वैकल्पिक विषय वनस्पति विज्ञान का पाठ्यक्रम

जैसा कि हम जानते हैं, यूपीएससी सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा को पास करने के बाद उम्मीदवारों को मुख्य परीक्षा के लिए यूपीएससी द्वारा प्रदत्त कुल 26 विषयों में से किसी एक विषय को वैकल्पिक विषय के तौर पर  चुनने  की अनुमति होती है | इन 26 विषयों की सूचि में वनस्पति विज्ञान भी एक महत्वपूर्ण विषय है | इस लेख में  आपको वनस्पति विज्ञान के दोनों पत्रों के  सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी जाएगी | वनस्पति विज्ञान के  महत्वपूर्ण किताबों की जानकारी के लिए देखें हमारा हिंदी पेज वनस्पति विज्ञान की पुस्तक सूचि 

पाठक  लिंक किए गए लेख में आईएएस हिंदी के बारे में जानकारी पा सकते हैं।

प्रश्न पत्र -1 

1.सूक्ष्मजैविकी एवं पादपरोग विज्ञान :

विषाणु, वाइरॉइड, जीवाणु, फंगाई एवं माइक्रोप्लाज्मा संरचना एवं जनन | बहुगुणन, कृषि, उद्योग, चिकित्सा तथा वायु एवं मृदा एवं जल में प्रदूषण नियंत्रण में सूक्ष्मजैविकी के अनुप्रयोग, प्रायोन एवं प्रायोन घटना | विषाणुओं, जीवाणुओं, माइक्रोप्लाज्मा, फंगाई तथा सूत्रकृमियों द्वारा होने वाले प्रमुख पादपरोग, संक्रमण और फैलाव की विधियां, संक्रमण तथा रोग प्रतिरोध के आण्विक आधार | परजीविता की कार्यिकी और नियंत्रण के उपाय। कवक आविष, मॉडलन एवं रोग पूर्वानुमान, पादप संगरोध। 

2.क्रिप्टोगेम्स:

शैवाल, कवक, लाइकन, ब्रायोफाइट, टेरीडोफाइट संरचना और जनन के विकासात्मक पहलू, भारत में क्रिप्टोगेम्स का वितरण और उनका परिस्थितिक एवं आर्थिक महत्व। 

3.पुष्पोदभीद:

अनावृत बीजी: पूर्व अनावृत बीजी की अवधारणा | अनावृतबीजी का वर्गीकरण और वितरण | साइकेडेलीज, गिंगोऐजीज, कोनीफेरेलीज़ और नीटेलीज़ के मुख्य लक्षण, संरचना व जनन साईकेडोफिलिकेलीज, बेन्जेटिटेलीज तथा कार्डेटेलीज का सामान्य वर्णन | भू वैज्ञानिक समयमापनी, जीवश्म प्रकार एवं उनके अध्ययन की विधियां, आवृतबीजी :वर्गिकी, शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, परागाणुविज्ञान और जातिवृत्त, वर्गीकी सौपान, वानस्पतिक नामपद्धति के अंतर्राष्ट्रीय कूट, संख्यात्मक वर्गिकी एवं रसायन-वर्गिकी, शारीरिकी भ्रूण विज्ञान एवं परागाणु विज्ञान से साक्ष्य | आवृत बीजियों का उदगम एवं विकास, आवृत बीजियों के वर्गीकरण की विभिन्न प्रणालियों का तुलनात्मक विवरण, आवृत बीजी कुल का अध्ययन -मैग्नोलिएसी, रैननकुलेसी, बैसीकेसी, रोजेसी, फेबेसी, यूफार्बिएसी, मालवेसी, डिप्टेरोकापेंसी, एपिएसी, एस्क्लेपिडिएसी, वर्बिनेसी, सोलैनेसी, रुबिएसी, कुकुरबिटेली, ऐस्टीरेसी, पोएसी, ओरकेसी, लिलिएसी, म्यूजेसी एवं ऑर्किडेसी | रंध्र एवं उनके प्रकार, ग्रंथीय एवं अग्रंथीय ट्राइकोम, विसंगत द्वितीयक वृद्धि सी-3 और सी-4 पौधों का शरीर, जाइलम एवं फ्लोएम विभेदन, काष्ठ शरीर नर और मादा युग्मकोदभिद का परिवर्धन, परागण, निषेचन | भ्रूणपोष- इसका परिवर्धन और कार्य, भ्रूण परिवर्धन के स्वरूप | बहुभ्रूणता, असंगजनन, परागाणु विज्ञान के अनुप्रयोग, पराग भंडारण एवं टेस्ट ट्यूब निषेचन सहित प्रयोगात्मक भ्रूण विज्ञान। 

