राणी व्यवहार के अध्ययन की विधियां |

4.आर्थिक प्राणि विज्ञान :

(क) मधुमक्खी पालन, रेशमकीट पालन, लाखकीट पालन, शफरी संवर्ध, सीप पालन, झींगा पालन, कृमि संवर्ध |

(ख) प्रमुख संक्रमक एवं संचरणीय रोग (मलेरिया फाइलेरिया, क्षय रोग, हैजा तथा एड्स), उनके वाहक, रोगाणु तथा रोकथाम |

(ग) पशुओं तथा मवेशियों के रोग, उनके रोगानणु (हेलमिन्थस) तथा वाहक (चिंचड़ी,कुटकी, टेबेनस, स्टोमोक्सिस) । 

(घ) गन्ने के पीड़क (पाइरिला परपुसिएला), तिलहन का पीड़क (ऐकिया जनाटा) तथा चावल का पौड़क (सिटोफलस ओरिजे) |

(ड.) पारजीनी जंतु |

(च) चिकित्सकीय जैव प्रौद्योगिकी, मानव आनुवंशिक रोग एवं आनुवंशिक काउंसिलंग, जीन चिकित्सा | 

(छ) विविध जैव प्रौद्योगिकी।

5.जैवसांख्यकी :

प्रयोगों की अभिकल्पना :निराकरनी परिकल्पना ,सहसम्बन्ध ,समश्रायण ,केंद्रीय प्रवृति  का वितरण एवं मापन ,काई स्क्वेयर ,विद्यार्थी टेस्ट ,F-टेस्ट (एक्मर्गी तथा द्विमार्गी F-टेस्ट ) |

6.उपकरणीय पद्धति :

(क) स्पेक्ट्रमी प्रकाशमापित्र प्रावस्था विपर्यास एवं प्रतिदीप्ति सूक्ष्म दर्शिकी, रेडियोऐक्टिव अनुरेखक, द्रुत अपकेन्द्रित्र, जेल एलेक्ट्रोफोरेसिस, PCR, ALISA, FISH गुणसूत्रपेंटिंग |

(ख) लेक्ट्रिॉन सूक्ष्मदर्शी (TEM, SEM) |

IAS जंतु  विज्ञान/ प्राणी विज्ञान  का पाठ्यक्रम – प्रश्न पत्र -2

1.कोशिका जीव विज्ञान:

(क) कोशिका तथा इसके कोशिकांगों (केंद्रक, प्लाज्मका झिल्ली, माइटोकॉड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, राइबोसोम तथा लाइसोसोम्स) की संरचना एवं कार्य, कोशिका विभा (समसूत्री तथा अर्द्धसूत्री) ,समसूत्री तर्कु तथा समसूत्री तंत्र, गुणसूत्र गति क्रोमोसोम प्रकार पॉलिटीन एवं लैब्रश कोमैटिन की व्यवस्था, कोशिकाचक्र नियमन ।

(ख) न्यूक्लीइक अम्ल सांस्थितिकी, DNA अनुकल्प, DNA प्रतिकृति, अनुलेखन, RNA प्रक्रमण, स्थानांतरण, प्रोटीन वलन एवं परिवहन |

2.आनुवंशिकी:

(क) जीन की आधुनिक संकल्पना, विभक्त जीन, जीन-नियमन, आनुवंशिक कूट। 

(ख) लिंग गुणसूत्र एवं उनका विकास, ड्रोसोफिला तथा मानव में लिंग-निर्धारण |

(ग) वंशागति के मैंडलीय नियम, पुनर्योजन, सहलग्रता, बजहुयुग्म विकल्पों, रक्त समूहों की आनुवंशिकी, वंशावली विश्लेषण, मानव में वंशागत रोग |

(घ) उत्परिवर्तन तथा उत्परिवर्तजनन ।

(ड.) पुनर्योगंज DNA प्रायोगिकी, वाहकों के रूप में प्लैजमिड्स, कॉसमिडस, कृत्रिम गुणसूत्र, पारजीनी DNA क्लोनिंग तथा पूर्ण क्लोनिंग (सिद्धांत तथा क्रिया पद्धति)।

(च) प्रोकैरियोट्स तथा यूकैरियोट्स में जीन नियमन तथा जीन अभिव्यक्ति। 

(छ) संकेत अणु, कोशिका मृत्यु, संकेतन पथ में दोष तथा परिणाम। 

(ज) RFLP, RAPD एवं AFLP तथा फिंगरप्रिंटिंग में अनुप्रयोग, राइबोजाइम प्रौद्योगकी, मानव जीनोम परियोजना, जीनोमिक्स एवं प्रोटोमिक्स।