4.पादप संसाधन विकास :

पादन ग्राम्यन एवं परिचय, कृष्ट पौधों का उदभव, उदभव संबंधी वेवीलोव के केन्द्र, खाद्य, चारा, रेशों, मसालों, पेय पदार्थो, खाद्यतेलों, औषधियों, स्वापकों, कीटनाशियों, इमारती लकड़ी, गोंद, रेजिनों तथा रंजकों के स्रोतों के रूप में पौधे, लेटेक्स, सेलुलोस, मंड और उनके उत्पाद, इत्रसाजी, भारत के संदर्भ में नुकुल वनस्पतिकी का महत्व | ऊर्जा वृक्षारोपण, वानस्पतिक उद्यान और पादपालय। 

5.आकारजननः

पूर्ण शक्तता, ध्रुवणता सममिति और विभेदन, कोशिका, ऊतक, अंग एवं जीवद्रव्यक संवर्धन | कायिक संकर और द्रव्य संकर, माइक्रोप्रोपेगेशन, सोमाक्लोनल विविधता एवं इसका अनुप्रयोग, पराग अगुणित, एम्ब्रियोरेस्क्यू विधियां एवं उनके अनुप्रयोग।

प्रश्न पत्र -2  

1.कोशिका जैविकी:

कोशिका जैविकी की प्रविधियां ,प्राक्केन्द्रकी और सुकेन्द्रकी कोशिकाएं- संरचनात्मक और परासंचनात्मक बारीकियां, कोशिका बाह्य आधात्री अथवा कोशिकाबाहय आव्यूह (कोशिका भिति) तथा झिल्लियों की संरचना और कार्य कोशिका आसंजन, झिल्ली अभिगमन तथा आशयी अभिगमन, कोशिका अंगको (हरित लवक सूत्र कणिकाएं, ईआर, डिक्टियोसोम, राइबोसोम, अंतः काय, लयनकाय, परऑक्सीसोम) की संरचना और कार्य साइटोस्केलेटन एवं माइक्रोटयूब्यूल्स, केन्द्रक, केन्द्रिक, केन्द्र की रंध्र सम्मिश्र, क्रोमेटिन एवं न्यूक्लियोसोम | कोशिक संकेतन और कोशिकाग्राही, संकेत परिक्रमण, समसूत्रण विभाजन, कोशिका चक्र का आणविक आधार, गुणसूत्रों में संख्यात्मक और संरचनात्मक विभिन्नताएं तथा उनका महत्व, क्रोमेटिन व्यवस्था एवं जीनोम संवेष्टन, पॉलिटीन गुणसूत्र, B-गुणसूत्र संरचना व्यवहार और महत्व |

2.आनुवंशिकी, आण्विक, जैविकी और विकास :

आनुवंशिकी का विकास और जीन बनाम युग्मविकल्पी अवधारण (कूट विकल्पी), परिमाणात्मक आनुवंशिकी तथा बहुकारक अपूर्ण प्रभाविता बहुजननिक वंशागति, बहुविकल्पी सहलग्नता तथा विनियम आण्विक मानचित्र (मानचित्र प्रकार्य की अवधारणा) सहित जीन मानचित्रण की विधियां, लिंग गुणसूत्र तथा लिंग सहलग्न वंशागति, लिंग निर्धारण और लिंग विभेदन का आण्विक आधार, उत्परिवर्तन (जैव रासायनिक और आण्विक आधार) कोशिका द्रव्यी वंशागति एवं कोशिकाद्रव्यी जीन (नर बध्यता की आनुवंशिकी सहित ) । न्यूक्लीय अम्लों और प्रोटीनों की संरचना तथा संश्लेषण, आनुवंशिक कूट और जीन अभिव्यक्ति का नियमन, जीन नीरवता, बहुजीन कुल, जैव विकास प्रमाण, क्रियाविधि तथा सिद्धांत, उदभव तथा विकास में RNA की भूमिका |