3.विकास:

(क) जीवन के उद्दभव के सिद्धांत |

(ख) विकास के सिद्धांत, प्राकृतिक वरण, विकास में परिवर्तन की भूमिका, विकासात्मक प्रतिरूप ,आण्विक ड्राइव, अनुहरण विभिन्नता, पृथक्करण एवं जाति उद्भवन |

(ग) जीवाश्म आंकड़ों के प्रयोग से घोड़े, हाथी तथा मानव का विकास |

(घ) हार्डी-वीनबर्ग नियम |

(ड.) महाद्वीपीय विस्थापन तथा प्रणियों का वितरण ।

4.वर्गीकरण विज्ञान :

(क) प्राणिवैज्ञानिक नामावली ,अंतर्राष्ट्रीय नियम, क्लैडिस्टिक्स, वाण्विक वर्गिकी एवं जैव विविधता।

5.जीव रसायन :

(क) कार्बोहाइड्रेटों, वसाओं ,वसाअम्लों एवं कोलेस्टेरॉल, प्रोटीनों एवं अमीनों अम्लों,न्यूक्लिइक अम्लों की संरचना एवं भूमिका, बायो एनर्जेटिक्स |

(ख) ग्लाइकोलाइसिस तथा क्रब्स चक्र, ऑक्सीकरण तथा अपचयन ,ऑक्सीकरणी फास्फोरिलेशन, ऊर्जा संरक्षण तथा विमोचन, ATP चक्र, चक्रीय AMP-इसकी संरचना तथा भूमिका |

(ग) हार्मोन वर्गीकरण (स्टेराइड तथा पेप्टाइड हार्मोन), जैव संश्लेषण तथा कार्य |

(घ) एंजाइम :क्रिया के प्रकार तथा क्रिया विधियां।

(ड) विटामिन तथा को- एंजाइम |

(च) इम्यूनोग्लोब्यूलिन एवं रोधक्षमता।

6.कार्यिकी (स्तनधारियों के विशेष संदर्भ में):

(क) रक्त की संघटना तथा रचक, मानव में रक्त समूह तथा RH कारक, स्कंदन के कारक तथा क्रिया विधि, लोह उपापचय, अम्ल क्षारक साम्य, तापनियमन, प्रतिस्कंदक। 

(ख) हीमोग्लोबिन: रचना प्रकार एवं ऑक्सीजन तथा कार्बनडाईऑक्साइड परिवहन में भूमिका |

(ग) पाचन एवं अवशोषण: पाचन में लार ग्रंथियों, यकृत, अग्न्याशय तथा आंत्र ग्रंथियों की भूमिका । 

(घ) उत्सर्जन :नेफ्रान तथा मूत्र विरचन का नियमन, परसरण नियमन एवं उत्सर्जी उत्पाद |

(ड.) पेशी :प्रकार, कंकाल पेशियों की संकुचन की क्रिया विधि, पेशियों पर व्यायाम का प्रभाव।

(च) न्यूरॉन: तंत्रिका आवेग- उसका चालन तथा अंतग्रंथनी संचरण: न्यूरोट्रांसमीटर |

(छ) मानव में दृष्टि, श्रवण तथा घ्राणबोध । 

(ज) जनन की कार्यिकी, मानव में यौवनारंभ एवं रजोनिवृत्ति ।

7.परिवर्धन जीवविज्ञान :

(क) युग्मक जनन: शुक्र की रचना, मैमेलियन शुक्र की पात्रे एवं जीवे धारिता | अंड जनन, पूर्ण शक्तता, निषेचन, मार्फोर्जेनिसस एवं माफ़जेन, ब्लास्टोजेनिसस, शरीर अक्ष रचना की स्थापना, फेट मानचित्र, मेढक  एवं चूजे में गेस्टुलेशन, चूजे में  विकासाधीन जीन, अंगांतरक जीन, आंख एवं हृदय का विकास, स्तनियों में अपरा |

(ख) कोशिका वंश परंपरा ,कोशिका-कोशिका अन्योन्य क्रिया, आनुवंशिक एवं प्रेरित विरूपजनकता, एंजीविया में कायांतरण के नियंत्रण में वायरोक्सिन की भूमिका, शवकीजनन एवं चिरभूण्साता ,कोशिका मृत्यु कालप्रभावन |

(ग) मानव में विकासीय जीन ,पात्रे निषेचन एवं भ्रूण अंतरण, क्लोनिंग |

(घ) स्टेमकोशिका :स्रोत प्रकार एवं मानव कल्याण में उनका उपयोग।

(ड.) जाति अवर्तन नियम ।

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