3.पादप प्रजनन, जैव प्रौद्योगिकी तथा जैव सांख्यिकी:

पादप प्रजनन की विधियां आप्रवेश, चयन तथा संकरण (वंशावली, प्रतीप संकर, सामूहिक चयन व्यापक पद्धति) उत्परिवर्तन, बहुगुणिता, नरबंध्यता तथा संकर ओज प्रजनन । पादप प्रजनन में असंगजनन का उपयोग | डीएनए अनुक्रमण, आनुवंशिकी इंजीनियरी- जीन अंतरण की विधियां, पारजीनी सस्य एवं जैव सुरक्षा पहलू ,पादप प्रजनन में आण्विक चिन्हक का विकास एवं उपयोग| उपकरण एवं तकनीक-प्रोब, दक्षिणी ब्लास्टिंग, डीएनए फिंगर प्रिंटिग, पीसीआर एवं एफआईएसएच, मानक विचलन तथा विचरण गुणांक (सीबी), सार्थकता परीक्षण (Z-परीक्षण, टी-परीक्षण तथा कार्ड वर्ग परीक्षण), प्राथमिकता तथा बंटन (सामान्य द्विपदी तथा प्वासों बंटन) संबंधन तथा समाश्रयण। 

4.शरीर क्रिया विज्ञान तथा जैव रसायनिकी:

जल संबंध, खनिज पोषण तथा ऑयन अभिगमन, खनिज न्यूनताएं, प्रकाश संश्लेषण, प्रकाश रसायनिक अभिक्रयाएं, फोटो फोस्फोरिलेशन एवं कार्बन फिक्सेशन पाथवे, C 3, C 4 और कैम दिशामार्ग, फ्लोएम परिवहन की क्रियाविधि, श्वसन (किण्वन सहित, अवायुजीवीय और वायुजीवीय)- इलेक्ट्रॉन अभिगमन श्रृंखला और ऑक्सीकरणी फोस्फोरिलेशन, फोटोश्वसन, रसोपरासरणी सिद्धांत तथा एटीपी संश्लेषण, लिपिड उपापचय, नाइट्रोजन उपापचय ,किण्व, सहकिण्व, ऊर्जा अंतरण तथा ऊर्जा संरक्षण | द्वितीयक उपापचयों का महत्व, प्रकाशग्रहियों के रूप में वर्णक (प्लॅस्टिडियल वर्णक तथा पादप वर्णक), पादप संचलन दीप्तिकालिता तथा पुष्पन, बसंतीकरण, जीर्णन, वृद्धि पदार्थ उनकी रासायनिक प्रकृति, कृषि बागवानी में उनकी भूमिका और अनुप्रयोग, वृद्धि संकेत, वृद्धिगतियां, प्रतिबल शारीरिकी (ताप, जल, लवणता, धातु), फल एवं बीज शारीरिक बीजों की प्रसुप्ति, भंडारण तथा उनका अंकुरण, फल का पकना-इसका आण्विक आधार तथा मैनिपुलेशन |

5.पारिस्थितिकी तथा पादप भूगोल:

परितंत्र की संकल्पना, पारिस्थितिकी कारक, समुदाय की अवधारणाएं और गतिकी पादन, अनुक्रमण जीव मंडल की अवधारणा परितंत्र संरक्षण प्रदूषण और उसका नियंत्रण (फाइटोरेमिडिएशन सहित) पादप सूचक पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम | भारत में वनों के प्ररूप -वनों का परिस्थितिक एवं आर्थिक महत्व, वनरोपण, वनोन्मूलन एवं सामाजिक वानिकी ,संकटापन्न पौधे, स्थानिकता, IUCN कोटियां, रेड डाटा बुक, जैव विविधता एवं उसका संरक्षण, संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क, जैव विविधता पर सम्मेलन, किसानों के अधिकार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार, संपोषणीय विकास की संकल्पना, जैव-भू रासायनिक चक्र, भूमंडलीय तापन एवं जलवायु परिवर्तन, संक्रामक जातियां, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, भारत के पादप भूगोलीय क्षेत्र |

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